आयुर्वेदिक दवाओं और जड़ी बूटी की जानकारी और बिमारियों को दूर करने के आयुर्वेदिक फ़ार्मूले और घरेलु नुस्खे की जानकारी हम यहाँ आपके लिए प्रस्तुत करते हैं

18 June 2018

Dabur Hepano for Healthy Liver | डाबर हेपानो के फ़ायदे


हेपानो जानी-मानी आयुर्वेदिक कम्पनी डाबर का पेटेंट या प्रोपरायटरी ब्रांड है जो लिवर की बीमारियों में असरदार है. तो आईये जानते हैं डाबर हेपानो का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

डाबर हेपानो का कम्पोजीशन - 

इसे लिवर के फंक्शन को सही करने वाली जानी-मानी जड़ी-बूटियों से बनाया गया है. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसमें  - 

भूमिआँवला, गुडूची, निम्बा, कालमेघ, हरीतकी, आमलकी, विभितकी, कुटकी और पिप्पली मिला होता है. इसके टेबलेट और सिरप दोनों का कम्पोजीशन ऑलमोस्ट सेम होता है. 


डाबर हेपानो के फ़ायदे - 


  • हैवी मेटल्स और केमिकल वाले भोजन से लिवर को होने वाले नुकसान से बचाता है. 



  • SGOT, SGPT बढ़ा होने, जौंडिस, लिवर की ख़राबी और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों में असरदार है. 



  • यह लिवर के फंक्शन को सही करता है और लिवर को हेल्दी बनाता है. 



  • यह लिवर को डैमेज करने वाले कारणों से बचाता है. भूख बढ़ाने और पाचनशक्ति को ठीक करने में मदद करता है. 



  • नार्मल आदमी भी इसे लिवर को हेल्दी रखने के लिए इस्तेमाल कर सकता है.



डाबर हेपानो का डोज़- 

5 से 10 ML तक सुबह शाम खाना के पहले. इसका टेबलेट 1 से 2 सुबह शाम या फिर डॉक्टर की सलाह के अनुसार लेना चाहिए. इसके 200ML के बोतल की क़ीमत 85 रुपया है जबकि इसके 60 टेबलेट की क़ीमत 75 रुपया है. इसे ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं निचे दिए लिंक से -  




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16 June 2018

Chandanadi Lauh | चन्दनादि लौह(प्रमेह) के फ़ायदे


चन्दनादि लौह हर तरह के प्रमेह की असरदार आयुर्वेदिक औषधि है. इसके इस्तेमाल से प्रमेह, पेशाब के साथ मेह, शुक्र, पस सेल्स, ब्लड सेल्स, फॉस्फेट, साल्ट, प्रोटीन वगैरह आने की प्रॉब्लम दूर होती है. तो आईये जानते हैं चन्दनादि लौह का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल के बारे में पूरी डिटेल - 

चन्दनादि लौह नार्मल जो होता है वो उसका कम्पोजीशन अलग है. यहाँ चन्दनादि लौह प्रमेह के बारे में बताया जा रहा है. 

चन्दनादि लौह(प्रमेह) के घटक या कम्पोजीशन - 

इसके घटक या कम्पोजीशन की बात करें तो इसमें चन्दन और लौह भस्म के अलावा कई तरह की जड़ी-बूटियाँ मिली होती हैं जैसे- 

सफ़ेद चन्दन, सेमल के फूल, दालचीनी, इलायची के बीज, तेजपात, हल्दी, दारुहल्दी, अनंतमूल, श्यामलता, नागरमोथा, मुलेठी, आँवला, मुसली, वंशलोचन, भारंगी, देवदार, बड़ी हर्रे और ख़स प्रत्येक एक-एक भाग और लौह भस्म 36 भाग. यानी अगर जड़ी-बूटियाँ दस-दस ग्राम ले रहे हैं तो लौह भस्म 360 ग्राम लेना है. 

बनाने का तरीका यह है कि सभी जड़ी-बूटियों का बारीक कपड़छन चूर्ण कर लें और उसमे लौह भस्म मिलाकर अच्छी तरह से घोंटकर रख लें. बस चन्दनादि लौह तैयार है. यह भैषज्य रत्नावली का योग है. 

चन्दनादि लौह के फ़ायदे- 


  • यह हर तरह के प्रमेह की श्रेष्ठ औषधि है. जब पेशाब के साथ प्रोटीन, फैट, साल्ट, पस सेल्स, ब्लड, फॉस्फेट वगैरह कुछ भी आने लगे तो इसका सेवन करना चाहिए. 



  • जब यूरिन टेस्ट में इस तरह की चीज़ें पाई जाएँ तो चन्दनादि लौह और चंद्रप्रभा वटी दोनों को मिलाकर शहद के साथ लेना चाहिए. 



  • जीर्ण ज्वर या पुरानी बुखार में इसका प्रयोग कराया जाता है ख़ासकर जब एंटी बायोटिक से फ़ायदा न होता हो तो इसका इस्तेमाल करना चाहिए. 



  • कामला, जौंडिस और खून कमी में भी यह फ़ायदेमंद है. 


चन्दनादि लौह की मात्रा और सेवन विधि - 

125 से 250 mg तक सुबह शाम शहद से या फिर आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से रोगानुसार उचित अनुपान से लेना चाहिए. यह ऑलमोस्ट सेफ़ दवा है सही डोज़ में लेने से किसी तरह का कोई साइड इफ़ेक्ट या नुकसान नहीं होता है. 


