आयुर्वेदिक दवाओं और जड़ी बूटी की जानकारी और बिमारियों को दूर करने के आयुर्वेदिक फ़ार्मूले और घरेलु नुस्खे की जानकारी हम यहाँ आपके लिए प्रस्तुत करते हैं

24 February 2018

Health Benefits of Cloves | लौंग के इन फ़ायदों को आप नहीं जानते होंगे


लौंग हमारे किचन का एक बहुत ही कॉमन मसाला है जिसके बारे में हम सभी जानते हैं, पर इसके कुछ खास प्रयोग सभी लोग नहीं जानते, तो आइये जानते हैं इसके कुछ ख़ास प्रयोग- 

वैसे तो आयुर्वेद की कई सारी क्लासिकल दवाओं में लौंग मिलाया जाता है जैसे लवंगादि वटी, लवंगादि चूर्ण और लवंग तेल वगैरह. पर यहाँ आप जानेंगे लौंग के कुछ आसान से घरेलु प्रयोग के बारे में- 

तेज़ बुख़ार में - 

5-7 दाना लौंग को पीसकर ठन्डे पानी में मिक्स कर पिलाने से बुखार कम जाता है. 

नज़ला, जुकाम में - 

आधे कप पानी में 3-4 लौंग को उबालकर थोड़ा नमक मिलाकर पीना चाहिए. 

उल्टी और हिचकी आने पर- 

लौंग के ऊपर वाला डोडा बारीक पीसकर शहद के साथ मिलाकर चाटने से हिचकी और उल्टी में तुरन्त फ़ायदा होता है. 

मुँह की बदबू में- 

लौंग को चबाने से मुँह की बदबू या बैड स्मेल दूर होती है और पाचन क्रिया भी ठीक रहती है.

खाँसी होने पर- 

लौंग को हल्का भुनकर मुँह में रखकर चूसें या फिर भुना हुआ लौंग को पीसकर शहद मिक्स कर चाटने से खाँसी में आराम हो जाता है.

कब्ज़ होने पर - 

खाना खाने के बाद एक-दो लौंग चूसने से कब्ज़ दूर होता है और पाचन क्रिया ठीक रहती है और पेट की जलन में भी फ़ायदा होता है.

आँख की गुहेरी होने पर-

लौंग को पानी में घिसकर लगाने से लाभ होता है.

हैजा होने पर- 

पाँच ग्राम लौंग को तीन लीटर पानी में डालकर उबालें, जब पानी आधा बचे तो ठंडा होने पर रोगी को घूंट-घूंट कर पिलाने से फ़ायदा होता है. 

बच्चों की खाँसी में- 

लौंग, बहेड़े का छिल्का और काली मिर्च तीनो के पाउडर को बराबर वज़न में लें और तीनों के वज़न के जितना कत्था मिक्स कर थोड़ा पानी मिलाकर चने के बराबर की गोली बना कर सुखा कर रख लें. इस गोली को मुंह में रखकर चूसने से बच्चों की हर तरह की खाँसी दूर होती है.

दांत और मसूड़ों के दर्द में -

लौंग का तेल में रुई भीगाकर रखने से फ़ायदा होता है. लौंग को पीसकर भी दांतों में लगाने से फ़ायदा होता है. 

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21 February 2018

वैद्य जी की डायरी #1- मुहाँसों के लिए आयुर्वेदिक योग


मुहाँसों को आयुर्वेद में यौवनपीड़िका कहते हैं और आज जो योग बता रहा हूँ उसका नाम है- 

यौवनपीड़िकान्तक लेप - 

लाल चन्दन, मंजीठ, माल कांगनी, लोध्र, सेमल के काँटे, जायफल और वट की जटा प्रत्येक 50-50 ग्राम, चिरौंजी और पीली सरसों 100-100 ग्राम, सुहागे का फूला या टंकण भस्म 10 ग्राम

सभी जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण बनाकर अंत के टंकण भस्म अच्छी तरह से मिक्स कर रख लें. 

प्रयोग विधि - 

दो चम्मच इस चूर्ण को लेकर कच्चा दूध मिक्स कर पेस्ट बना लें और पिम्पल्स पर लेप की तरह लगा दें और सूखने दें. आधा-एक घंटा बाद दूध से भिगाकर इस लेप को हटा दें और ताज़े पानी से धो लें. 

कुछ दिनों तक लगातार इसका इस्तेमाल करते रहने से हर तरह के कील-मुहाँसे दूर हो जाते हैं और चेहरे में निखार भी आता है. बिल्कुल टेस्टेड नुस्खा है, यूज़ कर फ़ायदा उठायें. 

18 February 2018

वातकुलान्तक रस के फ़ायदे | Vatkulantak Ras for Brain and Nervous System


वातकुलान्तक रस क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो दिमाग और नर्वस सिस्टम के रोगों में इस्तेमाल की जाती है. यह झटके वाले रोग, मिर्गी या एपिलेप्ली, अपस्मार, बेहोशी के दौरे पड़ना, Paralysis और हिस्टीरिया जैसे रोगों को दूर करती है. तो आईये जानते हैं वातकुलान्तक रस का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल- 

वातकुलान्तक रस का कम्पोजीशन -

मृग नाभि या कस्तूरी, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, नागकेशर, शुद्ध मैन्शील, बहेड़ा, जायफल, छोटी इलायची और लौंग सभी बराबर वज़न में लिया जाता है और ब्रह्मी के रस में एक दिन तक खरल कर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बनायी जाती हैं. 

आजकल कस्तूरी नहीं मिलने से इसकी जगह पर स्वर्ण भस्म, लता कस्तूरी और अम्बर जैसी चीज़ें मिलाकर बनाया जाता है. 

वातकुलान्तक रस के गुण- 

यह वातनाशक है, नर्व और दिमाग को ताक़त देती है. गंभीर वात रोगों में ही इसे यूज़ किया जाता है.

वातकुलान्तक रस के फ़ायदे - 

बेहोशी के दौरे पड़ना, मृगी या Epilepsy, हाथ-पैर या बॉडी में कहीं भी झटके पड़ना, हाथ-पैर का फड़कना, पैरालिसिस, फेसिअल Paralysis जैसे रोगों की यह जानी-मानी दवा है. 

नींद नहीं आना, बक-बक करना, अंट-संट बकना जैसे मानसिक रोगों में भी फायदेमंद है. 

