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06 September 2020

Tapyadi Lauh Benefits | ताप्यादि लौह के गुण और उपयोग

 


खून की कमी, जौंडिस, लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, पाचन विकृति और कुछ दुसरे रोगों में ताप्यादि लौह का प्रयोग किया जाता है, तो आईये जानते हैं ताप्यादि लौह क्या है? इसके कम्पोजीशन, निर्माण विधि और गुण-उपयोग के बारे में विस्तार से - 

ताप्यादि लौह शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जो लौह प्रधान होती है यानि आयरन रिच 

ताप्यादि लौह का कम्पोजीशन 

सभी लौह-मंडूर वाली औषधियों की तरह इसमें त्रिफला तो होता ही है. इसके सही कम्पोजीशन की बात करें तो इसके घटक कुछ इस तरह से होते हैं -

हर्रे, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, मिर्च, पीपल, चित्रकमूल और वायविडंग प्रत्येक 25-25 ग्राम, नागरमोथा 15 ग्राम, चव्य, देवदार, पिपरामूल, दालचीनी और दारूहल्दी प्रत्येक 10-10 ग्राम, लौह भस्म, चाँदी भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म और शुद्ध शिलाजीत प्रत्येक 100-100 ग्राम, मंडूर भस्म 200 ग्राम और पीसी हुयी मिश्री 320 ग्राम. यही इसका ओरिजिनल कम्पोजीशन होता है.

 आयुर्वेदिक कंपनियां इसे ताप्यादि लौह नम्बर-1 के नाम से बेचती हैं. चाँदी भस्म महँगी होने की वजह से बिना चाँदी भस्म वाला भी ताप्यादि लौह मिलता है जो महँगा नहीं होता, इसका भी वैसे ही इफेक्टिव है पर चाँदी भस्म मिले हुए ताप्यादि लौह से थोड़ा कम असरदार होता है.

ताप्यादि लौह निर्माण विधि 

सभी जड़ी-बूटियों का बारीक कपड़छन चूर्ण बनाकर इसमें भस्में और पीसी मिश्री मिक्स कर एयर टाइट डब्बे में रख लें. 

चूँकि औषध निर्माण का मेरा काफ़ी अनुभव रहा है तो बता दूँ कि चित्रकमूल और दारूहल्दी जैसी काष्ट औषधियों का बारीक चूर्ण बनाना बड़े ही परिश्रम का कार्य है. इनके छोटे-छोटे टुकड़े कर इमामदस्ते में डालकर जौकूट कर लें इसके बाद ही ग्राइंडर में डालकर पीसना चाहिए. हमारे समय में तो इमामदस्ते में ही कुटना पड़ता था, ग्राइंडर तो दूर की बात, गाँव में बिजली ही नहीं थी. 

ताप्यादि लौह की मात्रा और सेवन विधि 

तीन-तीन रत्ती या 375 से 500 mg तक दिन में दो बार मूली के रस या गोमूत्र से. 

ताप्यादि लौह के फ़ायदे

आयुर्वेदानुसार पांडू, कामला, प्रमेह, शोथ या सुजन और यकृत-प्लीहा रोगों को दूर करता है. 

ज़्यादा दिनों तक बुखार रहने से रस, रक्त, धातु और इन्द्री कमज़ोर होने से शारीरिक कमज़ोरी आ जाती है, पाचन ख़राब, खून की कमी, सुजन जैसी प्रॉब्लम होने पर इसके सेवन से लाभ होता है. 

किसी भी कारण से होने वाली खून की कमी, जौंडिस, कामला, लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, आँख, चेहरा, हाथ-पैर की सुजन जैसी समस्या इसके सेवन से दूर होती है. इसके सेवन से हीमोग्लोबिन नार्मल हो जाता है.

प्रमेह, आँतों की कमजोरी, पाचन शक्ति की कमजोरी और शारीरिक कमज़ोरी में भी इस से लाभ होता है. 

महिलाओं के पीरियड रिलेटेड रोगों में भी इसके सेवन से लाभ होता है. 