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Drakshavaleha Benefits | द्राक्षावलेह लिवर की बीमारी और एनीमिया की औषधि


द्राक्षावलेह क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो लिवर की बीमारियों के लिए बेहद असरदार है. तो आईये जानते हैं द्राक्षावलेह का कम्पोजीशन, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

द्राक्षावलेह जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है इसे द्राक्षा या मुनक्का से बनाया जाता है जो की अवलेह या हलवे की तरह होता है, ठीक वैसा ही जैसा कि च्यवनप्राश होता है. 

द्राक्षावलेह का कम्पोजीशन - 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बनाने के लिए चाहिए होता है द्राक्षा- 768gram , पिप्पली-768gran, चीनी- 2.4kg, यष्टिमधु-96gram, सोंठ-96gram, वंशलोचन-96gram, आँवला जूस- 12 liter  और शहद - 768gram

द्राक्षावलेह निर्माण विधि - 

बनाने का तरीका यह है कि सबसे पहले सोंठ, पीपल और यष्टिमधु का बारीक चूर्ण बनाकर रख लें. कड़ाही में आँवला जूस डालें और पिसा हुवा द्राक्षा, चीनी और जड़ी बूटियों का चूर्ण मिक्स कर गाढ़ा होने तक पकाएं. इसके बाद चूल्हे से उतार कर वंशलोचन मिक्स करें और पूरी तरह से ठंडा होने पर सबसे लास्ट में शहद मिक्स कर काँच के जार में पैक कर रख लें. बस यही द्राक्षावलेह है. 


द्राक्षावलेह के फ़ायदे- 

लिवर की बीमारियों के लिए यह एक अच्छी दवा है. लिवर का बढ़ जाना, जौंडिस और अनेमिया या खून की कमी में बेहद असरदार है. 

यह लिवर के फंक्शन को सही करता है और लिवर प्रोटेक्टिव का भी काम करता है. 

सीने की जलन, हाइपर एसिडिटी, भूख की कमी और पेट के रोगों में भी असरदार है. 

शराब पिने वाले लोग अगर इसका इस्तेमाल करें तो लिवर को प्रोटेक्ट कर सकते हैं. 

द्राक्षावलेह की मात्रा और सेवन विधि - 

पाँच से दस ग्राम तक सुबह शाम खाना के बाद गर्म पानी, दूध या शहद के साथ लेना चाहिए.  बच्चों को कम डोज़ में देना चाहिए. बच्चे बड़े-बूढ़े सभी यूज़ कर सकते हैं. 

प्रेगनेंसी में भी खून की कमी को दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है. डायबिटीज वालों को इसे यूज़ नहीं करना चाहिए चीनी और शहद की मात्रा होने से. डाबर के 250 ग्राम की क़ीमत 185 रुपया है अमेज़न डॉट इन में, इसे ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं दिए लिंक से - 



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Kaminividrawan Ras | कामिनीविद्रावण रस


कामिनीविद्रावण रस क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो पुरुष यौन रोगों में बेहद असरदार है. यह वीर्य को गाढ़ा कर स्तम्भन शक्ति को बढ़ाती है और शीघ्रपतन को दूर करती है. तो आईये जानते हैं कामिनीविद्रावण रस का कम्पोजीशन, इसके फायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

कामिनीविद्रावण रस के घटक या कम्पोजीशन-

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बनाने के लिए चाहिए होता है अकरकरा, सोंठ, लौंग, केसर, पीपल, जायफल, जावित्री और चन्दन प्रत्येक 10-10 ग्राम. शुद्ध सिंगरफ और शुद्ध गंधक प्रत्येक 2.5 ग्राम और शुद्ध अफ़ीम 40 ग्राम. 

कामिनीविद्रावण रस निर्माण विधि - 

बनाने का तरीका यह है कि सबसे पहले सिंगरफ, शुद्ध गंधक और अफ़ीम को अच्छी तरह से घोटने के बाद दूसरी जड़ी-बूटियों का बारीक कपड़छन चूर्ण मिक्स कर, ठन्डे पानी में घोटकर दो-दो रत्ती या 250mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. बस कामिनीविद्रावण रस तैयार है!

कामिनीविद्रावण रस के फ़ायदे- 


  • वीर्य को गाढ़ा करने, स्तम्भन शक्ति बढ़ाने और शुक्रवाहिनी नाड़ियों को ताक़त देने वाली यह बेजोड़ दवा है. 



  • यह वीर्य स्तम्भन करती है, जल्द डिस्चार्ज नहीं होने देती जिस से शीघ्रपतन में बेहद फ़ायदा होता है. 



  • हस्तमैथुन, स्वप्नदोष और बचपन की ग़लतियों की वजह से होने वाली कमज़ोरी, शीघ्रपतन और वीर्य का पतलापन दूर करने के लिए यह एक बेजोड़ रसायन है. 



  • कुल मिलाकर समझ लीजिये कि वीर्य का पतलापन, शीघ्रपतन और इरेक्टाइल डिसफंक्शन के लिए यह एक इफेक्टिव मेडिसिन है. 


कामिनीविद्रावण रस की मात्रा और सेवन विधि - 

एक गोली रात में सोने से एक घंटा पहले एक ग्लास दूध से लेना चाहिए. यह अफीम वाली दवा है इसका ध्यान रखें, इस से अगर कब्ज़ियत हो तो सुबह-सुबह गर्म दूध पीना चाहिए. इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ही यूज़ करना चाहिए, ज़्यादा डोज़ होने से नुकसान हो सकता है. 