वातकुलान्तक रस की मात्रा और सेवन विधि- 

एक टेबलेट सुबह शाम या रोज़ तीन-चार बार तक शहद या मक्खन मलाई के साथ. इसे एक-दो महिना तक लगातार लिया जा सकता है. इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ही यूज़ करना चाहिए, अन्यथा सीरियस नुकसान भी हो सकता है. डाबर, बैद्यनाथ जैसी कंपनियों का यह मिल जाता है. 

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17 February 2018

वासारिष्ट के फ़ायदे | Vasarishta for Cold Cough and Asthma


वासारिष्ट क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो सर्दी-खाँसी, सिने की जकड़न, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और बुखार जैसी बीमारियों में इस्तेमाल की जाती है. तो आईये जानते हैं वासारिष्ट का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

वासारिष्ट जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है इसका मुख्य घटक या मेन इनग्रीडेंट वासा या वसाका होता है.

वासारिष्ट का कम्पोजीशन-

वसाका, दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपात, नागकेशर, कबाबचीनी, नेत्रबला, सोंठ, मिर्च, पीपल, धातकी और गुड़ का मिश्रण होता है. जिसे आयुर्वेदिक प्रोसेस आसव-अरिष्ट निर्माण विधि से इसका रिष्ट या सिरप बनाया जाता है. 

वासारिष्ट के गुण - 

आयुर्वेदानुसार यह कफ़ और पित्त दोष नाशक है. एंटी इंफ्लेमेटरी, Antitussive, Expectorant, एंटी एलर्जिक, एंटी फंगल, एंटी वायरल, एंटी बैक्टीरियल जैसे गुणों से भरपूर होता है. 

वासारिष्ट के फ़ायदे - 


  • गले के अन्दर सुजन होने, Laryngitis, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, साँस लेने में तकलीफ़ होन, सीने की जकड़न जैसी प्रॉब्लम को दूर करता है.



  • सर्दी-खांसी जिसमे जमा-जमा पिला कफ़ निकले, बुखार हो तो इससे फ़ायदा होता है. 



  • इन सब के अलावा साइनस और टॉन्सिल्स के बढ़ने पर भी फ़ायदेमंद है. 



  • वासारिष्ट भूख बढ़ाने और Digestion इम्प्रूव करने में भी मदद करता है. 


वासारिष्ट की मात्रा और सेवन विधि - 

15 से 30 ML बराबर मात्रा में पानी मिलाकर सुबह शाम भोजन के बाद लेना चाहिए. बच्चों को कम डोज़ में देना चाहिए. पांच साल से बड़े बच्चों को दे सकते हैं. यह ऑलमोस्ट सेफ़ दवा है, किसी तरह का कोई साइड इफ़ेक्ट या नुकसान नहीं होता है. 

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16 February 2018

स्वर्णवंग की जानकारी | Swarna Vanga - Benefits, Dosage, Ingredients - Lakhaipur


स्वर्णवंग क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो प्रमेह, यौन रोगों, मूत्र रोगों, डायबिटीज, पुरानी खांसी, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसी कई तरह की बीमारियों में इस्तेमाल की जाती है. तो आईये जानते हैं स्वर्णवंग का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

स्वर्णवंग जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है स्वर्ण का मतलब सोना या गोल्ड और वंग भी एक तरह का मेटल है. पर इसमें स्वर्ण या सोना नहीं मिला होता, बल्कि सोने की तरह या सुनहला दिखने की वजह से इसे स्वर्णवंग कहा गया है. इसे स्वर्णबंग और स्वर्णराज बंगेश्वर जैसे नामों से भी जाना जाता है.

स्वर्णवंग का कम्पोजीशन - 

इसके कम्पोजीशन या Ingredients की बात करें तो इसमें वंग भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, नवसादर और निम्बू का रस मिला होता है जिसे आयुर्वेदिक प्रोसेस कूपीपक्व रसायन निर्माण विधि से अग्नि देकर बनाया जाता है. 

स्वर्णवंग के गुण - 

त्रिदोष पर इसका असर होता है यानि त्रिदोष नाशक है जो वात, पित्त और कफ़ को बैलेंस करता है. 

स्वर्णवंग के फ़ायदे - 

पुरानी सर्दी-खाँसी, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, मूत्र रोग और Urinary Tract Infection जैसे रोगों में असरदार है.

डायबिटीज और इसकी वजह से होने वाली परेशानियों में असरदार है.

मर्दाना कमज़ोरी, वीर्य विकार, स्वप्नदोष, स्पर्म काउंट की कमी जैसे पुरुष रोगों में दूसरी सहायक दवाओं के साथ इस्तेमाल किया जाता है. 

स्वर्णवंग के इस्तेमाल से Digestive System मज़बूत होता है, भूख बढ़ती है, बॉडी को एनर्जी देता है और पॉवर-स्टैमिना को बढ़ाता है. 

स्वर्णवंग की मात्रा और सेवन विधि - 

125mg सुबह शाम मक्खन, मलाई या शहद में मिक्स लेना चाहिए. या फिर आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह के अनुसार उचित अनुपान से. इसे डॉक्टर की सलाह से और डॉक्टर की देख रेख में ही यूज़ करें, अन्यथा नुकसान भी हो सकता है. डाबर के 100mg के पैक की क़ीमत 110 रुपया है जिसे ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं निचे दिए गए लिंक से - 



15 February 2018

नूरानी तेल के फ़ायदे | Noorani Tel Benefits in Hindi - Lakhaipur


नूरानी तेल इंडियन केमिकल कंपनी का हर्बल पेटेंट ब्रांड है जो दर्द, सुजन, चोट, घाव और जलने कटने पर यूज़ किया जाता है. तो आईये जानते हैं नूरानी तेल का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल-

सबसे पहले जान लेते हैं नूरानी तेल का कम्पोजीशन- 

इसके कम्पोजीशन या इनग्रीडेंटस की बात करें तो इसे अम्बा हल्दी, कायफल, मैदालकड़ी, दालचीनी, तेजपात, लोहबान, नरकचूर, गुग्गुल, सोंठ, निर्गुन्डी, कुचला, मेथी, रतनजोत, अजवाइन, मेथी, गंधविरोजा, कपूर के अलावा सिट्रोनेला आयल, पाइन आयल और मिनरल आयल जैसी चीजों को मिलाकर बनाया गया है. 

