भारत की सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक हिन्दी वेबसाइट लखैपुर डॉट कॉम पर आपका स्वागत है

21 July 2019

Udar Mahayog | उदर महायोग- वैद्य जी की डायरी


वैद्य जी की डायरी में आज एक बहुत ही स्पेशल योग बताने वाला हूँ जो पेट की बीमारियों के लिए बेजोड़ है और रामबाण की तरह काम करता है, जिसका नाम है उदर महायोग. तो आईये जानते हैं इस योग के गुण, निर्माण विधि और प्रयोग के बारे में विस्तार से - 

पेट के रोगों के लिए आयुर्वेद में कई तरह के योग भरे पड़े हैं जिसे आप सभी जानते हैं. आज जो औषधि बता रहा हूँ इसका कॉम्बिनेशन बड़ा ही बेजोड़ है जो उदर विकारों में बेहतरीन रिजल्ट देता है. 

उदर महायोग का के घटक या कम्पोजीशन - 

इस योग को बनाने के लिए चाहिए होगा प्रवाल पंचामृत रस मोती युक्त(न.1) 5 ग्राम, वृहत लोकनाथ रस 5 ग्राम और कासीस गोदन्ती भस्म 5 ग्राम

निर्माण विधि - सबसे पहले वृहत लोकनाथ रस को खरल कर लें इसके बाद दूसरी औषधियों को अच्छी तरह मिक्स खरल में डालकर तीन घन्टे तक घुटाई कर लें. मर्दनम गुणवर्धनम के अनुसार जितना ज़्यादा घुटाई होगी, उतनी ज़्यादा प्रभावशाली औषधि होती है. 

उदर महायोग की मात्रा और सेवन विधि - 

250 mg सुबह-शाम शहद में मिक्स कर चाट लें और ऊपर से 4 स्पून कुमार्यासव आधा कप पानी में मिक्स कर पीना चाहिए भोजन के बाद. 

उदर महायोग के फ़ायदे -

इसके फ़ायदों की बात करें तो यह पाचन तंत्र की बीमारियों के लिए बेहद असरदार है जैसे - पाचक पित्त विकृति, पेट की जलन, एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, लिवर की हर तरह की प्रॉब्लम, गैस, गुल्म या गोला बनना, कब्ज़, दस्त, IBS या संग्रहणी, खून की कमी, कमज़ोरी शारीरिक दुर्बलता इत्यादि.

Digestive system में कहीं की ग्रंथि या सिस्ट होना, फुफ्फुस ग्रंथी और कैंसर तक में इस से लाभ होता है. 

कुल मिलाकर बस समझ लीजिये कि पेट की बीमारियों के लिए यह अमृत तुल्य लाभकारी है. इसके इस्तेमाल से पेट की बीमारी तो दूर होती ही है साथ ही कमज़ोरी दूर होकर चेहरा खिल जाता है. 

प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक और वैद्यगण रोगियों पर इसका प्रयोग कराएँ और फिर रिजल्ट देखें. 15 सालों से अधीक समय से सफलतापूर्वक हमारे यहाँ इसका प्रयोग किया जा रहा है. 

उदर महायोग का एक महीने का डोज़ 60 मात्रा बना बनाया अब अवेलेबल है हमारे स्टोर lakhaipur.in पर जिसका लिंक दिया गया है जहाँ से आप ऑनलाइन आर्डर कर मंगा सकते हैं. 


10 July 2019

Shringarabhra Ras | श्रृंगाराभ्र रस के गुण, उपयोग एवम प्रयोग विधि


आज की जानकारी है क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन श्रृंगाराभ्र रस के बारे में जिसमे आप जानेंगे इसके घटक या कम्पोजीशन, निर्माण विधि और गुण-उपयोग की पूरी जानकारी - 