डाबर, बैद्यनाथ और मुल्तानी जैसी आयुर्वेदिक कंपनियों की यह मिल जाती है. बैद्यनाथ के 10 ग्राम या 40 टेबलेट की क़ीमत क़रीब 1575 रुपया है अमेज़न में. इसे ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं निचे दिए गए लिंक से - 



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Agnivardhak Vati | अग्निवर्धक वटी भूख बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक औषधि


अग्निवर्धक वटी क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो भूख बढ़ाती है, इसके इस्तेमाल से पेट का भारीपन, पेट फूलना, मन्दाग्नि, कब्ज़ और  खट्टी डकार आना जैसी प्रॉब्लम दूर होती है. तो आईये जानते हैं अग्निवर्धक वटी का कम्पोजीशन, बनाने का तरीका, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

अग्निवर्धक वटी के घटक या कम्पोजीशन- 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसके लिए चाहिए होता है काला नमक, काली मिर्च, नौसादर, आक के फूलों का लौंग प्रत्येक 5-5 ग्राम, निम्बू का सत्त- 320 ग्राम और निम्बू का रस भी चाहिए होता है भावना देने के लिए.

बनाने का तरीका यह है कि सबसे पहले काली मिर्च, आक के फूलों का लौंग और काला नमक को पिस लें और उसमे नौसादर और निम्बू का सत्व मिलाकर खरल करें, अब निम्बू का रस डालकर घुटाई कर चने के बराबर की गोलियां बनाकर सुखाकर रख लें. बस अग्निवर्धक वटी तैयार है. 

अग्निवर्धक वटी के गुण - 

आयुर्वेदानुसार यह दीपक, पाचक-अग्निवर्धक है यानी भूख बढ़ाने वाला, अग्नि प्रदीप्त करने वाला Digestive Enzyme है. 

अग्निवर्धक वटी के फ़ायदे- 

भूख नहीं लगना, खाने में अरुचि होना, पेट का भारीपन, कब्ज़ जैसी प्रॉब्लम के इसका सेवन करना चाहिए. 

पेट फूलना, पेट में गुड़-गुड़ आवाज़ होना, बेचैनी और आलस में असरदार है. 

यह स्वाद में टेस्टी होती है, मुंह में रखते ही मुँह का मज़ा ठीक होता है और खाने में रूचि आती है. 

अग्निवर्धक वटी की मात्रा और सेवन विधि - 

एक-एक गोली गुनगुने पानी से रोज़ दो-तिन बार या फिर ऐसी ही मुँह में रखकर चुसना चाहिए. बच्चे-बड़े सभी यूज़ कर सकते हैं बस आयु के अनुसार सही डोज़ होना चाहिए. 


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Herbal Medicines for Piles & Fistula | बवासीर और भगन्दर की आयुर्वेदिक दवाएँ - वैद्य जी की डायरी - 9


पाइल्स और फिश्चूला के लिए मैं तो कम से कम तीन दवाओं को रीकोमेंड करता हूँ नंबर वन- कंकायण वटी अर्श, नंबर टू- त्रिफला गुग्गुल और नंबर तीन पर आता है- दिव्य अर्शकल्प वटी

पाइल्स और फिश्चूला की बढ़ी हुयी कंडीशन में भी अगर तीनों को दो-दो टेबलेट सुबह शाम छाछ के साथ लिया जाये तो अच्छा रिजल्ट मिलता है. 

ख़ूनी और बादी बवासीर या ब्लीडिंग और नॉन ब्लीडिंग पाइल्स और फिश्चूला इन दवाओं के इस्तेमाल से ठीक हो जाता है. 

पतंजलि के अर्श कल्प वटी की जगह पर आप हिमालया का पाईलेक्स भी यूज़ कर सकते हैं. इन सब के साथ अभ्यारिष्ट या फिर बड़ी हर्रे का चूर्ण  भी लिया जा सकता है. 


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Gulma Kalanal Ras | गुल्मकालानल रस | Lakhaipur


गुल्मकालानल रस क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो गुल्म या पेट में गोला बनने वाली बीमारी में बेहद असरदार है. तो आईये जानते हैं गुल्मकालानल रस के घटक या कम्पोजीशन, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 
गुल्मकालानल रस के घटक - 

जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है यह रसायन औषधि है जिसमे पारा-गन्धक के अलावा दूसरी जड़ी-बूटियाँ होती हैं. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बनाने के लिए चाहिए होता है शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, टंकण भस्म, ताम्र भस्म, शुद्ध हरताल सभी 20-20 ग्राम, जावाखार- 100 ग्राम, सोंठ, मिर्च, पीपल, नागरमोथा, गजपीपल, हर्रे, बच और कूठ 10-10 ग्राम लेना है. 

गुल्मकालानल रस निर्माण विधि - 

बनाने का तरीका यह है कि सबसे पहले पारा-गंधक की कज्जली बना लें और उसके जड़ी-बूटियों का चूर्ण और भस्म मिक्स कर नागरमोथा, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, सोंठ, पाठा और अपामार्ग के काढ़े की अलग-अलग एक-एक भावना देकर अच्छी तरह से खरलकर 500 mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लिया जाता है. 

गुल्मकालानल रस के गुण -

आयुर्वेदानुसार यह वात या वायु नाशक है. तासीर में गर्म है. यह कफ़ दोष को भी कम करता है. यह पाचक, मूत्रल, गैस और कब्ज़ नाशक गुणों से भरपूर होता है. 

गुल्मकालानल रस के फ़ायदे - 

गुल्म या पेट में गोला बनना, पेट में गैस, आँतों में मल की गाँठ बनना और पेट फूलना जैसी प्रॉब्लम में यह दवा बेहद असरदार है. 