नूरानी तेल के गुण- 

इसके गुणों की बात करें तो यह वात-काफ दोष दूर करने वाला, दर्द-सुजन नाशक, एंटी सेप्टिक और हीलिंग जैसे गुणों से भरपूर होता है. 


नूरानी तेल के फ़ायदे- 

जोड़ों का दर्द, मसल्स का दर्द, कमर दर्द, पीठ दर्द, फ्रोज़ेन शोल्डर, जकड़न जैसी प्रॉब्लम में इसकी मालिश करने से फ़ायदा मिलता है. 

इसे हल्का गर्म कर मालिश करने से सुजन दूर होती है. 

चोट लगने, जल-कट जाने और ज़ख्म में भी इसे लगाया जाता है. घरेलू इस्तेमाल के लिए यह एक पॉपुलर तेल है.

यह सिर्फ एक्सटर्नल यूज़ के लिए, इसकी मालिश के बाद हाथ को साबुन से धोना चाहिए. इसके 200 ML के बोतल की क़ीमत क़रीब 150 रुपया इसे ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं निचे दिए गए लिंक से- 




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13 February 2018

नाग भस्म के गुण, उपयोग एवम प्रयोग विधि | Nag Bhasma Benefit and Use - Lakhaipur


नाग भस्म क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है, जो सीसे या लेड से बनाया जाता है. लेड को आयुर्वेद में नाग भी कहते हैं, साँप वाला नाग नहीं. इसे प्रमेह, ख़ासकर मधुमेह या डायबिटीज, बार-बार पेशाब आने, पेशाब कण्ट्रोल नहीं कर पाना, आँखों के रोग, गुल्म, एसिडिटी, लीवर स्प्लीन की बीमारी, ल्यूकोरिया, गण्डमाला, हर्निया और नपुंसकता जैसे रोगों में प्रयोग किया जाता है, तो आईये जानते हैं नाग भस्म के फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

नाग भस्म बनाने के लिए उत्तम क्वालिटी के लेड को कई तरह के प्रोसेस से शुद्ध करने के बाद भस्म बनाया जाता है जो की एक जटिल प्रक्रिया होती है. आम आदमी के लिए इसकी भस्म बनाना आसान नहीं है इसीलिए इसकी चर्चा न कर जानते हैं इसके फ़ायदों के बारे में. 

नाग भस्म के औषधिय गुण - 

कफ़, पित्त और वात तीनों दोषों पर इसका असर होता है. यह पाचक, बल-वीर्य बढ़ाने वाली, शक्तिवर्धक, एंटी इंफ्लेमेटरी, एंटी डायबिटिक जैसे कई तरह के गुणों से भरपूर होती है. 

नाग भस्म में दोनों तरह के चमत्कारी गुण होते हैं जैसे बढे हुवे धातुओं को घटाना और घटे हुवे धातुओं को बढ़ाना.

नाग भस्म के फ़ायदे- 

पेट के रोग, भूख की कमी एसिडिटी में - 

यह जठराग्नि को तेज़ कर भूख को बढ़ाती है. एसिडिटी में जब पेट में गर्मी और जलन हो, प्यास ज्यादा लगती हो, बार-बार उल्टी करने की इच्छा हो तो ऐसी कंडीशन में नाग भस्म बेहद असरदार है.

मधुमेह या डायबिटीज में - 

डायबिटीज और इस से रिलेटेड प्रॉब्लम में नाग भस्म बेहद असरदार है. इसे शिलाजीत के साथ लेने से तेज़ी से फ़ायदा होता है, कमज़ोरी दूर कर शारीरिक शक्ति को भी बढ़ाती है. 

डायबिटीज वाले मोटे-थुलथुले व्यक्तियों के लिए यह बेहद असरदार है. पर डायबिटीज के दुबले-पतले रोगीयों को इसके साथ में यशद भस्म लेना चाहिए. 

हड्डी के रोगों में -

बोन मैरो कमज़ोर होने से जब हड्डी टेढ़ी होने लगती है और जोड़ों में दर्द होता हो तो नाग भस्म के इस्तेमाल से फ़ायदा होता है. 

बवासीर में -

बादी बवासीर में नाग भस्म को दूसरी सहायक औषधियों के साथ लेने से फ़ायदा होता है. 

मसल्स की कमज़ोरी में - 

नाग भस्म मसल्स के लिए भी इफेक्टिव है. अगर बहुत-खाने पिने पर भी सेहत नहीं लगती और मसल्स कमज़ोर हों तो इसके इस्तेमाल से मसल्स में ब्लड फ्लो बढ़ता है और मसल्स मज़बूत होते हैं. 

नपुंसकता या Impotency में - 

नसों की कमजोरी, नर्व के बेजान होने से होने वाली नामर्दी या फिर अंडकोष की ग्रंथियों की कमज़ोरी से होने वाली नामर्दी इस से दूर होती है. इसके लिए नाग भस्म 125mg, शुद्ध शिलाजीत 125mg और स्वर्ण भस्म 30mg मिक्स कर शहद से लेना चाहिए. 

पुरुष यौन रोग और वीर्य विकारों में - 

अधीक वीर्यस्राव होने से जब दिमाग कमज़ोर हो, कोई भी काम करने का मन नहीं करे और माइंड में तरह-तरह के विचार आते हों तो इसे से चमत्कारी लाभ मिलता है. ऐसी कंडीशन में नाग भस्म 125mg, शुद्ध शिलाजीत 125mg और प्रवाल पिष्टी 60mg मिक्स कर सुबह शाम लेना चाहिए शहद से. 

आँखों की बीमारीयों के लिए- 

आँख की हर तरह की प्रॉब्लम में नाग भस्म को त्रिफला घृत के साथ लेने से फ़ायदा होता है. 

गण्डमाला में - 

गण्डमाला और ग्लैंड में भी नाग भस्म लेने से फ़ायदा होता है. इसके साथ में कांचनार गुग्गुल भी लेना चाहिए. 

सुखी खांसी और फेफड़ों के रोग में -

सुखी खाँसी में नाग भस्म लेने से फ़ायदा होता है. 125mg नाग भस्म को सितोपलादि चूर्ण में मिक्स शहद के साथ लें और वासारिष्ट पीना चाहिए. तपेदिक या ट्यूबरक्लोसिस होने पर नाग भस्म असरदार है. टी.बी. में इसे मुक्त पिष्टी और च्यवनप्राश के साथ लेना चाहिए. 