लौह, मंडूर, शिलाजीत और चाँदी का मिश्रण होने से यह टॉनिक का भी काम करता है. 

इसके घटकों को ध्यान में रखते हुए वैद्यगण अनेकों रोगों  में सफलतापूर्वक प्रयोग करते हैं. 

आयुर्वेदिक कंपनियों का यह मिल जाता है, ऑनलाइन खरीदने का लिंक दिया गया है- 


30 August 2020

Krimimudgar Ras | कृमिमुद्गर रस

 

krimimudgar ras

कृमिमुद्गर रस शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जिसका वर्णन 'रसराजसुन्दर' नामक ग्रन्थ में मिलता है. 

कृमिमुद्गर रस  के घटक या कम्पोजीशन - 

शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गंधक दो भाग, अजमोद तीन भाग, वायविडंग चार भाग, शुद्ध कुचला पाँच भाग और पलाश के बीज छह भाग 

कृमिमुद्गर रस  निर्माण विधि - 

यानी यह बनता कैसे है? इसे बनाने के लिए सबसे पहले शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक को पत्थर के खरल में डालकर इतना खरल किया जाता है कि बिल्कुल काले रंग का काजल की तरह बन जाये. इसके बाद दूसरी सभी चीजों का बारीक पिसा हुआ चूर्ण मिक्स कर रख लें. इसकी गोली या टेबलेट भी बनायी जाती है. 



कृमिमुद्गर रस  की मात्रा और सेवन विधि -

दो से चार रत्ती या 250 mg से 500 mg तक. या यूँ समझ लीजिये की एक से दो गोली तक शहद के साथ खाकर ऊपर से नागरमोथा का क्वाथ पीना चाहिए. नागरमोथा क्वाथ न मिले तो विडंगासव या विडंगारिष्ट ले सकते हैं. 

तीन दिन तक इसे लेने के बाद जुलाब लेना चाहिए. या फिर पेट साफ़ करने वाली औषधि. जुलाब या विरेचन के लिए 'इच्छाभेदी रस' जैसी दवा लेनी चाहिए. या फिर रोगी कमज़ोर हो तो एरण्ड तेल या पंचसकार जैसा सौम्य विरेचन ही लेना चाहिए. 

कृमिमुद्गर रस के फ़ायदे -

कफ़ संचय से होने वाले पेट के कीड़ों के लिए तेज़ी से असर करने वाली दवा है. 

यह कृमिकुठार रस से ज़्यादा तेज़ और पावरफुल है, इस बात का ध्यान रखें.

पेट में कीड़े होने की वजह से होने वाला पेट दर्द, पेट फूलना, अरुचि, उल्टी, भूख नहीं लगना जैसी प्रॉब्लम दूर होती है इसके सेवन से. 

पेट में कीड़े होने के कारण कई बार शरीर में खुजली और लाल चकत्ते भी हो जाते हैं और लोग इसे एलर्जी समझ बैठते हैं. ऐसी स्थिति में कृमिमुद्गर रस का सेवन करना चाहिए.

कृमिमुद्गर रस न सिर्फ पेट के कीड़े बल्कि शरीर के दुसरे भाग के कृमिजनित रोगों में भी असरदार है. इसीलिए फ़ाइलेरिया की औषधि 'श्लीपदहर योग' का यह एक घटक है. 

कृमिमुद्गर रस के साइड इफ़ेक्ट -

चूँकि यह कुचला प्रधान योग है तो कोमल प्रकृति वालों को सूट नहीं करता और स्वाद में बहुत कड़वी होती है, इस लिए इसका टेबलेट निगलना ही उचित रहता है. हालाँकि इसकी गोली को पीसकर सेवन करना ही उत्तम है. 

कृमिमुद्गर रस मिलेगा कहाँ? यह ऑनलाइन मिलेगा जिसका लिंक दिया गया है-  Krimimudgar Ras 10 gram‎ 

From Amazon - Krimudgar Ras 




21 August 2020

Nagarjunabhra Ras | नागार्जुनाभ्र रस हृदय रोगों की चमत्कारी औषधि

 


नागार्जुनाभ्र रस एक शास्त्रीय औषधि है जो ह्रदय रोगों के अतिरिक्त दुसरे रोगों में भी असरदार है. 