कफज, पित्तज और वातज हर तरह के गुल्म में रोगानुसार उचित अनुपान से आयुर्वेदिक डॉक्टर इसका प्रयोग कराते हैं. 

गुल्मकालानल रस की मात्रा और सेवन विधि - 

एक से दो गोली तक सुबह-शाम हर्रे के काढ़े के साथ लेना चाहिए. या फिर आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से रोगानुसार उचित अनुपान के साथ लेना चाहिए. चूँकि यह रसायन औषधि है तो इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ही यूज़ करें. आयुर्वेदिक कंपनियों का यह मिल जाता है, इसे आप ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं. 

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11 June 2018

Vat Gajankush Ras Benefits in Hindi | वातगजांकुश रस


वातगजांकुश रस जो है वात रोगों की आयुर्वेद की जानी-मानी औषधि  है जो गठिया, साइटिका, लकवा, Spondylosis और जकड़न जैसे वात रोगों में प्रयोग की जाती है. तो आईये जानते हैं वातगजांकुश रस क्या है? इसका कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

वातगजांकुश रस यानी हाथी जैसे बड़े वात रोगों पर अंकुश लगाने या कण्ट्रोल करने वाली रसायन औषधि. वात रोगों को आयुर्वेद में हाथी जैसा बड़ा माना गया है जो की सच है. आपने देखा ही होगा कि गठिया या आर्थराइटिस जैसे रोग जल्दी नहीं जाते हैं. 

वातगजांकुश रस का कम्पोजीशन- 

यह हैवी मेटल वाली रसायन औषधि है जिसमे पारा-गंधक के अलावा भस्म और जड़ी-बूटियाँ होती हैं. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसमें मिला होता है - रस सिन्दूर, लौह भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म, शुद्ध गंधक, शुद्ध हरताल, हर्रे, काकड़ासिंघी, शुद्ध बच्छनाग, अरनी के जड़ की छाल, सोंठ, काली मिर्च, पीपल और शुद्ध सुहागा या टंकण भस्म सभी बराबर मात्रा में लेना होता है. 

वातगजांकुश रस निर्माण विधि - 

बनाने का तरीका यह होता है कि सबसे पहले रस सिन्दूर, शुद्ध गंधक और दुसरे भस्मों को अच्छी तरह से खरल कर मिक्स करें और उसका बाद जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण मिक्स कर गोरखमुंडी और निर्गुन्डी के रस में एक-एक दिन घोंटकर 125 mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें, यही वातगजांकुश रस है. 

वातगजांकुश रस के गुण(Properties)- 

आयुर्वेदानुसार यह वात और कफ़ नाशक है. दर्द-सुजन नाशक, एंटी इंफ्लेमेटरी, Anti-arthritic, Detoxifier और जकड़न दूर करने वाले गुणों से भरपूर होता है. 

वातगजांकुश रस के फ़ायदे - 

गठिया, साइटिका, लकवा, पक्षाघात, Spondylosis और जकड़न वाले ऑलमोस्ट हर तरह के वात रोगों की यह बेहद असरदार दवा है जिसे आयुर्वेदिक डॉक्टर वातरोगों से ग्रसित रोगियों पर इसका सफ़लतापूर्वक प्रयोग कराते हैं. 

आयुर्वेद में इसका बड़ा ही गुणगान किया गया है. और ऐसे भी यह काफ़ी असरदार दवा है अगर सही से इसका इस्तेमाल किया जाये. 

वातगजांकुश रस की मात्रा और सेवन विधि - 

एक-एक गोली सुबह शाम रास्नादी क्वाथ या दशमूल क्वाथ के साथ लेना चाहिए. या फिर डॉक्टर की सलाह के अनुसार उचित अनुपान से. इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए, नहीं तो नुकसान भी हो सकता है. 

आयुर्वेदिक कम्पनियों का यह मिल जाता है, इसे ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं. 


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09 June 2018

Gallstone Treatment | पित्त पत्थरी की आयुर्वेदिक चिकित्सा | Vaidya Ji Ki Diary # 11


जैसा कि आप सभी जानते ही हैं पित्त की थैली में होने वाली पत्थरी को गालस्टोन कहते है. यह अधिकतर छोटी-छोटी कई सारी होती हैं जिसे मल्टीप्ल स्टोन कहा जाता है, जबकि बड़े साइज़ में अकेली भी हो सकती है. एलोपैथिक वाले तो मानते ही नहीं कि यह दवा से भी निकल सकती है. पर सच्चाई तो यह है कि सही आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से अधिकतर लोगों की यह बिना ऑपरेशन निकल जाती है. तो आईये जानते हैं बिना ऑपरेशन पित्त पत्थरी को दूर करने वाले आयुर्वेदिक योग की पूरी डिटेल - 

गॉलस्टोन का ऑपरेशन कराने से पहले यह ज़रूर जान लीजिये की इसके ऑपरेशन में न सिर्फ स्टोन को निकाला जाता है बल्कि पूरा गॉलब्लैडर या पित्त की थैली ही निकाल दी जाती है. इसका ऑपरेशन होने के बाद लाइफ़ टाइम के लिए आपको Digestion की प्रॉब्लम हो सकती है क्यूंकि गॉलब्लैडर पाचक पित्त का स्राव करता है जिस से Digestion में मदद मिलती है. 