जोड़ों का दर्द और आमवात में - 

आमवात और जोड़ों के दर्द में इसे सोंठ के चूर्ण के साथ लेने से फ़ायदा होता है. 

नाग भस्म की मात्रा और सेवन विधि- 

125mg सुबह शाम शहद या फिर रोगानुसार उचित अनुपान के साथ लेना चाहिए. इसे डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए. गलत डोज़ होने पर नुकसान भी हो सकता है. 

डाबर बैद्यनाथ जैसी आयुर्वेदिक कंपनियों का यह मिल जाता है, इसे आयुर्वेदिक दवा दुकान से या फिर ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं. 


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08 February 2018

निर्गुन्डी के फ़ायदे | Nirgundi Benefits & Use in Hindi


निर्गुन्डी को संस्कृत में निर्गुन्डी, हिंदी में - सम्भालु, मराठी में- निगड़, गुजराती में - नगड़ और नगोड़, बंगाली में- निशिन्दा और लैटिन में इसे वाईटेक्स निगंडो के नाम से जाना जाता है. 

यह दो तरह की होती है नीले फूल वाली और सफ़ेद फूल वाली. 

निर्गुन्डी के गुण- 

यह तासीर में गर्म, कफ़ और वात दोष को दूर करने वाली, Analgesic, एंटी इंफ्लेमेटरी, हीलिंग और सुजन दूर करने वाले गुणों से भरपूर है. 

निर्गुन्डी के फ़ायदे - 

निर्गुन्डी के बीज और इसकी जड़ की छाल को कई सारी शास्त्रीय आयुर्वेदिक दवाओं में मिलाया जाता है. वातनाशक होने से यह गठिया, जोड़ों का दर्द, साइटिका, आमवात, दिमाग के रोगों के अलावा पेट के रोगों में भी फायदेमंद है. यहाँ मैं आपको इसके कुछ आसान से प्रयोग बता देता हूँ. 

हर तरह के दर्द वाले वात रोगों में इसकी जड़ की छाल का काढ़ा या फिर इसके बीजों का चूर्ण इस्तेमाल करने से फ़ायदा होता है. अगर गठिया, साइटिका जैसे रोगों में तरह-तरह की दवा खाने से भी फ़ायदा नहीं होता हो तो भी इसके जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर पियें, इस से फायदा मिलेगा और बीमारी दूर होगी.

इसके पत्तों का रस पिने से पेट के कीड़े या कृमि रोग दूर होते हैं. 

आईये अब जानते हैं इसके कुछ एक्सटर्नल प्रयोग - 

हर तरह के चर्मरोग और फोड़े-फुंसी में - 

इसके पत्तों के रस को निकालकर तेल पका लें, इस तेल को लगाने से चर्मरोग मिटते हैं. जल्दी न भरने वाले ज़ख्म को इस तेल से ड्रेसिंग करने से ज़ख्म जल्द भर जाते हैं. 

दर्द होने पर पर - 

बॉडी में कहीं भी दर्द हो तो इसके पत्तों को हल्का गर्म कर बांधने से फ़ायदा होता है. जोड़ों का सुजन, जोड़ों का दर्द, आमवात जैसे रोगों में इसका इस्तेमाल करना चाहिए. इसके पत्तों के रस को गर्म कर मालिश करने से भी दर्द दूर होता है. 

शरीर में जकड़न होने पर - 

अगर पुरे बॉडी में जकड़न हो और हाथ पैर काम नहीं करे तो चारपाई पर इसके पत्ते को बिछाकर रोगी को लिटा दें और निचे से अग्नि दें और रोगी के बॉडी पर हल्की चादर रखें. दो दिन दिनों में ही ऐसा करने से बॉडी का दर्द जकड़न दूर हो जाती है. 

अंडकोष की सुजन होने पर- 

इसके पत्तों को पीसकर दशांग लेप मिक्स कर अंडकोष पर लेप करने से सुजन मिट जाती है. 

सूखे पत्तों को घर में जलाने या धुवन करने से हर तरह के वायरस और बैक्टीरिया दूर होते हैं और घर का वातावरण शुद्ध होता है. इसके प्रोडक्ट ऑनलाइन ख़रीदें निचे दिए लिंक से - 



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07 February 2018

दिव्य सर्वकल्प क्वाथ का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल


पतंजलि का दिव्य सर्वकल्प क्वाथ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का कॉम्बिनेशन है जो एक Detoxifier की तरह काम करता है, यह लीवर से Toxins और गन्दगी को बाहर निकालकर लीवर के फंक्शन को सही करता है जिस से लीवर की हर तरह की बीमारी दूर होती है. आईये जानते हैं दिव्य सर्वकल्प क्वाथ का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

क्वाथ का मतलब होता है काढ़ा जिसे पानी के साथ उबाल कर बनाया जाता है. इसमें जड़ी-बूटियों का मोटा पाउडर होता है.

दिव्य सर्वकल्प क्वाथ का कम्पोजीशन(घटक)-

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे पुनर्नवा की जड़(2.5gram), भूमि आँवला(1.25gram) और मकोय(1.25gram) के मिश्रण से बनाया जाता है. 

दिव्य सर्वकल्प क्वाथ के फ़ायदे- 

यह लीवर के लिए एक बेहतरीन दवा और टॉनिक की तरह काम करता है. लीवर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालता है, लीवर को हेल्दी और फिट रखता है. पीलिया या जौंडिस होने पर इस से बहुत अच्छा फ़ायदा होता है. 

लीवर फंक्शन सही होने से पाचन तंत्र मज़बूत होता है और इसके इस्तेमाल से आप पाचन सम्बन्धी रोगों से बच भी सकते हैं. 

हर तरह के स्किन डिजीज या चर्मरोग जैसे एक्जिमा, सोरायसिस और मूत्र रोगों में भी इस से फ़ायदा होता है. 

दिव्य सर्वकल्प क्वाथ की मात्रा और सेवन विधि- 

चूँकि यह रेडीमेड दवा नहीं है तो इसे हर बार बनाना होता है. पांच से दस ग्राम तक इसके पाउडर को 400 ML पानी में डालकर तब तक उबालें जब तक की 100 ML पानी बचे. इसके बाद ठंडा होने पर छान लें. 

इसे सुबह ख़ाली पेट और रात में खाना खाने के एक घंटा पहले पीना चाहिए. इस काढ़े को एक बार में 100ML पीना है, दोनों टाइम का एक बार भी बनाकर रख सकते हैं. उम्र के अनुसार डोज़ कम या ज़्यादा कर सकते हैं, यहाँ बताई गयी मात्रा व्यस्क व्यक्ति की है. 