नागार्जुनाभ्र रस के घटक या कम्पोजीशन -

 सहस्रपुटी अभ्रक भस्म और अर्जुन छाल का क्वाथ मात्र दो चीज़ ही इसके घटक हैं. 
उत्तम क्वालिटी के सहस्रपुटी वज्राभ्रक भस्म में अर्जुन छाल के क्वाथ की सात भावना देकर खरलकर एक-एक रत्ती की गोलियां बनाकर सुखाकर रख लें. यही नागार्जुनाभ्र रस है. कुछ वैद्यगण सहस्रपुटी की जगह साधारण अभ्रक भस्म से ही इसे बनाते हैं, यह भी असरदार है बस इसकी गोलियां दो-दो रत्ती की बनानी चाहिए. 

नागार्जुनाभ्र रस गुण या प्रॉपर्टीज- 

यह हृदयशूल या दिल का दर्द दूर करने वाला, त्रिदोष नाशक, बल-वीर्य वर्धक और रसायन जैसे गुणों से भरपूर है.

नागार्जुनाभ्र रस के फ़ायदे- 

किसी भी वजह से होने वाला दिल का दर्द, एनजाइना, वाल्व का दर्द, हार्ट के मसल्स का दर्द, सीने में ज़ोर लगने से होने वाला दर्द को दूर करता है.

हार्ट की सुजन, जकड़न, भारीपन, खून की कमी, हार्ट की कमज़ोरी को दूर करता है. 
धड़कन, हार्ट बीट कम ज्यादा होना में असरदार है. यह हृदय की अनियमित गति को नियमित करने में बेहद असरदार है. 

मतलब आप समझ सकते हैं कि हार्ट की हर तरह की समस्या में यह असरदार है, बल्कि यह हार्ट के अलावा कुछ दूसरी प्रॉब्लम में भी असरदार है जैसे - 

भूख की कमी, एनीमिया, खून की कमी, एसिडिटी, जौंडिस, रक्तपित्त, सुजन, टी. बी., मलेरिया, दस्त, उल्टी और पाचन विकृति में भी इस से लाभ होता है. 

चूँकि अभ्रक भस्म इसका मुख्य घटक है जो अपने आप में योगवाही और रसायन गुणों से भरपूर होता है तो यह बल-वीर्य वर्धक और रसायन औषधि भी है. चेहरे की चमक को बढ़ाकर अन्दर से शक्ति देता है. 

यह न सिर्फ दिल बल्कि दिमाग के लिए भी असरदार है, नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी दूर करता है और मेमोरी पॉवर बढ़ाता है. 

नागार्जुनाभ्र रस एक औषधि है जिसे सभी लोग यूज़ कर सकते हैं, हार्ट की दूसरी दवाओं की तरह इसका यूज़ करने के लिए कोई ज्यादा सोच विचार करने की ज़रूरत नहीं होती, क्यूंकि यह बिलकुल सेफ़ दवा है. 

नागार्जुनाभ्र रस की मात्रा और सेवन विधि -

एक-एक गोली सुबह-शाम शहद से 

50 ग्राम की कीमत है सिर्फ़ 300 रुपया जिसका लिंक दिया गया है -  Nagarjunabhra Ras

29 May 2020

Thalassemia Ayurvedic Treatment | थैलेसिमिया का आयुर्वेदिक उपचार | Vaidya Ji Ki Diary#18


आज वैद्य जी की डायरी में मैं बात करने वाला हूँ थैलेसिमिया के आयुर्वेदिक उपचार के बारे में. जी हाँ दोस्तों, थैलेसिमिया का नाम सुना होगा इसके बारे में आयुर्वेद क्या कहता है और कौन-कौन सी औषधि इसके लिए लेनी चाहिए आईये सब विस्तार से जानते हैं - 

थैलेसिमिया क्या है?