वैसे तो पहले ही मैं पित्त पत्थरी के लिए दो तरह के उपाय बता चूका हूँ जिसमे ठंडाई वाला आसान सा घरेलु प्रयोग है, दूसरा एप्पल जूस वाला थोडा इजी नहीं है. पर आज जो बताने वाला हूँ वो पूरी तरह से आयुर्वेदिक योग है- 

पित्ताश्मरी नाशक योग - 

इसके लिए आपको चाहिए होगा ताम्र भस्म - 10 ग्राम और शंख वटी - 50 ग्राम 
शंख वटी को खरल में डालकर पिस लें और ताम्र भस्म को अच्छी तरह से मिक्स कर खरल कर बराबर मात्रा की सादे कागज़ में 120 पुड़िया बनाकर एयर टाइट डब्बे में रख लें. 

इस्तेमाल का तरीका यह है कि एक-एक पुडिया सुबह शाम लेना है करेला जूस - 20 ML + कुमार्यासव 20 ML + रोहितकारिष्ट - 20 ML के साथ भोजन के एक घंटा के बाद. 

बताया गया आयुर्वेदिक योग गॉलस्टोन को घुलाकर निकाल देता है. 90% लोगों को इस से फ़ायदा हो जाता है. 

इस योग का इस्तेमाल करने से पहले सोनोग्राफी से गॉलस्टोन का साइज़ और संख्या पता कर लें और साठ दिनों के बाद दुबारा सोनोग्राफी करा लेना चाहिए. 

छोटी साइज़ वाली मल्टीप्ल स्टोन तो 60 दिनों में ही निकल जाती है, बड़ी स्टोन के लिए ज़्यादा दिनों तक दवा लेनी पड़ सकती है. 

अगर किसी को दवा इस्तेमाल करने के 60 दिनों बाद भी पत्थरी के साइज़ में कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है तो लास्ट आप्शन ऑपरेशन या फिर लिथोट्रिप्सी ही हैइसे . 

परहेज़- इस योग का इस्तेमाल करते हुवे दूध, दूध से बनने वाली चीज़, मिठाई, उड़द की दाल, तेल-मसाले वाले भोजन और देर से पचने वाले फूड़ नहीं खाना चाहिए. 

आज के इस योग में बताई गयी दवाएँ जैसे ताम्र भस्म, शंख वटी, कुमार्यासव, रोहितकारिष्ट बैद्यनाथ या डाबर जैसी अच्छी कम्पनी का ही यूज़ करें. करेला तो हर जगह मिल ही जाता है, जूसर में डालकर इसका फ़्रेश जूस बनाकर यूज़ करना है. 

नोट- गॉलस्टोन की सीरियस कंडीशन या Complication वाली कंडीशन में इसका इस्तेमाल न करें. 

तो दोस्तों वैद्य जी डायरी में ये था आज का योग पित्त पत्थरी को दूर करने का. इस तरह की उपयोगी जानकारी आपको और कहीं नहीं मिलेगी. हाँ कुछ बेवकूफ़ नीम-हकीम लोग मेरी दी गयी जानकारी को कॉपी करने लगे हैं. अगर आपको मेरी दी गयी जानकारी की नकल कहीं दिखती है तो कमेंट कर ज़रुर बताएं. 


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04 June 2018

Himalaya Diabecon DS/Glucocare Review | हिमालया डायबिकॉन\ग्लुकोकेयर के फ़ायदे


हिमालया डायबिकॉन टेबलेट डायबिटीज या शुगर को कण्ट्रोल करने की हर्बल दवा है जो हर तरह की डायबिटीज में असरदार है. अमेरिका में यह ग्लुकोकेयर के नाम से मिलती है, तो आईये जानते हैं हिमालया डायबिकॉन का कम्पोजीशन, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

हिमालया डायबिकॉन टेबलेट का कम्पोजीशन - 

हिमालया डायबिकॉन हर्बल मिनरल मेडिसिन है जिसमे जड़ी-बूटियों के अलावा भस्मों का भी मिश्रण होता है. 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे - शुद्ध गुग्गुल-30mg, शुद्ध शिलाजीत-30mg, मेहश्रृंगी-30mg, पित्तसारा- 20mg, मुलेठी-20mg, सप्तरंगी-20mg, जम्बू-20mg, शतावरी-20mg, पुनर्नवा-20mg, मुंडतिका-10mg, गुडूची-10mg, चिरैता-10mg, भूमि आमला-10mg, गंभारी-10mg, कर्पसी-10mg, दारूहल्दी-5mg, घृतकुमारी-5mg, त्रिफला-3mg, विडंगादि लौह-27mg, सुश्वी-20mg, काली मिर्च-10mg, तुलसी-10mg, अतिबला-10mg, अभ्रक भस्म-10mg, प्रवाल भस्म-10mg, जंगली पालक-5mg, वंग भस्म-5mg, हल्दी-10mg, अकीक पिष्टी-5mg, शुद्ध शिंगरफ-5mg, यशद भस्म-5mg और त्रिकटु-5mg का मिश्रण होता है. डायबिकॉन DS टेबलेट में इन सभी को दोगुनी मात्रा होती है.

हिमालया डायबिकॉन के गुण(Properties)- 

यह Anti-diabetic है. इन्सुलिन Secretion को बढ़ाने वाला और पंक्रियास को ताक़त देने वाले गुणों से भरपूर होता है. 

हिमालया डायबिकॉन के फ़ायदे- 

प्री डायबिटीज, नई डायबिटीज, टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के लिए यह असरदार दवा है. 

यह शुगर लेवल को कम कर नार्मल कर देता है. टाइप-2 वाले शुगर रोगी को शुगर लेवल को मेन्टेन करने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहिए. 