यह बिल्कुल सेफ़ दवा है, कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता है. ब्रेस्ट फीडिंग में भी यूज़ किया जा सकता है. इसके 100 ग्राम के पैक की क़ीमत 25 रुपया है जिसे पतंजलि स्टोर से या फिर ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं. 

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04 February 2018

यष्टिमधु या मुलेठी के फ़ायदे | Yashtimadhu Benefit & Use in Hindi


यष्टिमधु को मुलेठी, मूलहटी और जेठीमध जैसे नामों से भी जाना जाता है. यह हाइपरएसिडिटी, अल्सर, कमज़ोरी, जोड़ों का दर्द और खाँसी जैसी बीमारियों में असरदार है. यौनशक्ति वर्धक दवाओं में भी इसे यूज़ किया जाता है. तो आईये जानते हैं यष्टिमधु के फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

यष्टिमधु एक तरह के लता वाले पौधे की जड़ होती है. इसे आम बोलचाल में 'करजनी' भी कहते हैं. जबकि अंग्रेजी में इसे Liquorice कहते हैं. यह दो तरह की होती है सफ़ेद और लाल.  इसके बीज बड़े ही सुन्दर होते हैं. वैसे इनके बीजों का भी कुछ इस्तेमाल है पर आज यहाँ उसकी बात नहीं करेंगे. बल्कि जानेंगे इसके जड़ यानि यष्टिमधु के फ़ायदे के बारे में. 

इसकी जड़ ऊपर से मटमैले रंग की होती है और अन्दर हल्का पीले रंग की. इसकी जड़ रेशेदार होती है, जिसे कूटकर पाउडर बनाना उतना आसान नहीं होता है. यह स्वाद में मीठी होती है इसीलिए इसे यष्टिमधु भी कहा जाता है.

यष्टिमधु के गुण -

आयुर्वेदानुसार यह पित्त और वात दोष नाशक है. बॉडी के मेन organs पर इसका असर होता है. इसमें Antacid, एंटी इंफ्लेमेटरी, Anti-tussive, Anti-stress, Anti-asthmatic, Anti-oxidant जैसे कई तरह के गुण पाए  जाते हैं. यह यौनशक्ति बढ़ाने में भी मदद करता है. 

यष्टिमधु के फ़ायदे- 

वैसे तो यष्टिमधु बहुत सारी बीमारियों में फ़ायदेमंद है पर यहाँ हम जानेंगे इसके मेन फ़ायदों के बारे में. 

स्वसन  तंत्र की बीमारियों के लिए - 

खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, टोंसिल, गले की सुजन, गले की ख़राश, सुरसुरी होना जैसी प्रॉब्लम में असरदार है. 

हार्ट के लिए -

यष्टिमधु कोलेस्ट्रॉल को कम करती है और हार्ट को हेल्दी रखने में मदद करती है.

पाचन तंत्र के लिए- 

पाचन तंत्र या Digestive सिस्टम के रोगों में यह सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाती है. एसिडिटी, सीने की जलन, अल्सर, पेप्टिक अल्सर, कब्ज़, माउथ अल्सर और हेपेटाइटिस जैसे पेट के कई तरह के रोगों में फ़ायदेमंद है. 

दिमाग या ब्रेन के लिए -

यह चिंता, तनाव, डिप्रेशन और यादाश्त की कमज़ोरी को दूर करने में मदद करती है.

त्वचा रोगों या Skin Disease के लिए -

यह एलर्जी, एक्जिमा, सोरायसिस और गंजापन जैसी प्रॉब्लम भी भी फ़ायदा करती है.

बोन और मसल्स हेल्थ के लिए -

यह जोड़ों के दर्द, आर्थराइटिस, मसल्स के दर्द में भी दूसरी दवाओं के साथ फ़ायदा करती है. 

यौनशक्तिवर्धक- 

आयुर्वेद की अधिकतर यौनशक्तिवर्धक दवाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता है ताक़त देकर पॉवर और स्टैमिना बढ़ाने वाले गुणों के कारन. यह कमज़ोरी और थकान को दूर करने में मदद करती है. 

यष्टिमधु की मात्रा और सेवन विधि -

इसे अधिकतर दूसरी दवाओं के साथ मिक्स कर ही यूज़ किया जाता है. वैसे अगर इसे अकेला यूज़ करना हो तो एक से तीन ग्राम तक सुबह शाम पानी से ले सकते हैं. 
हिमालया यष्टिमधु एक टेबलेट सुबह शाम ले सकते हैं. जो की लेने भी आसान होता है. सर्दी-खाँसी और गले की ख़राश में इसकी जड़ के छोटे टुकड़े को मुँह में रखकर चूस भी सकते हैं. पतंजलि यष्टिमधु पाउडर भी यूज़ कर सकते हैं. 

यष्टिमधु के नुकसान - 

वैसे तो इसका कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता परन्तु हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, किडनी की बीमारी और  प्रेगनेंसी में नहीं लेना चाहिए. खून में पोटैशियम की कमी होने और hypertensive दवाओं को लेते हुवे इसका इस्तेमाल न करें.

यष्टिमधु पंसारी की दुकान से मिल जाती है. हिमालया यष्टिमधु निचे दिए लिंक से ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं- 


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02 February 2018

अणु तेल के फ़ायदे | Anu Taila Benefits, Usage and Ingredients


अणु तेल क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जिसे नस्य या Nasal Drops की तरह इस्तेमाल किया जाता है. इसके इस्तेमाल से नाक, कान, आँख जैसी इन्द्रियों को बल मिलता है और साइनस, थायराइड, सर्दी-जुकाम, एलर्जी, बालों का टाइम से पहले सफ़ेद होना, बाल गिरना, सर्द दर्द, माईग्रेन और यादाश्त की कमी जैसे कई तरह के रोगों में फ़ायदा होता है, तो आईये जानते हैं अणु तेल का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

अणु तेल जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है यह शरीर में सूक्ष्म अणुओं तक पहुँच जाता है इसीलिए इसे अणु तेल कहा गया है. इसे कई तरह की जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बनाया गया है. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसमें - 

जीवंती, हाउबेर, देवदार, मोथा, दालचीनी, उशीर, श्वेत सारिवा, सफ़ेद चन्दन, दारूहल्दी, यष्टिमधु, मोथा, अगर, शतावर, बिल्व, उत्पल, बृहती, कंटकारी, रास्ना, विडंग, शालपर्णी, प्रिश्नपर्णी, तेजपात, छोटी इलायची, रेणुका बीज, कमल, बकरी का दूध और तिल तेल के मिश्रण से बनाया जाता है. 