सबसे पहले नज़र डालते हैं इसके कम्पोजीशन या घटक पर- अभ्रक भस्म इसका मुख्य घटक होता है. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बनाने के लिए चाहिए होता है कृष्णाभ्रक भस्म 80 ग्राम, लौंग, दालचीनी, नागकेशर, तेजपात, कपूर, जावित्री, नेत्रवाला, गजपीपल, जटामांसी, तालिसपत्र, कूठ, धायफुल प्रत्येक 3-3 ग्राम, सोंठ, मिर्च, पीपल, आँवला, बहेड़ा प्रत्येक डेढ़-डेढ़ ग्राम, छोटी इलायची के बीज और जायफल 6-6 ग्राम, शुद्ध गंधक 10 ग्राम और शुद्ध पारा 6 ग्राम

श्रृंगाराभ्र रस निर्माण विधि - 

बनाने का तरीका यह है कि सबसे पहले शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक को खरलकर कज्जली बना लें और इसके बाद जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण मिक्स कर, अंत में अभ्रक भस्म मिलाकर अच्छी तरह घुटाई कर पानी के संयोग से मटर के आकार की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाकर रख लिया जाता है. यही श्रृंगाराभ्र रस है. 

श्रृंगाराभ्र रस के गुण -

इसके गुणों या प्रॉपर्टीज की बात करें तो यह Anti tussive, Expectorant, Anti biotic, Anti allergic, Anti inflammatory, टॉनिक और रसायन जैसे कई तरह के गुणों से भरपूर है. वात, पित्त और कफ़ तीनों दोषों पर इसका असर होने से यह त्रिदोष नाशक है.

श्रृंगाराभ्र रस के फ़ायदे- 

इसके फायदों की बात करें तो इसका सबसे ज़्यादा असर फेफड़े और श्वसन तंत्र पर ही होता है. खाँसी और अस्थमा की यह पॉपुलर दवाओं में से एक है.

खाँसी, बलगम, अस्थमा, कफ़ जमा होना, सफ़ेद चिकना कफ़ निकलना, सीने या पसली में दर्द होना, सर भरी होना, साँस लेने में तकलीफ़ होना, कमज़ोरी इत्यादि में उचित अनुपान से लेने अच्छा लाभ होता है.

श्रृंगाराभ्र रस की मात्रा और सेवन विधि -

एक-एक गोली सुबह-शाम अदरक के रस और शहद के साथ या फिर रोगानुसार उचित अनुपान के साथ लेना चाहिए. रसायन औषधि है तो डॉक्टर की देख रेख में लेना ही समझदारी है. आयुर्वेदिक कंपनियों का यह मिल जाता है, ऑनलाइन ख़रीदने का लिंक दिया गया है. 


इसे भी जानिए - 





06 July 2019

Jatiphaladi Vati(Stambhak) | जातिफलादि वटी (स्तंभक)


आज की जानकारी है जातिफलादि वटी(स्तंभक) के बारे जो वीर्यस्तम्भन करने वाली औषधि है. तो आईये जानते हैं इसके बारे में विस्तार से - 

आपमें से कई लोग जानते होंगे कि जातिफलादि वटी दो तरह की होती है. एक जातिफलादि वटी ग्राही या संग्रहणी वाली और दूसरी जातिफलादि वटी(स्तंभक) तो आज की जानकारी है जातिफलादि वटी(स्तंभक) के बारे में, सबसे पहले जानते हैं -

जातिफलादि वटी(स्तंभक) के घटक या कम्पोजीशन - 

यह अफीम प्रधान औषधि है, इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे  बनाने के लिए चाहिए होता है जायफल, अकरकरा, सोंठ, शीतल चीनी, केशर, लौंग और सफ़ेद चन्दन प्रत्येक एक-एक भाग और शोधित अफ़ीम चार भाग

बनाने का तरीका यह होता है कि जड़ी-बूटियों का बारीक कपड़छन चूर्ण कर लें, केशर को खरल में डालकर पिस लें, इसके बाद शुद्ध अफ़ीम और जड़ी-बूटियों का चूर्ण अच्छी तरह मिक्स कर थोड़ा पानी मिक्स कर अच्छी तरह घुटाई कर दो-दो रत्ती या 250mg की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाकर रख लें.

जातिफलादि वटी(स्तंभक) के गुण 

आयुर्वेदानुसार यह स्तम्भक और संकोचक है, वात वाहिनी और शुक्रवाहिनी नाड़ियों पर इसका सबसे ज़्यादा असर होता है. 

जातिफलादि वटी(स्तंभक) के फ़ायदे 

स्तम्भन शक्ति बढ़ाने के लिए ही इसका प्रयोग किया जाता है. यह शीघ्रपतन नहीं होने देती.

जल्द डिस्चार्ज नहीं होने और शीघ्रपतन दूर करने के लिए वैद्यगन इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक कराते हैं. 

इसके सेवन से पहले वीर्यवर्धक और पौष्टिक औषधियों का सेवन अवश्य करना चाहिए. 

जातिफलादि वटी(स्तंभक) की मात्रा और सेवन विधि - 

एक गोली सोने से एक घंटा पहले दूध, शहद या घी के साथ लेना चाहिए. यह अफ़ीम वाली दवा है तो इसका ज़्यादा इस्तेमाल नुकसान करता है और लेने के देने भी पड़ सकते हैं. 

इसका इस्तेमाल करते हुए और इस्तेमाल के बाद भी दूध, घी, मक्खन-मलाई का ज़्यादा इस्तेमाल करना चाहिए. इसे हफ्ता में एक से दो बार ही यूज़ करें. 

इसके साइड इफ़ेक्ट की बात करें तो शरीर की गर्मी बढ़ जाना, कमज़ोरी, चक्कर आना, किसी काम में मन नहीं लगना, चिडचिडापन जैसी प्रॉब्लम हो सकती है. इसे ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं निचे दिए लिंक से - 








03 July 2019

Asthma Treatment | अस्थमा का चमत्कारी नुस्खा - वैद्य जी की डायरी 15


वैद्य जी की डायरी में आज अस्थमा या दमा के लिए बहुत ही सिम्पल और आसान सा योग बताने वाला हूँ जिसका इस्तेमाल हर कोई आसानी से कर सकता है, तो आईये इसके बारे में पूरी डिटेल्स जानते हैं- 

लोग कहते हैं कि दमा दम के साथ जाता है, कुछ हद तक यह सही भी है पर यदि सही ट्रीटमेंट मिले तो यह बीमारी ठीक भी हो जाती है. इसके लिए आयुर्वेद में कई तरह की शास्त्रीय औषधियाँ हैं जो बीमारी को दूर करने में सक्षम होती हैं. इसके अलावा कई तरह के अनुभूत योग भी हैं जिसे वैद्य लोग रोगियों पर प्रयोग करते हैं, ऐसा ही एक योग है जिसे मैं बताने वाला हूँ जिसका नाम है श्वास नाशक योग 

इसके लिए सिर्फ दो चीज़ें चाहिए - देसी गेहूं और हल्दी दोनों आर्गेनिक हो तो अत्ति उत्तम. गेहूं 200 ग्राम तो हल्दी 100 ग्राम

श्वास नाशक योग निर्माण विधि -

इसे बनाने का तरीका बहुत आसान है, मिट्टी के बर्तन गेहूं को चूल्हे पर रखकर जलाना है, कोयला होने तक. इसी तरह हल्दी को भी जला लें. यहाँ पर ध्यान रखने वाली बात यह है कि इसे जलाकर राख नहीं करना है बल्कि कोयला होने तक ही जलाना है. ठण्डा होने पर कूट-पीसकर बारीक पाउडर बनाकर रख लें, बस श्वास नाशक योग तैयार है. 

श्वास नाशक योग की मात्रा और सेवन विधि -

इसे कल्प विधि कुल 51 दिन प्रयोग करना होता है विशेष विधि से. पहले दिन इसे 5 ग्राम सुबह ख़ाली पेट पानी से लेना है रोज़ एक बार. इसी तरह से रोज़ एक ग्राम का डोज़  बढ़ाते हुए पच्चीसवें दिन 30 ग्राम का डोज़ हो जायेगा, इसके बाद रोज़ एक ग्राम डोज़ कम करते हुए जब 5 ग्राम पर डोज़ आने पर बंद कर दें. 

यह व्यस्क व्यक्ति की मात्रा है. कल्प विधि से 51 दिनों तक प्रयोग करने से अस्थमा और कफ़ वाली खाँसी से मुक्ति मिल जाती है. 

वैद्य जी की डायरी में आज इतना ही, इसके बारे में  कोई सवाल हो तो कमेंट कर पूछिये. जानकारी अच्छी लगी तो लाइक और शेयर ज़रूर कीजिये.


28 June 2019

Panchamrit Lauh Guggul | पंचामृत लौह गुग्गुल - एक रसायन औषधि


पंचामृत लौह गुग्गुल आयुर्वेद में अपने कैटगरी की स्पेशल दवा है अपने यूनिक कम्पोजीशन की वजह से. यह गुग्गुल होते हुए भी बेजोड़ रसायन औषधि है. 

पंचामृत लौह गुग्गुल के घटक या कम्पोजीशन - 

इसे शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, रौप्य भस्म, अभ्रक भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म प्रत्येक एक-एक भाग, लौह भस्म दो भाग और त्रिफला और गिलोय द्वारा शोधित शुद्ध गुग्गुल छह भाग के मिश्रण से बनाया जाता है. 

पंचामृत लौह गुग्गुल के फ़ायदे- 

यह हर तरह के वात रोग जैसे जोड़ों का दर्द, कमर दर्द, साइटिका, जकड़न इत्यादि को दूर करता है.

नर्व और नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी, दिमाग की कमज़ोरी और इसकी वजह से होने वाले सर दर्द, नीन्द की कमी इत्यादि में लाभकारी है.

पेट की बीमारी जैसे गैस, लिवर-स्प्लीन की बीमारी, भूख की कमी, खून की कमी जैसी प्रॉब्लम को दूर कर हेल्थ इम्प्रूव करता है और ताक़त लाता है.

कुल मिलाकर देखा जाये तो चाँदी, अभ्रक, स्वर्णमाक्षिक और लौह भस्मों का सारा फ़ायदा इस एक दवा से मिल जाता है. 

पंचामृत लौह गुग्गुल की मात्रा और सेवन विधि - 

एक-एक गोली सुबह शाम दूध या रोगानुसार उचित अनुपान के साथ देना चाहिए. इसके आभाव में महायोगराज गुग्गुल का प्रयोग किया जा सकता है उचित अनुपान के साथ. यह ज़्यादा प्रचलित नहीं है, इसलिए सभी कंपनियाँ से नहीं बनाती. 
ऑनलाइन ख़रीदने का लिंक दिया गया है. 


25 June 2019

How to improve eyesight? | आँखों की रौशनी बढ़ाने की औषधि - नेत्रज्योतिवर्धक सुरमा


आँखों की रौशनी कम हो या फिर आँखों की कोई भी प्रॉब्लम से अगर आप परेशान हैं तो आज की जानकारी आपके लिए है, क्यूंकि आज मैं आँखों की रौशनी  बढ़ाने वाले एक बेजोड़ आयुर्वेदिक योग के बारे में बताने वाला हूँ जिसके प्रयोग से न सिर्फ़ आँखों की रौशनी बढ़ेगी बल्कि आप चश्मा से भी छुटकारा पा सकते हैं, तो आईये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं- 

सुरमा का नाम आपने सुना ही होगा, अक्सर लोग आँखों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए इसे लगाते हैं. पर आज जो सुरमा मैं बता रहा हूँ यह न सिर्फ़ आँखों की सुन्दरता हो बढ़ाता है बल्कि आखोँ की बीमारियों को दूर कर रौशनी इतनी तेज़ कर देता है कि फिर चश्मे की ज़रूरत ही नहीं रहती है. 

आयुर्वेद का यह वरदान है, प्राचीन समय में राजा-महाराजा लोग इस सुरमे का प्रयोग करते थे आँखों की रौशनी बनाये रखने के लिए. इसका नाम रखा गया है नेत्रज्योतिवर्धक सुरमा 

नेत्रज्योतिवर्धक सुरमा के फ़ायदे - 


  • इसे लगाने से नज़र साफ़ होती है,आँखों की रौशनी बढ़ती है और चश्मा धीरे-धीरे छूट जाता है.



  • आँखों में धुन्ध और जाला पड़ गया हो, ख़ासकर उम्र बढ़ने पर तो इसके इस्तेमाल से बेजोड़ लाभ होता है. 



  • मोतियाबिन्द की शुरुआत में इसके प्रयोग से लाभ होता है. 



  • आँखों की रौशनी बनाये रखने के लिए भी इसका प्रयोग करते रहना चाहिए. 


सुरमा की प्रयोग विधि - 

जैसा नार्मल सुरमा लगाते हैं, वैसे लगाया जाता है. काँच की सलाई दी गयी है साथ में इसी से सुबह और रात में सोने से पहले लगाना चाहिए. इसे लगाने के साथ अगर खाने की दवा 'चक्षुष्य कैप्सूल' भी एक-एक सुबह-शाम लिया जाये तो जल्दी फ़ायदा मिलेगा. 

इस सुरमा को तीन साल से बड़े बच्चों को भी लगा सकते हैं. इसे लगाने के बाद थोड़ी देर आँख में जलन होगी और पानी आयेगा तो घबराना नहीं चाहिए. इसके बारे में  कुछ सवाल-जवाब आप पढ़ सकते हैं, जिसका लिंक दिया गया है. 

इसका 2.5 ग्राम का दो पैक दिया जा रहा है सिर्फ 150 रूपये में जिसका लिंक निचे दिया गया है -


'चक्षुष्य कैप्सूल' ऑनलाइन खरीदें 

तो दोस्तों, अगर आँखों की रौशनी बढ़ाकर चश्मा से मुक्ति पाना चाहते हैं यह सुरमा और खाने की दवा दोनों का इस्तेमाल करें, आपकी आँखों की रौशनी बढ़ जाएगी यही तो आयुर्वेद की गारन्टी है. 



22 June 2019

Gomutradi Ghan Capsule | गौमूत्रादि घन कैप्सूल - सौ रोगों की एक दवा


गौमूत्र का आयुर्वेद में व्यापक प्रयोग होता है इसके गुणों के कारन, अनेकों शास्त्रीय औषधियों में इसका प्रयोग किया जाता है. इसी के बेस पर बना गौमूत्रादि घन कैप्सूल कई तरह की बीमारियों को दूर करने में रामबाण है, तो आईये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं - 

गौमूत्रादि घन कैप्सूल जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है गौमूत्र के घनसत्व के अलावा दूसरी जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बना कवच या कैप्सूल

कैप्सूल में होने से न इसका टेस्ट पता चलता है और न ही कोई गंध, इसके सेवन में कोई दिक्कत नहीं होती है. 

गौमूत्रादि घन कैप्सूल के घटक या कम्पोजीशन - 

इसका कम्पोजीशन बेजोड़ है. कई लोग गौमूत्र अर्क, आसव और क्षार इत्यादि लेते हैं पर सभी लोगों के उनका प्रयोग आसान नहीं होता है. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे गौमूत्रघनसत्व, त्रिफला घनसत्व, कालीजीरी घनसत्व, पुनर्नवा घनसत्व, नागरमोथा घनसत्व और कुटकी घनसत्व के मिश्रण से बनाया गया है. 

गौमूत्रादि घन कैप्सूल के फ़ायदे- 

यह विभिन्न उदर विकारों के लिए रामबाण है. मतलब पेट की कैसी भी कोई भी बीमारी हो तो इसका सेवन कर सकते हैं. 

अजीर्ण, अग्निमान्ध, उदावर्त, गुल्म, अर्श, यकृत प्लीहा वृद्धि, पांडू, कामला, कृमि, मलावरोध, आमवृद्धिजन्य विकार, शोथ, मेदवृद्धि और श्लीपद आदि विकारों में विशेष उपयोगी है. 

आसान और सीधे शब्दों में कहा जाये तो इसे इन बीमारियों में लेना चाहिए जैसे - 

अपच, बदहज़मी, गैस ऊपर को चढ़ना, गोला बनना, कब्ज़, पेट में कीड़े होना. 
लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, फैटी लिवर, कोलेस्ट्रॉल, खून की कमी, जौंडिस, शरीर में कहीं भी सुजन होना. मोटापा, बवासीर, आँव आना, फ़ाइलेरिया इत्यादि. 

हेपेटाइटिस, लिवर सिरोसिस, लिवर कैंसर, पेट का कैंसर, ब्लड कैंसर इत्यादि में भी इसे सहायक औषधि के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. 

यह एक ऐसी दवा है जो अकेले आरोग्यवर्धिनी वटी, पुनर्नवादि मंडूर, यकृतहर लौह और लोकनाथ रस जैसी शास्त्रीय औषधि से अच्छा काम करती है, तो इसी बात से आप इसका महत्त्व समझ सकते हैं. 

गौमूत्रादि घन कैप्सूल की मात्रा और सेवन विधि - 

एक से दो कैप्सूल तक सुबह-शाम पानी से लेना चाहिए. 

इसके 60 कैप्सूल की क़ीमत है सिर्फ़ 170 रुपया जो अवेलेबल है lakhaipur.in पर जिसका लिंक  दिया गया है. 


18 June 2019

Lodhrasava Benefits in Hindi | लोध्रासव के फ़ायदे


यह एक शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जो मूत्ररोग, किडनी और गर्भाशय विकारों में प्रयोग की जाती है, तो आईये जानते हैं इसके कम्पोजीशन और फ़ायदे के बारे में विस्तार से - 

लोध्र पठानी इसका पहला घटक है और इसी पर लोध्रासव इसका नाम दिया गया है. 

लोध्रासव के घटक या कम्पोजीशन - 

इसे लोध्र पठानी, कचूर, फूल प्रियंगु, पोहकरमूल, बड़ी इलायची, मूर्वा, विडंग, त्रिफला, अजवायन, चव्य, सुपारी, इन्द्रायणमूल, चिरायता, कुटकी,  भारंगी, तगर, चित्रकमूल, पीपलामूल, कूठ, अतीस, पाठा, इन्द्रजौ, नागकेशर, नखी, तेजपात, काली मिर्च और मोथा जैसी जड़ी-बूटियों के मिश्रण से शहद और पानी के साथ सन्धान या फ़रमेनटेशन प्रोसेस से इसका आसव बनाया जाता है. 

लोध्रासव के फ़ायदे- 

इसके फ़ायदों की बात करें तो किडनी, मूत्राशय, गर्भाशय और लिवर पर इसका ज़्यादा असर होता है.

यह पेशाब की जलन को दूर करता है, बार-बार अधीक पेशाब होना, बून्द-बून्द या कम पेशाब होना, पेशाब के समय तकलीफ़ होना, पेशाब नली की सुजन और इन्फेक्शन में इस से फ़ायदा होता है.

कब्ज़, अरुचि, संग्रहणी, खून की कमी और जौंडिस में भी इसे सहायक औषधि के रूप में लेने से लाभ होता है. 

स्वप्नदोष, धातुस्राव, महिलाओं के गर्भाशय रोग जैसे ल्यूकोरिया और पीरियड रिलेटेड प्रॉब्लम में इस से अच्छा लाभ होता है. 

लोध्रासव की मात्रा और सेवन विधि - 

15 से 30 ML तक सुबह-शाम भोजन के बाद बराबर मात्रा में पानी मिक्स लेना चाहिए. रोगानुसार मुख्य औषधियों के साथ इसे सहायक औषधि के रूप में ही लेना चाहिए. यह ऑलमोस्ट सेफ़ दवा है, किसी तरह का कोई साइड इफ़ेक्ट या नुकसान नहीं होता है इसके सेवन से. आयुर्वेदिक कंपनियों की यह मिल जाती है, इसे ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं जिसका लिंक दिया जा रहा है.