हिमालया डायबिकॉन का डोज़- 

ब्लड शुगर की बढ़ी हुयी कंडीशन में डायबिकॉन टेबलेट दो-दो सुबह शाम लेना चाहिए खाना खाने के एक घंटा पहले. जबकि डायबिकॉन टेबलेट एक-एक सुबह शाम लें. इसी तरह इसका कैप्सूल यानि हिमालया ग्लुकोकेयर भी एक-एक सुबह शाम ले सकते हैं. यह ऑलमोस्ट सेफ़ दवा है, सही डोज़ में लेने से किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होता है. 

डायबिकॉन DS के 60 टेबलेट की क़ीमत क़रीब 140 रुपया है जबकि ग्लुकोकेयर के 180 कैप्सूल की क़ीमत 5000 रुपया है, इसे ऑनलाइन खरीद सकते हैं निचे दिए लिंक से - 




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24 May 2018

Filaria Treatment | फ़ाइलेरिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा- वैद्य जी की डायरी #10


आज वैद्य जी की डायरी में मैं आज बताने वाला हूँ फ़ाइलेरिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे में. 

जी हाँ दोस्तों, आप में से कई लोग अक्सर पूछते रहते हैं इस बीमारी के इलाज के बारे में. तो आईये जानते हैं फ़ाइलेरिया के लिए इफेक्टिव आयुर्वेदिक योग की पूरी डिटेल - 

फ़ाइलेरिया को आयुर्वेद में श्लीपद के नाम से जाना जाता है जिसे हाथी पाँव भी कहते हैं. इसमें पैर हाथी के पैर की तरह मोटा हो जाता है इसीलिए. यहाँ मैं दो तरह का योग बता रहा हूँ जो आपको यूट्यूब और कहीं और भी इन्टरनेट पर आज से पहले नहीं मिला होगा. 

योग नंबर  - 1

यह शास्त्रीय दवाओं का योग है इसके लिए आपको चाहिए होगा -

नित्यानंद रस - 10 ग्राम,

रस माणिक्य - 10 ग्राम, 

शुद्ध गंधक - 20 ग्राम और 

पञ्चतिक्त घृत गुग्गुल - 25 ग्राम

सबसे पहले तो रस माणिक्य को खरल करें और दूसरी दवाओं को मिक्स कर पीसकर बराबर मात्रा की 90 पुड़िया बना लें. इस एक-एक पुड़िया सुबह-दोपहर-शाम सहजन के छाल के क्वाथ से लेना है. 

इसका सेवन करते हुवे पुनर्नवामूल को पीसकर इसका लेप करना है रोज़ दो बार. 

योग नंबर - 2 

यह एक अनुभूत या टेस्टेड योग है जो एक वैद्य जी का है, फ़ाइलेरिया के रोगियों के लिए काफ़ी असरदार है. इसे बनाने के लिए चाहिए होता है- 

सिहोरा की छाल, त्रिफला, एरण्ड के जड़ की छाल, रास्ना और पुनर्नवा की जड़ प्रत्येक एक एक किलो और गोमूत्र 20 लीटर. 

सभी चीजों को मोटा-मोटा कूटकर गोमूत्र में भीगा दें और 24 घंटे के बाद कड़ाही में डालकर उबालें, जब 5 लीटर बचे तो ठण्डा होने पर छान लें और उसमे 500 ग्राम बड़ी हर्रे के छिल्का का बारीक चूर्ण मिक्स कर पकाएं. जब गोली बनाने लायक गाढ़ा हो जाये तो मटर के बराबर की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. इसका नाम श्लिपदारि गुटिका है. 

इसे दो-दो गोली रोज़ दो से तीन बार तक पानी से लेना है. नया-पुराना हर तरह का फ़ाइलेरिया तीन से छह महिना में दूर हो जाता है. 

योग नंबर दो सभी लोग को पसंद नहीं होता क्यूंकि इसमें गोमूत्र है और बनाना भी आसान नहीं. योग नंबर एक इजी है और सभी लोग यूज़ भी कर सकते हैं. योग नंबर 1 में रसायन औषधि है इसलिए इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए. मेरी विडियो देखने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टर बंधू अपने रोगियों पर इन योगों का प्रयोग कर यश प्राप्त करें. 

दो दोस्तों, वैद्य जी की डायरी में ये थी आज की जानकारी फ़ाइलेरिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे में. 




वैद्य जी की डायरी के दुसरे उपयोगी योग - 












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22 May 2018

Bael Fruit or Wood Apple Benefits | बेल के फ़ायदे जानिए


बेल जो है गर्मी के मौसम में मिलने वाला फल है जो बेहतरीन दवा भी है. पका बेल को ऐसे भी खाया जाता है, इसका शर्बत भी बनाया जाता है और कुछ आयुर्वेदिक दवाएँ भी इस से बनाई जाती हैं. यह एसिडिटी, पेट की गर्मी, कब्ज़, डायरिया, Dysentery और पेट के कीड़ों को दूर करता है, तो आईये जानते हैं बेल के फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

बेल को हिंदी भाषी राज्यों में बेल के नाम से ही जाना जाता है जो हमारे देश भारत के अलावा, श्रीलंका, थाईलैंड, बांग्लादेश और दुसरे एशिया के देशों में भी पाया जाता है. इसे बेल, बिल्व, श्रीफल और अंग्रेजी में Wood Apple और Elephant Apple कहा जाता है. जबकि इसका वानस्पतिक नाम Aegle marmelos है. 