अणु तेल त्रिदोष नाशक होता है पर कफ़ और वातदोष में इसका ज़्यादा असर दीखता है.

अणु तेल के फ़ायदे-

नाक, कान, आँख, गला, सर की बीमारियों और वातरोगों में यह असरदार है. 

नयी पुरानी साइनस, थाइराइड, नाक की सुजन, सुगंध पता नहीं लगना, सर्दी-खाँसी, गले की सुजन, सर दर्द, एलर्जी, बाल गिरना, समय से पहले बाल सफ़ेद होना, दाढ़ी-मूँछ के बाल सफ़ेद होना जैसी प्रॉब्लम में फ़ायदेमंद है. 

फेसिअल पैरालिसिस, गर्दन की जकड़न, कन्धों का दर्द और जकड़न, मसल्स की कमज़ोरी और जकड़न जैसे वात रोगों में इसका नस्य लेने से लाभ होता है. 

टोंसिल, गला ख़राब होना, यादाश्त की कमजोरी, नर्व की कमज़ोरी, दांत के रोग, हकलाहट, हार्मोनल Imbalance में भी फ़ायदेमंद है. 

अणु तेल नाक, कान, आँख जैसी इन्द्रियों को ताक़त देता है और इनकी बीमारियों को दूर करता है. पंचकर्म के नस्यकर्म में इसे विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है. 

अणु तेल का इस्तेमाल आप बताई गई बीमारीओं से बचने के लिए भी कर सकते हैं.


अणु तेल का प्रयोग कैसे करें?

सुबह फ्रेश होने के बाद लेटकर ड्रॉपर से दो-तीन बूंद नाक में डालें और अन्दर तक खींचें. इसे डालने के बाद पांच-दस मिनट तक लेटे रहना चाहिए. अगर कफ़ हो और तेल गला तक आ जाए तो थूक देना चाहिए. एक बार में नाक की एक ही छेद में डालें, थोड़ी देर बाद दुसरे छेद में डालना चाहिए. इसे रोज़ सुबह एक बार या फिर सुबह शाम भी डाल सकते हैं. 

अणु तेल को सुबह में भी मोस्टली यूज़ किया जाता है और स्पेशल कंडीशन में शाम में भी. पर कुछ हालत में इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जैसे- 

भूखे, प्यासे में, बाल धोने के बाद, प्रेगनेंसी में, कहीं चोट लगने पर, बहुत ज़्यादा थकावट होने पर और बारिश के मौसम में जब धुप न हो तो अणु तेल का इस्तेमाल न करें. 

श्री श्री के 10 ML के पैक की क़ीमत क़रीब 55 रुपया है. इसे आयुर्वेदिक दवा दुकान से या फिर ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं निचे दिए लिंक से- 



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01 February 2018

शिलाप्रवंग के फ़ायदे | Shilapravang Benefits, Dosage, Ingredient


शिलाप्रवंग टेबलेट यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन, पेशाब की जलन, प्रोस्टेट, इरेक्टाइल डिसफंक्शन और मर्दाना कमज़ोरी जैसे पुरुष रोगों में फ़ायदेमंद हैं, तो आईये जानते हैं शिलाप्रवंग का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल- 

शिलाप्रवंग टेबलेट आयुर्वेदिक कम्पनी धूतपापेश्वर का ब्रांड है जिसमे शिलाप्रवंग स्पेशल टेबलेट की तरह स्वर्ण भस्म और मकरध्वज जैसी कीमती दवा नहीं मिली होती है, इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसके हर टेबलेट में -

शुद्ध शिलाजीत- 30 mg, प्रवाल पिष्टी- 30 mg, वंग भस्म- 30 mg, मोती पिष्टी- 1 mg, स्वर्णमाक्षिक भस्म, भीमसेनी कपूर, वंशलोचन प्रत्येक- 20 mg, छोटी इलायची- 10 mg, गिलोय सत्व और गोखरू प्रत्येक 50-50 mg का मिश्रण होता है. 

यह वात और कफ़ दोष को बैलेंस करता है. 


शिलाप्रवंग टेबलेट के फ़ायदे- 

डायबिटीज, पेशाब का इन्फेक्शन या UTI, पेशाब की जलन, पेशाब करने में दर्द होना, प्रोस्टेट ग्लैंड का बढ़ जाना  शीघ्रपतन, इरेक्टाइल डिसफंक्शन, स्पर्म काउंट की कमी, कमज़ोरी, थकावट जैसे रोगों में इसके इस्तेमाल से फ़ायदा होता है. 

महँगा होने के कारन जो लोग शिलाप्रवंग स्पेशल का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं वो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, दोनों के लगभग एक जैसे ही फ़ायदे होते हैं. 

शिलाप्रवंग टेबलेट की मात्रा और सेवन विधि- 

एक से दो टेबलेट सुबह शाम दूध से खाना के बाद लेना चाहिए, या फिर डॉक्टर की सलाह के अनुसार. इसे लगातार दो महिना तक लिया जा सकता है. इसके 40 टेबलेट के पैक की क़ीमत क़रीब 300 रुपया है. 



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29 January 2018

पुराने से पुराने ल्यूकोरिया की 100% सफ़ल आयुर्वेदिक चिकित्सा


ल्यूकोरिया महिलाओं की ऐसी बीमारी है जो हेल्थ डाउन कर शरीर को अन्दर से खोखला कर देती है, और तरह-तरह की दवा खाने के बाद भी यह बीमारी जल्दी नहीं जाती है. तो आईये जानते हैं कि इस बीमारी में कौन-कौन सी आयुर्वेदिक दवा को किस तरह से इस्तेमाल करना चाहिए- 

दोस्तों, आज जो आयुर्वेदिक योग मैं बता रहा हूँ वह 100% इफेक्टिव है, जो की कुछ इस तरह से  है- 

अगर कब्ज़ या Constipation की भी प्रॉब्लम हो तो सबसे पहले त्रिफला चूर्ण या फिर दूध में एरंड तेल मिलाकर पीना चाहिए उसके बाद ही दवाएँ सही से असर करेंगी- 

योग नंबर - 1 

स्वर्णमालिनी वसंत रस - 3 ग्राम, प्रदरान्तक लौह- 6 ग्राम, कामदुधा रस(मोती युक्त)- 3 ग्राम, त्रिवंग भस्म- 3 ग्राम, कुक्कुटांडत्वक भस्म - 3 ग्राम और सितोपलादि चूर्ण - 30 ग्राम 

सभी को अच्छी तरह से मिक्स कर खरल करें और 30 पुडिया बना लें. एक-एक पुडिया सुबह शाम शहद में मिक्स कर खाना खाने के पहले लेना है. इसे लगातार 15 दिन तक लेने के बाद योग नंबर - 2 का इस्तेमाल करें.