मॉडर्न साइंस ने इसे थैलेसिमिया का नाम दिया है जिसके कारण शरीर में खून की इतनी कमी हो जाती है कि रोगी को प्रत्येक दस-पंद्रह दिनों में ब्लड Transfusion कराना पड़ता है जीवन भर, एलोपैथ में इसका कोई और उपाय नहीं है इसके अलावा. लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, पीला-लाल पेशाब होना, हल्का बुखार, पीली आँखें, पीला शरीर, रक्तपित्त जैसे लक्षण इसमें पाए जाते हैं. यह अधिकतर बच्चों में पाया जाता है, पर यह किसी को भी हो सकता है. इसके कारण, लक्षण तो आपको हर जगह मिल जायेंगे गूगल करने पर भी, इन सब पर अधीक चर्चा न कर आईये जानते हैं -

थैलेसिमिया को आयुर्वेद क्या कहता है?

आयुर्वेदिक ग्रंथों में इस नाम से कोई रोग नहीं मिलता है. परन्तु इसके कारण और लक्षण के अनुसार कठिन पांडू रोग मान सकते हैं. थैलेसिमिया के रोगी आयुर्वेद की शरण में नहीं आते हैं. पर आयुर्वेद में इसका समाधान है.

थैलेसिमिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा 

आयुर्वेदिक औषधियों से थैलेसिमिया का उपचार संभव है, उचित चिकित्सा मिलने से रक्त कणों का क्षरण रुक जाता है, नया खून बनने लगता है और ख़ून चढ़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, पर इसमें समय लगता है और धैर्यपूर्वक औषधि सेवन करनी पड़ती है. 

थैलेसिमिया को कठिन पांडू रोग मानकर ही चिकित्सा करनी चाहिए. इसके लिए औषधि व्यवस्था कुछ इस प्रकार से करें - 

1) सिद्ध स्वर्णमाक्षिक भस्म 5 ग्राम + ताप्यादी लौह 5 ग्राम + स्वर्णबसन्त मालती 5 ग्राम + कहरवा पिष्टी 5 ग्राम + गिलोय सत्व 5 ग्राम + पुनर्नवादि मंडूर 5 ग्राम, सभी को अच्छी तरह से खरलकर बराबर मात्रा की 40 पुड़िया बना लें(यह व्यस्क व्यक्ति की मात्रा है)

सेवन विधि- एक-एक पुड़िया सुबह-शाम शहद से 

2) कुमार्यासव दो स्पून + पुनर्नवारिष्ट 2 स्पून + एक कप पानी में मिक्स कर भोजन के बाद रोज़ दो बार 

यही औषधि वैद्य जी के देख रेख में लगातार सेवन करते रहने से थैलेसिमिया के रोगी को धीरे-धीरे लाभ हो जाता है. ब्लड ट्रांसफ्यूज़न कराने की अवधि धीरे-धीरे बढ़ जाती है और कुछ महीनों में ब्लड ट्रांसफ्यूज़न की आवश्यकता नहीं रहती. मतलब किसी-किसी को हफ़्ता दस दिन में खून चढ़ाना पड़ता है तो धीरे-धीरे यह Duration बढ़ जाता है, क्यूंकि शरीर में नया खून बनने लगता है. 

सभी औषधि उत्तम क्वालिटी की होनी चाहिए तभी वांछित लाभ मिलेगा. अगर औषधि मिलने में समस्या हो तो इस नम्बर पर संपर्क कर सकते हैं. 
+971524115684(Dubai), 07645065097(India), My WhatsApp



30 April 2020

Bhuvan Bhaskar Ras | भुवन भास्कर रस - कैन्सर की आयुर्वेदिक औषधि


भुवन भास्कर रस एक स्वर्णकल्प है जिसमे भस्मों के अलावा जड़ी-बूटियों का भी मिश्रण होता है.