बेल जो है फाइबर रिच फ्रूट है, यह विटामिन्स, प्रोटीन और मिनरल्स से भरपूर होता है. आयुर्वेदिक दवाओं में बेल के फल और पत्तों का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है. 

बेल के फ़ायदे- 

बेल के पत्ते शुगर लेवल कम करने में बेहद असरदार हैं. डायबिटीज की आयुर्वेदिक दवाओं में इसे ज़रूर शामिल किया जाता है. 

बेल के फल के फ़ायदे जानने से पहले आप को एक इम्पोर्टेन्ट बात बता दूं कि कच्चे बेल और पके बेल दोनों की तासीर बिल्कुल अलग होती है. कच्चा बेल जो है एंटी डायरियल होता है यानि दस्त को रोकता है, जबकि पका बेल Laxative होता है यानी कब्ज़ को दूर करता है.

गर्मी के इस मौसम में पके बेल का शर्बत पीकर आप खुद को कूल रख सकते हैं. पके बेल को ऐसे ही खाएं या फिर शरबत बनाकर भी पी सकते हैं. 

बेल का शर्बत 🍹 - 

इसका शर्बत बनाने के लिए बेल के गुदे को पानी में मसलकर मोटी छलनी से छान ले और इसमें स्वादानुसार चीनी मिक्स कर दें. बस टेस्टी और हेल्दी बेल का शर्बत तैयार है. 

पका बेल खाने या इसका शर्बत पिने से पेट की गर्मी, एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, सीने की जलन, गैस और कब्ज़ दूर होती है. यह शरीर को तरावट देता है, बेल का शर्बत पिने से लू नहीं लगती है. 

बेल खाने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं और पेट में कीड़े होने से भी बचाता है. 

पके हुवे बेल के इस्तेमाल से पाइल्स या बवासीर में भी फ़ायदा होता है. 

यह शुगर को कण्ट्रोल करता है. शुगर के लिए इसके पत्ते सबसे ज़्यादा इफेक्टिव हैं. 
बेल कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और हार्ट को हेल्दी और फिर रखने में मदद करता है. यह Cardioprotective और हार्ट टॉनिक है.

एंटी ऑक्सीडेंट और विटामिन सी होने से यह एंटी एजिंग का काम करता है. स्किन का रूखापन दूर करता है.

यह दिमाग को शांति देता है और ब्रेन टॉनिक का भी काम करता है. तो दोस्तों, ये थे बेल के कुछ ख़ास फ़ायदे, अभी के इस मौसम में इसका इस्तेमाल कर फ़ायदा लीजिये. 

सावधानी- बेल का इस्तेमाल करते हुवे कुछ सावधानी भी रखनी चाहिए जैसे प्रेगनेंसी में और ब्रैस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाओं को इसका सेवन नहीं करना चाहिए. 


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18 May 2018

Smritisagar Ras | स्मृतिसागर रस दिमाग की बीमारियों की बेजोड़ औषधि


स्मृतिसागर रस क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो एक बेहतरीन ब्रेन टॉनिक है. इसके इस्तेमाल से मेमोरी लॉस, Neuropathy, दिमाग की कमज़ोरी, बेहोशी, मृगी या एपिलेप्सी, पागलपन और हिस्टीरिया जैसी बीमारियाँ दूर होती हैं और बुद्धि और सिखने की क्षमता को यह बढ़ाता है. तो आइये जानते हैं स्मृतिसागर रस का कम्पोजीशन, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

स्मृतिसागर रस जैसा कि इसका नाम रखा गया है यानी यादाश्त या मेमोरी का समुन्दर. इसके इस्तेमाल से मेमोरी पॉवर बढ़ जाती है.

स्मृतिसागर रस के घटक या कम्पोजीशन - 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे कई तरह की चीज़ों से बनाया जाता है जैसे - शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक की कज्जली 20 ग्राम, शुद्ध हरताल, शुद्ध मैनशील, स्वर्णमाक्षिक भस्म और ताम्र भस्म प्रत्येक 10-10 ग्राम. भावना देने के लिए मीठी बच और ब्राह्मी के क्वाथ के अलावा ज्योतिष्मती का तेल भी चाहिए होता है. 


स्मृतिसागर रस निर्माण विधि - 

बनाने का तरीका यह है कि सभी चीजों को पत्थर के खरल में डालकर घोटें और सबसे पहले मीठी बच के काढ़े की 21 भावना दें और उसके बाद ब्रह्मी के क्वाथ की 21 भावना देने के बाद ज्योतिष्मती के तेल में घोंटकर 125mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. यही स्मृतिसागर रस है. 

स्मृतिसागर रस की मात्रा और सेवन विधि -

एक-एक गोली सुबह शाम घी या ब्राह्मी घृत से खाकर ऊपर से दूध  पीना चाहिए. 


स्मृतिसागर रस के फ़ायदे- 

दिमाग की कमज़ोरी, नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी को यह दूर करती है. यह दिमाग को ताक़त देती है और मेमोरी पॉवर, बुद्धि और सिखने की क्षमता को बढ़ा देती है.
ज़्यादा सोचने, चिंता करने, शोक, दुःख या फिर सर में चोट लगने की वजह से होने वाले मानसिक रोगों में असरदार है. 

मृगी या एपिलेप्सी में इसका ज़रूर सेवन करना चाहिए. हिस्टीरिया और पागलपन जैसी बीमारी में भी असरदार है. मृगी में इसके साथ में वातकुलान्तक रस, सारस्वत चूर्ण, सारस्वतारिष्ट और अश्वगंधारिष्ट जैसी दवाओं के साथ लॉन्ग टाइम तक लेने से बीमारी दूर हो जाती है. 