योग नंबर- 2 

वसन्तकुसुमाकर रस - 3 ग्राम, त्रिवंग भस्म- 3 ग्राम, कुक्कुटांडत्वक भस्म - 6 ग्राम, प्रदरारि रस- 6 ग्राम, गोदंती भस्म- 6 ग्राम, प्रवाल पिष्टी- 6 ग्राम और सितोपलादि चूर्ण - 30 ग्राम

सभी को मिक्स कर खरल कर लें और 30 पुड़िया बना दें. एक-एक पुडिया सुबह-शाम शहद में मिक्स कर खाना है और ऊपर से एक कप दूध पीना है. इसे भी खाना के पहले लेना  है सुबह शाम. 

अशोकारिष्ट और पत्रांगासव दोनों 2-2 चम्मच बराबर मात्रा में पानी मिक्स कर भोजन के बाद सुबह शाम लेना है. 

सुपारी पाक एक-एक चम्मच सुबह शाम दूध से लेना है. योग नंबर- 2 और दूसरी दवाओं को लगातार कम से कम 45 दिन यूज़ करना चाहिए. कब्ज़ न होने दें, त्रिफला चूर्ण या सफगोल को रात में सोने पहले लिया करें. 


मिर्च, मसाला, फ़ास्ट फ़ूड, और खट्टी चीजों से परहेज़ रखें. हल्का सुपाच्य भोजन करें. फिटकरी के पानी से प्राइवेट पार्ट की सफ़ाई भी करना चाहिए. 

यहाँ बताया गया आयुर्वेदिक योग ल्यूकोरिया को दूर करने में 100% इफेक्टिव है. आयुर्वेदिक डॉक्टर की देख रेख में यूज़ करें, और बीमारी से छुटकारा पायें. 

आयुर्वेदिक प्रैक्टिस करने वाले जो लोग भी हमें फॉलो करते हैं, इसे अपने रोगियों पर प्रयोग कर धन और यश कमायें. 



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27 January 2018

लोहासव के फ़ायदे | Cure Anemia with Herbal Iron Syrup- Lohasava


लोहासव एक क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है हो आयुर्वेदिक आयरन टॉनिक की तरह काम करती है. यह आयरन की कमी से होने वाली बीमारीओं को दूर करती है. 

लोहासव जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है लोहा यानि आयरन इसका मेन इनग्रीडेंट होता है. यह सिरप फॉर्म में होता है. आयुर्वेद में दो तरह के सिरप होते हैं - आसव और रिष्ट. आसव को बिना उबाले बनाया जाता है जबकि रिष्ट जो होता है, उसे जड़ी-बूटियों को उबालकर काढ़ा बनाने के बाद बनाया जाता है. आसव और अरिष्ट में यही बेसिक डिफरेंट होता है. इन सब की डिटेल में न जाकर आईये बात करते हैं लोहासव के कम्पोजीशन की - 

शुद्ध लोहे का बुरादा- 

सोंठ

काली मिर्च

पिप्पली

हर्रे

बहेड़ा 

आंवला 

अजवाइन 

विडंग 

मोथा

चित्रकमूल- प्रत्येक 192 ग्राम 

धातकी - 960 ग्राम 

शहद - 3 किलो 

गुड़- 9.6 किलो और पानी- 24.5 लीटर के मिश्रण से आसव निर्माण विधि से इसका आसव बनाया जाता है. 


लोहासव के फ़ायदे- 

आयरन की कमी, खून की कमी या एनीमिया, जौंडिस, लीवर और स्प्लीन के रोग, कमज़ोर पाचन शक्ति, भूख की कमी, गैस, जलोदर जैसी प्रॉब्लम में इसका इस्तेमाल करना चाहिए. 

यह आयरन रिच होते हुवे भी अंग्रेज़ी दवाओं की तरह कब्ज़ नहीं होने देता है. 
बीमारी के बाद की कमज़ोरी, खाँसी, अस्थमा, शुगर, मलेरिया, टाइफाइड जैसी पुरानी बुखार, पाइल्स, फिशचूला, त्वचा रोग और ह्रदय रोगों में भी इस से फ़ायदा होता है. 

कुल मिलाकर देखा जाये तो आयरन की कमी को दूर करने वाली यह आयुर्वेद की बेहतरीन दवाओं में से एक है जो बिना किसी साइड इफ़ेक्ट के काम करती है. 


लोहासव की मात्रा और सेवन विधि - 

15 से 30 ML तक बराबर मात्रा में पानी मिलाकर खाना के बाद रोज़ दो बार लेना चाहिए. यह ऑलमोस्ट सेफ़ दवा है, किसी तरह का नुकसान नहीं होता. पर इसके टेस्ट की वजह से किसी किसी को इसे पिने के बाद उल्टी हो सकती है और सभी को सूट नहीं करता. बच्चे-बड़े सभी यूज़ कर सकते हैं. प्रेगनेंसी में इसका इस्तेमाल न करना ही बेहतर है. 

डाबर, बैद्यनाथ, पतंजलि जैसी आयुर्वेदिक कम्पनी का यह मिल जाता है, इसे ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं निचे दिए लिंक से- 




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26 January 2018

Spirulina Benefits Side Effects in Hindi | स्पिरुलिना के फ़ायदे और नुकसान


स्पिरुलिना एक ऐसी वनस्पति है जिसे दुनियाभर में सुपर फ़ूड की तरह इस्तेमाल किया जाता है, यह ज़रूरी विटामिन्स और पोषक तत्वों से भरपूर होता है जिस से कई तरह की बीमारियों में फ़ायदा होता है. तो आईये जानते हैं स्पिरुलिना के फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

सबसे पहले जानते हैं कि स्पिरुलिना है क्या चीज़?

स्पिरुलिना जो है पानी में पाया जाने वाला एक तरह का शैवाल है जिसे जलीय वनस्पति कह सकते हैं जो कि हरे रंग का होता है. यह प्राकृतिक झरनों, झीलों और नदियों में पाया जाता है. 

स्पिरुलिना विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर होता है, एक तरह से यह पोषक तत्वों का भंडार होता है. इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, मैग्नीशियम, आयरन और विटामिन्स से भरपूर होता है. 

अगर दूसरी चीज़ों से Compare करे तो इसमें पालक से पचास गुना ज़्यादा आयरन होता है, दूध से पांच गुना ज़्यादा कैल्शियम, सोया बीन से तीन गुना ज़्यादा प्रोटीन, गाजर से दस गुना ज़्यादा बीटा कैरोटीन होता है. 

स्पिरुलिना के फ़ायदे- 


  • ब्लड प्रेशर, ह्रदय रोग और कोलेस्ट्रॉल के लिए -


ये आपके खून से कोलेस्ट्राल का लेवल कम करके BP को नार्मल करता है. इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्वों में कई ऐसे हैं जिनसे ह्रदय में रक्त संचार प्रभावी ढंग से बढ़ता है. इसकी सहायता से ह्रिदय के तमाम जोखिमों को कम किया जा सकता है.


  • प्रेगनेंसी के लिए - 


आयरन की प्रचुर मात्रा स्पिरुलिना को गर्भावस्था के दौरान एक आवश्यक आहार बनाता है. इसकी सहायता से अनीमिया को दूर किया जा सकता है. कब्ज वगैरह के लिए भी ये बेहद कारगर साबित होता है.



  • त्वचा के लिए-


स्पिरुलिना में त्वचा के स्वास्थ्य के लिए जरुरी विटामिन ए, बी-12, ई, फास्फोरस, लोहा और कैल्शियम आदि पाए जाते है. अपने इन तत्वों की बदौलत स्पिरुलिना आपकी त्वचा को नर्म-मुलायम और चमकदार बनाती है. यही नहीं ये आँखों के निचे के धब्बे और ड्राई आईज के उपचार में भी लाभदायक है.


  • शुगर या डायबिटीज के लिए -


मधुमेह के मरीजों के लिए भी स्पिरुलिना काफी असरदार है. इसे नियमित रूप से लेने से आपका शुगर कम होता है. ये सूजन को कम करके रक्तचाप और कोलेस्ट्राल का स्तर भी निचे लाता है.


  • पेट के रोगों गैस्ट्रिक और अल्सर के लिए - 


उच्च गुणवत्ता वाली प्रोटीन, सिस्टीन और एमिनो एसिड की इसमें उपस्थिति इसे ड्यूइडनल अल्सर और गैस्ट्रिक के लिए फ़ायदेमंद है. इसके अलावा इसमें पाया जाने वाला क्लोरोफिल पाचन शक्ति को इम्प्रूव करता है. 


  • कैंसर से बचाव के लिए - 


अनेकों पोषक तत्वों से परिपूर्ण स्पिरुलिना कैंसर के रोकथाम में भी सकरात्मक भूमिका निभाती है. ये  एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में ये हमारे शरीर से फ्री रेडिकल्स को नष्ट करता है. जाहिर है फ्री रेडिकल्स कैंसर का कारण बनते हैं. इसके अतिरिक्त इसमें फिनोलिक नामक यौगिक भी उपस्थित रहता है जो कि कार्सिनोजेनेसिस पर रोक लगाता है.


  • मोटापा दूर करने के लिए - 


जिनका वजन बहुत ज्यादा है उनके लिए इसका सेवन राम बाण साबित होता है. क्योंकि इसमें फैटी एसिड, बीटा कैरोटिन, क्लोरोफिल और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं. ये सब मिलकर आपके शरीर में पोषक तत्वों की उपथिति को बनाए रखते हुए आपका भूख कम करते हैं. जिससे कि आपका वजन कम होता है.


  • लीवर को दुरुस्त रखने में-


स्पिरुलिना में प्रचुर मात्रा में मौजूद फाइबर और प्रोटीन आपके लीवर के स्वास्थ्य का ख्याल रखते हैं. लीवर के सामान्य कामकाज को बढ़ाने के अलावा यह लीवर को पुराने हेपेटाईटिस के मरीजों के लिए लाभकारी साबित होता है.



  • आँखों की बीमारियों के लिए-


कई शोधों में स्पिरुलिना को आँखों के लिए भी लाभदायक बताया गया है. आँखों के कई बीमारियों जैसे कि जेराट्रिक मोतियाबिंद, नेफ्रैटिक रेटिनल क्षति, मधुमेह रेटिनल क्षति आदि के उपचार में इसका सकारात्मक प्रभाव देखा गया है.


  • रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए -


स्पिरुलिना को लेकर कई शोध हुए हैं. इनमें से कई शोधों में ये पता चला है कि इसके सेवन से इम्युनिटी पॉवर बढ़ती है और कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ाने में भी ये सहायक सिद्ध होता है.


  • वायरल संक्रमण में-


स्पिरुलिना का इस्तेमाल वायरल इन्फेक्शन के उपचार में सहायक के रूप में होता है. इसमें सूजन को कम करने वाले तत्व मौजूद होते हैं. ये हानिकारक मुक्त कणों को नष्ट करके वायरल संक्रमण के असर को कम करता है.

दिमाग तेज़ करने और मानसिक रोगों के लिए -

स्पिरुलिना के इस्तेमाल से दिमाग को ताक़त मिलती है, दिमाग तेज़ होता है, चिंता, तनाव जैसे मानसिक रोगों से बचाता है. 


स्पिरुलिना कोई यूज़ कैसे करते हैं?

इसका टेबलेट एक-एक सुबह शाम ले सकते हैं. पाउडर को पानी से या जूस, ड्रिंक या चाय वगैरह में भी मिक्स कर लिया जाता है. 

आईये अब जानते हैं स्पिरुलिना के नुकसान के बारे में - 

ऑटो इम्यून से पीड़ित व्यक्ति को इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए. इसे लॉन्ग टाइम तक यूज़ नहीं करें और डॉक्टर की सलाह के बिना इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. 

स्पिरुलिना का पाउडर और टेबलेट ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं  निचे दिए गए लिंक से -