भुवन भास्कर रस के घटक- कज्जली 10 ग्राम, शुद्ध गंधक, शुद्ध हरताल, शुद्ध मैनसिल, स्वर्ण भस्म, अभ्रक भस्म सहस्रपुटी, लौह भस्म और खर्पर भस्म प्रत्येक 5-5 ग्राम, बंग भस्म, नाग भस्म, ताम्र भस्म प्रत्येक 10-10 ग्राम, गोखरू, शुद्ध भिलावा, सोंठ, मिर्च, पीपल, गिलोय, विदारी कन्द और वराही कन्द प्रत्येक 5-5 ग्राम.

निर्माण विधि - सभी जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण कर अलग रख लें, कज्जली और भस्मों को अच्छी तरह से मिक्स करने के बाद जड़ी-बूटियों के चूर्ण को मिलाकर आँवला के रस और नीम के पत्तों के रस की अलग-अलग एक-एक भावना देकर सुखाकर रख लें. 

भुवन भास्कर रस की मात्रा और सेवन विधि - 125 मिलीग्राम से 250 मिलीग्राम तक 2 स्पून शहद और चौथाई स्पून देसी घी में मिक्स कर चाटकर खाना चाहिए, रोज़ दो बार सुबह-शाम

हर तरह के कैंसर की प्रथम अवस्था में बेहद असरदार है. ब्लड कैंसर, थ्रोट कैंसर, ब्रेन कैंसर, ब्रैस्ट कैंसर, पेट का कैंसर और कैंसर वाले ट्यूमर, सिस्ट, अबुर्द, शिश्नाबुर्द में भी प्रयोग कर सकते है.

चिकित्सक बन्धु से आग्रह है कि इस योग का निर्माण कर रोगियों पर प्रयोग कराएँ और जो भी रिजल्ट मिलता है ज़रूर बताएं. 



17 April 2020

Ajwain Benefits and Usage | अजवायन पेट की बीमारियों के लिए रामबाण



अजवायन का कोई परिचय देने की ज़रूरत नहीं है यह आपके किचन में ही मिल जायेगा. 

अजवायन मुख्यतः तीन तरह की होती है जंगली अजवायन, ख़ुरासानी अजवायन और अजमोद या अजमोदा 

जंगली अजवायन तो मुश्किल से ही मिलती है, अजमोद जो है साइज़ में बड़ी होती है और ख़ुरासानी अजवायन ही अक्सर रसोई में प्रयोग की जाती है.

अजवायन के गुण -

आयुर्वेदानुसार अजवायन तीक्ष्ण, चरपरी, पाचक, अग्निवर्धक, वायु एवम कफ़ नाशक और कृमिनाशक जैसे गुणों से भरपूर होती है. 

पेट की बीमारीयों के लिए यह बहुत ही असरदार होती है. गैस, वायु गोला बनना, अपच, पेट दर्द, अजीर्ण, पेचिश, उल्टी-दस्त, पेट के कीड़े, लिवर और स्प्लीन के रोगों में असरदार है. 

आईये अब जानते हैं अजवायन के कुछ औषधिय प्रयोग - 

अपच या बदहज़मी होने पर - अजवायन, सोंठ, सेंधा नमक और हर्रे बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर रख लें. इस चूर्ण को एक-एक चम्मच रोज़ तीन बार लेने से अपच और अजीर्ण जैसी समस्या दूर होती है. 

पेट दर्द, डकार, पेट के भारीपन में - पीसी हुयी अजवायन एक स्पून और खाने वाला सोडा चौथाई स्पून मिक्स कर भोजन के बाद लेना चाहिय. अजवायन को अदरक के रस में भिगाकर सुखाकर रख लें. पेट दर्द होने पर आधा स्पून इसका सेवन करने से लाभ होता है.

बच्चों के हरे पीले दस्त और उल्टी होने पर - एक चुटकी अजवायन के बारीक चूर्ण को दूध के साथ मिक्स कर चटाना चाहिए. 

पेट के कीड़े होने पर - अजवायन और वायविडंग बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर रख लें. इस चूर्ण को शहद और अन्नानास के रस के साथ देने से बच्चों के पेट के कीड़े दूर होते हैं. 

उदर विकार के लिए - अजवायन 50 ग्राम, ग्वारपाठा का रस 25 ग्राम और नौसादर 2 ग्राम लेकर एक काँच के जार में मिक्स कर धुप में रख 4-5 दिन रख दें. अब इस मिश्रण को 1 स्पून प्रतिदिन दो-तीन बार सेवन करने से हर तरह के उदर विकार नष्ट हो जाते हैं. 

भूख की कमी होने पर - पीसी हुयी अजवायन, सोंठ का चूर्ण, काला नमक और आक की कली बराबर मात्रा में लेकर खरल कर मटर के साइज़ की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. दो-दो गोली सुबह-शाम लेने से अग्नि तीव्र हो जाती है, भूख खुलकर लगने लगती है. अपच, गैस जैसी पेट की बीमारियाँ दूर होती हैं. 

एक स्पून अजवायन को दो कप पानी में उबालें और जब एक कप पानी बचे तो छानकर इस पानी को भोजन के बाद पीने से गैस-अपच जैसी प्रॉब्लम नहीं होती और हाजमा ठीक रहता है. 

अजवायन को पीसकर पेट पर लेप करने से  भी गैस की प्रॉब्लम में आराम मिलता है. बच्चों के पेट फूलने पर अजवायन को आग में जलाकर इसके धुवें से पेट की सिकाई करने से लाभ होता है. 

तो ये थी आज की जानकारी, अजवायन के इस छोटे से दाने के बड़े-बड़े गुण के बारे में. 





13 March 2020

Amalki Rasayan Benefits in Hindi | आमलकी रसायन के बेजोड़ फ़ायदे


यह एक शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जो लिवर, पाचन तंत्र, दिल, दिमाग, स्किन, आँख और बालों की बीमारियों के लिए बेहद असरदार है. तो आईये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं - 

आमलकी रसायन जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है इसका मुख्य घटक आंवला होता है, आयुर्वेद में आमला को आमलकी भी कहा जाता है. आयुर्वेद में आवंला में आयुर्वेद की बहुत प्रशंसा है, इसके बेजोड़ गुणों के कारन ही इसे रसायन औषधि माना जाता है. 

आयुर्वेदिक ग्रन्थ 'रसतंत्र सार व सिद्ध प्रयोग संग्रह' का यह योग है जिसे तीन-चार तरीक़े से  बनाया जाता है. परन्तु सभी की समानता यह है कि सभी का मुख्य घटक आँवला ही है. दुसरे तरीक़ों में आँवला के अलावा पिप्पली, घी और मिश्री जैसे घटक होते हैं, यहाँ पर मैं सबसे ज़्यादा पॉपुलर और इफेक्टिव विधि के बारे में ही बताने वाला हूँ. 

आमलकी रसायन के घटक और निर्माण विधि 

आँवला चूर्ण और आँवला का रस 

गुठली निकालकर आँवला का बारीक चूर्ण बना लें और फिर इसमें आँवले के रस की भावना देकर पत्थर के खरल में घुटाई करें. इसी तरह से 21 भावना देकर छाया में सुखाकर अच्छी तरह से खरलकर रख लेना चाहिए. यही असली और पॉपुलर आमलकी रसायन है. 

आमलकी रसायन के गुण या प्रॉपर्टीज 

विटामिन सी की प्रचुर मात्रा होने के साथ-साथ इसमें कई तरह के गुण पाए जाते हैं जैसे - एंटी ऑक्सीडेंट, एन्टी एजिंग, Antacid या अम्ल पित्त नाशक, पाचक, लिवर-स्प्लीन को प्रोटेक्ट करने वाली और रसायन जैसे गुणों से भरपूर है. 

यह सौम्य और शीतल या तासीर में ठण्डी औषधि है जो बीमारीओं को दूर कर स्वास्थ की रक्षा करती है. 

आमलकी रसायन के फ़ायदे 

यह दिल, दिमाग, पेट, लिवर-स्प्लीन, आंख, स्किन से लेकर बालों के लिए भी असरदार औषधि है. 

पित्त दोष, शरीर की गर्मी, सीने की जलन, एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, पेप्टिक अल्सर इत्यादि को करती है. अक्सर वैद्यगण दुसरे योगों के साथ इसका सेवन कराते हैं. 

आँखों की बीमारी, बालों का गिरना, समय से पहले सफ़ेद होना, खून की कमी, हीमोग्लोबिन कम होना इत्यादि में भी इसके सेवन से अच्छा लाभ होता है. 

विधि पूर्वक इसका सेवन करने से चुस्ती-फुर्ती आती है और यौवन बना रहता है. 

आमलकी रसायन की मात्रा और सेवन विधि 

एक से तीन ग्राम तक सुबह-शाम गाय का घी, शहद या गर्म पानी से या फिर डॉक्टर की सलाह के अनुसार उचित अनुपान से लेना चाहिए. 

विधि पूर्वक  बने हुए आमलकी रसायन के 50 ग्राम की क़ीमत है सिर्फ़ 155 रुपया जिसका लिंक निचे दिया गया है. 

उच्च गुणवत्ता वाला आमलकी रसायन ऑनलाइन खरीदें-  https://www.lakhaipur.in/product/amalki-rasayan/



29 February 2020

Basant Tilak Ras | बसन्त तिलक रस के फ़ायदे


यह भैषज्य रत्नावली का एक स्वर्णयुक्त योग है जिसे कई तरह के रोगों में  प्रयोग  करने का प्रावधान है परन्तु यह ज़्यादा प्रचलित योग नहीं है, तो आईये इसके बारे में थोड़ा विस्तार से जानते हैं - 

बसन्त तिलक रस के घटक या कम्पोजीशन - 

आयुर्वेदिक ग्रन्थ भैषज्य रत्नावली के अनुसार इसके घटक कुछ इस प्रकार से हैं - लौह भस्म, बंग भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म, स्वर्ण भस्म,रजत भस्म, अभ्रक भस्म, मोती पिष्टी और प्रवाल पिष्टी प्रत्येक 10-10 ग्राम.

जायफल, जावित्री, दालचीनी, छोटी इलायची के दाने, तेजपात और नागकेशर प्रत्येक 10-10 ग्राम का बारीक कपड़छन चूर्ण 

बसन्त तिलक रस निर्माण विधि - 

इसकी निर्माण विधि बड़ा ही सरल है. सभी भस्मो और दूसरी औषधि के कपड़छन चूर्ण को अच्छी तरह से मिक्स कर त्रिफला के क्वाथ में तीन घन्टे तक घोंटकर एक-एक रत्ती या 125mg की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाकर रख लिया जाता है.

बसन्त तिलक रस के गुण 

इसके गुणों की बात करें तो यह त्रिदोष नाशक, उदर-वात शामक, बाजीकरण, बल-वीर्य वर्द्धक, ह्रदय को बल देना, प्रमेह नाशक और रसायन गुणों से भरपूर होता है. 

बसन्त तिलक रस के फ़ायदे 

प्रमेह, बहुमूत्र, मधुमेह इत्यादि में इसके सेवन से लाभ होता है. 

वात व्याधि, सन्निपात, अपस्मार, उन्माद या पागलपन और हैजा जैसा रोगों की उत्तम औषधि है. 

वीर्य विकार, शुक्रदोष और मूत्र रोगों में इसका अच्छा प्रभाव मिलता है. 
यह दिल और दिमाग को ताक़त देता है और टेंशन दूर कर अच्छी नींद लाने में मदद करता है. 

बसन्त तिलक रस की मात्रा और सेवन विधि 

एक से दो गोली तक सुबह-शाम शहद, गिलोय के रस या शतावर के रस के साथ. इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की देख रेख में भी लेना चाहिए. 

बैद्यनाथ के 10 टेबलेट की क़ीमत क़रीब 400 रुपया है, जो आयुर्वेदिक मेडिकल स्टोर से मिल सकता है.