फेसिअल पैरालिसिस में भी इसका अच्छा रिजल्ट मिलता है ख़ासकर जब नाड़ियों में रक्त का थक्का जमने से पक्षाघात हुवा हो. 

कुल मिलाकर देखा जाये तो स्मृतिसागर रस ब्रेन के लिए एक बेहतरीन दवा है, यह मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस भी है. स्कूल लाइफ में मैं इसे यूज़ कर चूका हूँ. 

आयुर्वेदिक कम्पनियों का यह मिल जाता है, इसे आप ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं. बैद्यनाथ के 80 टेबलेट की क़ीमत 120 रुपया है. 


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16 May 2018

Nimbadi Churna | निम्बादि चूर्ण हर तरह के चर्मरोगों की बेजोड़ औषधि


निम्बादि चूर्ण जो है ऐसी आयुर्वेदिक दवा है जो हर तरह की स्किन डिजीज में असरदार है. खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी से लेकर एक्जिमा, सोरायसिस और कुष्ठरोग जैसी बड़ी बीमारियों को भी दूर कर देती है. तो आईये जानते हैं निम्बादि चूर्ण का कम्पोजीशन, बनाने का तरीका, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

निम्बादि चूर्ण के घटक या कम्पोजीशन-

इसके लिए चाहिए होता है नीम की छाल, गिलोय, हर्रे, आँवला, सोंठ, सोमराजी, वायविडंग, पीपल, अजवायन, बच, ज़ीरा, कुटकी, खैरसार, सेंधानमक, यवक्षार, हल्दी, दारूहल्दी, नागरमोथा, देवदार और कूठ सभी बराबर वज़न में. 

बनाने का तरीका यह होता है कि सभी को कूट-पीसकर कपड़छन चूर्ण बनाकर रख लें. यही निम्बादि चूर्ण है, यह भैषज्य रत्नावली का योग है. 

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निम्बादि चूर्ण की मात्रा और सेवनविधि - 

दो से चार ग्राम तक सुबह शाम पानी से या फिर खदिरारिष्ट, मंजिष्ठारिष्ट जैसी दवाओं के साथ लेना चाहिए. 

निम्बादि चूर्ण के गुण -

यह रक्तशोधक है यानि इफेक्टिव ब्लड प्योरीफ़ायर है. Anti-allergic, Antibiotic और Anti-fungal जैसे गुणों से भरपूर होती है. 

निम्बादि चूर्ण के फ़ायदे -

यह हर तरह के चर्मरोगों या स्किन डिजीज की बेहतरीन दवा है. छोटे-मोटे फोड़े-फुंसी और खुजली से लेकर दाद, एक्जिमा, सोरायसिस और कुष्टव्याधि तक में यह दवा असरदार है. आयुर्वेदिक डॉक्टर लोग हर तरह के चर्मरोगों में इसका प्रयोग करते हैं. 

इन सब के अलावा आमवात की वजह से होने वाली सुजन, पांडू, कामला और गुल्म जैसे रोगों में भी असरदार है. 

चर्मरोगों में निम्बादि चूर्ण चूर्ण के साथ रस माणिक्य और गंधक रसायन जैसी दवा मिलाकर लेने से बेहतरीन रिज़ल्ट मिलता है, यह मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस भी है. 


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11 May 2018

Narikela Lavana Benefits | नारिकेल लवण के गुण, उपयोग एवम प्रयोग विधि



नारिकेल-लवण आयुर्वेदिक औषधि है जो पित्त विकार, पेट दर्द और एसिडिटी जैसी प्रॉब्लम में बेहद असरदार है. तो आईये जानते हैं नारिकेल-लवण को बनाने का तरीका, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

नारिकेल-लवण के घटक एवम निर्माण विधि- 

यह नारियल और सेंधा नमक के मिश्रण से बना होता है. इसे बनाने के लिए चाहिए होता है सेंधा नमक का चूर्ण और जटा निकला हुवा नारियल. 

बनाने का तरीका यह होता है कि जटा निकले हुवे पके नारियल में छेद कर उसका पानी निकाल दें और उस छेद से सेंधा नमक का चूर्ण भरकर, छेद बंदकर कपड़मिट्टी कर सुखा दें और इसके बाद महापुट में रखकर फूँक दें. पूरी तरह से ठण्डा होने पर ऊपर के जले काले भाग को हटाकर नमक को निकालकर पीसकर रख लें. यह नारिकेल लवण है. 

नारिकेल-लवण के गुण -

आयुर्वेदानुसार यह पाचक और  पित्त नाशक है, वात दोष का भी शमन करता है. Antacid और Anti-spasmodic जैसे गुणों से भरपूर है. 

नारिकेल-लवण के फ़ायदे - 

पित्त विकार, एसिडिटी, पेट का दर्द, खाना खाने के बाद होने वाला पेट का दर्द या परिणामशूल जैसी प्रॉब्लम में यह बेहद असरदार है. 

यह खाना हज़म करने में मदद करता है. कफज, पित्तज, वातज और सन्निपातज शूल यह हर तरह के पेट दर्द में असरदार है. 

नारिकेल-लवण की मात्रा और सेवन विधि - 

एक से दो ग्राम तक पानी के साथ या फिर आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह के अनुसार लेना चाहिए. इसे नवसादर, घी और यवक्षार के साथ भी लिया जाता है. नमक की मात्रा होने से हाई ब्लड प्रेशर वालों को नहीं लेना चाहिए. आयुर्वेदिक कम्पनियों का यह मिल जाता है, इसे ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं.