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07 September 2021

Cissus Quadrangularis | हड़जोड़ - अस्थि शृंखला

 


सबसे पहले भाषा भेद से इसके नाम जान लेते हैं - 

संस्कृत में - अस्थि शृंखला, अस्थिसंहारी, वज्रवल्ली 

हिन्दी में - हड़जोड़

गुजराती में - हाडसांकल 

मराठी में - कांडवेल

बांग्ला में - हाड़जोड़ा 

तमिल में - पिण्डयि 

तेलुगु में - नल्लेरू 

कन्नड़ में - मंगरोली 

अंग्रेज़ी में - एडिबुल-स्टेम्ड वाइन कहते हैं जबकि 

लैटिन में - सिसस कवैडरेन्गुलारिस( Cissus Quadrangularis, Vitis Quadrangularis) जैसे नामों से जाना जाता है

लम्बी-लम्बी तीन-चार धारी वाली हड्डियों के सांकल के समान दिखने वाली लता होने कारण ही इसे अस्थि श्रृंखला कहा जाता है. तासीर में यह उष्ण या गर्म होती है.

हड़जोड़ के गुण 

आयुर्वेदानुसार यह कफ़वात शामक, पित्तवर्द्धक, अस्थिसंधानीय, दीपक, पाचक, अनुलोमक, स्तम्भक, रक्त शोधक, रक्त स्तम्भक और क्रीमी नाशक जैसे गुणों से भरपूर होती है. 

हड़जोड़ के उपयोग 

हड्डी टूटने और वात रोगों में अक्सर गाँव के लोग इसके पकौड़े बनाकर खाते हैं. इसके काण्ड के छिलके हटाकर, उड़द की दाल में मिक्स कर तिल के तेल में पकौड़े बनाकर खाने से हर तरह के वात रोगों में चमत्कारी लाभ होता है. यकीन न हो तो आप से आज़मा कर देख लें.

हड्डी टूटने पर इसे इसे पीसकर इसका लेप कर ऊपर से प्लास्टर करने से टूटी हुयी हड्डी बहुत तेज़ी से जुड़ जाती है. 

टूटी हड्डी के रोगी को इसका ताज़ा रस दस से बीस ML तक पीना चाहिए. 

रीढ़ की हड्डी के दर्द में इसके कांडों का बिछौना बनाकर रोगी लिटाया जाता है, यह एक प्राचीन प्रयोग है. 

हड़जोड़ और सोंठ बराबर मात्रा में लेकर कूटपीसकर चूर्ण बनाकर सेवन करने से अग्निमान्ध और अजीर्ण दूर होकर पाचन शक्ति ठीक होती है और भूख बराबर लगने लगती है. 

मसूड़ों की सुजन में इसके रस को मूंह में रखने से लाभ होता है. 

ध्यान रहे - इसे स्किन पर ऐसे ही लगाने या फिर खाने से थोड़ी चुन-चुनाहट होती है. 

अस्थिसंहारकादि चूर्ण - 

भैषज्य रत्नावली में वर्णित यह एक बड़ा ही विशिष्ट योग है जिसे आज का वैद्य समाज भूल गया है. 

इसका निर्माण बड़ा ही सरल है, इसके लिए हड़जोड़ के कांड और पत्ते, पीपल की लाख, गेहूँ दाना और अर्जुन छाल सभी समान भाग लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें. एक चम्मच इस चूर्ण को सुबह-शाम एक टी स्पून घी और एक ग्लास दूध के साथ लेने से टूटी हुयी हड्डी, टुटा हुआ जोड़ और हर तरह के फ्रैक्चर में बेजोड़ लाभ होता है. 

तिल तेल में सिद्ध कर इसका तेल भी बनाया जाता है जो चोट-मोच, वात व्याधि और फ्रैक्चर में लाभकारी होता है. 

आयुर्वेद की प्रसिद्ध औषधि 'लक्षादि गुग्गुल' का भी यह एक घटक है. 

यह थी आज की जानकारी, हड़जोड़ के बारे में. 

हिमालया हड़जोड़ कैप्सूल 





03 September 2021

Pashupat Ras | पाशुपत रस

 


यह एक शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जो बहुत कम प्रचलित है. इस योग से आप अनभिज्ञ न रहें इसके लिए आज मैं पाशुपत रस के गुण, उपयोग और निर्माण विधि के बारे में बताऊंगा, तो आईये जानते हैं इसके बारे में सबकुछ विस्तार से  - 

पाशुपत रस के घटक और निर्माण विधि -

शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गन्धक 2 भाग, तीक्ष्ण लौह भस्म 3 भाग और शुद्ध बच्छनाग 6 भाग लेकर सब से से पहले पत्थर के खरल में पारा-गन्धक को खरल कर कज्जली बना लें

इसके बाद शुद्ध बच्छनाग का बारीक चूर्ण और तीक्ष्ण लौह भस्म को डालकर 'चित्रकमूल क्वाथ' में एक दिन तक घोटें. 

इसके बाद धतूरे के बीजों की भस्म 32 भाग, सोंठ, मिर्च, पीपल, लौंग और इलायची प्रत्येक 3-3 भाग, जायफल और जावित्री प्रत्येक आधा भाग, पञ्च नमक ढाई भाग, थूहर, आक, एरण्ड मूल, अपामार्ग, पीपल(वृक्ष) क्षार, हर्रे, जवाखार, सज्जी क्षार, शुद्ध हीरा हिंग, जीरा और शुद्ध सुहागा प्रत्येक एक-एक भाग लेकर बारीक चूर्ण बनाकर पहले वाली दवा में मिलाकर एक दिन तक निम्बू के रस में घोंटकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. बस पाशुपत रस तैयार है. 

पाशुपत रस की मात्रा और सेवन विधि 

एक-एक गोली सुबह-शाम भोजन के बाद ताल मूली के रस और पानी से 

पाशुपत रस के गुण 

आयुर्वेदानुसार यह शोधक, दीपक, पाचक, संग्राहक, आमपाचक, वात नाशक, पित्त शामक और कफ़ नाशक भी है. ह्रदय को शक्ति देने वाली और तेज़ी से असर अकरने वाली औषधि है. इसके सेवन से विशुचिका शीघ्र नष्ट होती है. 

पारे और गंधक के रसायन और पाचक गुणों के अतिरिक्त इसमें लौह रक्तवर्धक, जायफल और धतुरा बीज रोधक गुणों से पूर्ण है. क्षार, लवण और थूहर भेदक गुणों का होता है. इस प्रकार से यह औषधि रोधक और भेदक होने से आँतों की क्रिया शिथिलता को दूर करने में सफ़ल है. यह आंत, लिवर और स्प्लीन को एक्टिव करती है और शक्ति देती है. अग्नि को तेज़ कर पाचन ठीक करती है और प्रकुपित वायु को भी नष्ट करती है. 

पाशुपत रस के रोगानुसार अनुपान 

अलग-अलग अनुपान से इसके सेवन से अनेकों रोगों में लाभ होता है जैसे - 

तालमूली के रस के साथ सेवन करने से उदर रोगों या पेट की बीमारियों को नष्ट करती है 

मोचरस के साथ सेवन करने से अतिसार या दस्त की बीमारी दूर होती है 

संग्रहणी में इसे छाछ के साथ सेंधानमक मिलाकर लेना चाहिए 

दर्द वाले रोगों या वात रोगो में इसे पीपल, सोंठ और सौवर्चलवण के साथ लेना चाहिए 

पीपल के चूर्ण के साथ लेने से TB की बीमारी में लाभ होता है 

बवासीर में छाछ के साथ लें 

पित्त रोगों में बुरा और धनिये के साथ लेना चाहिए 

इसी तरह से पीपल और शहद के साथ लेने से  कफ़ रोगों को दूर करती है. 

ध्यान रहे - यह तेज़ी से असर करने वाली रसायन औषधि है तो इसे स्थानीय वैद्य जी की देख रेख में ही सेवन करना चाहिए. 



28 August 2021

विजया कल्प

 


भाँग को कल्प के रूप में भी प्रयोग किया जाता है जिसे विजया कल्प कहा जाता है. क्यूंकि भाँग का एक नाम विजया भी है. 

तंत्रशास्त्र में इसका वर्णन मिलता है जो आयुर्वेद सम्मत भी है, और सिमित मात्रा में इसका सेवन करने से हानि नहीं होती. 

विजया कल्प 

कल्प को लम्बे समय तक प्रयोग किया जाता है. साल में बारह महीने होते हैं और इन बारह महीनो में भांग को किस तरह से सेवन किया जाता है यही जानते हैं. 

1) चैत्र माह में पुरे महीने पान के साथ इसका सेवन करने से इसका प्रभाव बुद्धिवर्द्धक होता है. ध्यान रहे शोधित भाँग को ही कल्प के रूप में प्रयोग करना है. 

2) बैशाख के पुरे महीने में इसके सेवन से कोई भी विष प्रभाव नहीं करता है. 

3) जेठ के महीने में तेंदू के साथ सेवन करने से शरीर की कान्ति बढ़ती है. 

4) आषाढ़ मास में चित्रक के साथ सेवन करने से केश कल्प हो जाता है. 

5) सावन में शिवलिंगी के साथ इसका सेवन करने से बल की वृद्धि करता है. 

6) भादो के महीने में रूद्रवन्ती के साथ सेवन करने से तन और मन को शान्ति मिलती है. 

7) कुआर मास में मालकांगनी के साथ इसका प्रयोग करने  से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ ठीक रहता है. 

8) कार्तिक के महीने में बकरी के दूध के साथ भाँग का सेवन करने से काम शक्ति की वृद्धि हो जाती है. 

9) अगहन के महीने में गाय के घी के साथ खाने से आँखों की कमज़ोरी दूर होती है. 

10) पूस के महीने में काले तिलों के साथ भाँग का सेवन करने से नज़र तेज़ होती है. 

11) माघ के महीने में नागरमोथा के साथ भाँग का चूर्ण सेवन करने से शरीर बलवान होता है.

12) फाल्गुन के महीने में आँवला के चूर्ण के साथ भाँग का सेवन किया जाये तो पैरों में हिरण के जैसी कुलांचें भरने की शक्ति प्राप्त होती है. दौड़ने, चलने और कूदने में में व्यक्ति विशेष रूप से लाभ का अनुभव करता है. 

इस तरह से भाँग का सेवन करने से आश्चर्यजनक रूप से इसका प्रभाव सुखद होता है. घी, दूध, बादाम, कालीमिर्च, सौंफ़, गुलाब, इलायची इत्यादि के साथ इसका सेवन करने से इसकी मादकता और विषाक्त अंश समाप्त हो जाता है तथा इसका प्रभाव स्मृतिवर्धक, शक्तिदायक और निद्राकारी हो जाता है. 

भाँग के 100 प्रयोग जानिए 




25 July 2021

नाड़ी परीक्षा सीखकर अपनी प्रैक्टिस में चार चाँद लगाईये और अपना ज्ञान बढाइए!!!

 


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16 May 2021

ऑक्सीजन लेवल गिरने नहीं देती यह औषधि - 100% गारन्टी

 


आज के समय में अक्सर लोग पूछते रहते हैं कि आयुर्वेद में ऐसी कोई औषधि है जो शरीर में ऑक्सीजन लेवल कम न होने दे? ऑक्सीजन की कमी से हमारे देश में हज़ारों मौतें हो रही हैं और लोग ऑक्सीजन सिलिंडर पाने के लिए कितना परेशान हो रहे हैं यह सब किसी से छुपा नहीं है. 

आयुर्वेदिक ग्रंथों में ऐसे अनेकों योग भरे पड़े हैं जो बड़ी से बड़ी बीमारी में तेज़ी से रिजल्ट देते हैं. ऐसा ही एक योग है 'गोरोचनादि गुलिका' 

गोरोचनादि गुलिका के घटक या कम्पोजीशन - 

यह एक स्वर्ण घटिक औषधि है जो अनेकों जड़ी-बूटियों और भस्मों के संयोग से बनायी जाती है, इसका मुख्य घटक गोरोचन है जिसके कारण ही इसे गोरोचनादि गुलिका का नाम दिया गया है. गुलिका, गुटिका, वटी जैसे नाम आयुर्वेद में गोली या टेबलेट के ही होते हैं. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे यह सब मिले होते हैं - 

गोरोचन, मृगश्रृंग भस्म, रुद्राक्ष, चन्दन, बच, उशीर, कमल, गोश्रृंग,महिषा श्रृंग, नाग भस्म, स्वर्ण भस्म, प्रवाल भस्म, टंकण भस्म, रसौत, कपूर, अम्बर, जीरा, काला जीरा, द्रोणपुष्पि, किरातिक्त, कर्पसा, अपामार्ग, लहसुन, चीराबिल्व, सोंठ, मिर्च, पीपल, अग्निमन्था, ईश्वरी, पाठा, शँखपुष्पि, नीलिनी, हर्रे, बहेड़ा, आँवला, जायफल, सौंफ़ और मोथा प्रत्येक समान भाग लेना होता है. 

निर्माण विधि यह है कि सभी जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण कर भस्मों को मिलाकर अदरक के रस में घोटकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. 

मात्रा और सेवन विधि 

एक से दो-गोली तक सुबह-दोपहर-शाम यानि डेली तीन बार गर्म पानी से, या फिर वैद्य जी के निर्देशानुसार

गोरोचनादि गुलिका के गुण 

आयुर्वेदानुसार यह वात और कफ़ दोष को बैलेंस करता है और पित्त को जागृत करता है.

गोरोचनादि गुलिका के फ़ायदे 

इसके सेवन से पहले दिन से ही ऑक्सीजन लेवल गिरने नहीं देता और कोरोना जैसे तमाम लक्षणों को दूर करने में असरदार है. आज के समय में देश के कई अनुभवी वैद्य इसका प्रयोग कर लोगों की जान बचा रहे हैं. 

बुखार, न्युमोनिया, खांसी, सर्दी, साँस की तकलीफ, अस्थमा, गले का इन्फेक्शन, टोन्सीलाइटिस, कम सुनाई देना, आँखों की रौशनी की कमी, हार्ट की कमजोरी, पाचन शक्ति की कमज़ोरी जैसे रोगों को दूर करने में बेहद असरदार है. 

चूँकि यह अधीक प्रचलित योग नहीं है इसलिए इक्का दुक्का आयुर्वेदिक कम्पनियां ही इसका निर्माण करती हैं, जिसे आप सर्च कर सकते हैं या स्थानीय वैद्य जी से पता कर सकते हैं. 


09 May 2021

Drink daily and boost your Immunity | अपनी इम्युनिटी बढ़ाएं इस काढ़े से

 


पिछले विडियो में मैंने एक काढ़े का ज़िक्र किया था जिसके सेवन से मुझे कोरोना जैसे लक्षणों में काफ़ी लाभ हुआ था. तो आईये जानते हैं इस काढ़े के फ़ायदे और इसमें मिलायी जाने वाली चीजों के गुण के बारे में विस्तार से जानते हैं- 

सबसे पहले एक बार फिर से काढ़ा का Ingredients एक बार फिर से जान लेते हैं -

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काढ़ा बनाने के लिए चाहिए होता है 

लौंग 4 दाना 

इलायची 4 दाना 

दालचीनी - छोटा टुकड़ा 

काली मिर्च 5 दाना 

तेजपात 3 पीस 

तुलसी के पत्ते 7 पीस 

कलोंजी(मंग्रेला) 1/2 स्पून 

अदरक- छोटा टुकड़ा 

हल्दी 1 स्पून 

गुड़ 2 स्पून 

इन सभी को 1 लीटर पानी में उबालकर चाय की तरह पीना है. चाहें तो इसमें आप आधा स्पून चाय पत्ती भी मिला सकते हैं 

इस काढ़ा के फ़ायदे- 

इसे पीने से सर्दी-खाँसी, जुकाम, बुखार, मुँह का स्वाद जाना, स्मेल नहीं आना जैसे लक्षणों में फ़ायदा मिलता है और यह इम्युनिटी पॉवर या रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. इसे पीने से वायरल रोगों से बचाव होता है. 

आईये अब जान लेते हैं इसमें मिलायी गयी चीजों के बारे में आयुर्वेद क्या कहता है, थोड़ा संक्षेप में जान लेते हैं - 

लौंग -

अंग्रेज़ी में इसे क्लोव कहते हैं जबकि आयुर्वेद में इसे लवंग कहा गया है. लौंग के गुणों की बात करें तो यह एंटी वायरल, एंटी सेप्टिक, एंटी-माइक्रोबियल जैसे गुणों से भरपूर होता है. सर्दी-जुकाम, साइनस, दांत दर्द को दूर करता है और पाचन ठीक करने में मदद करता है. 

इलायची -

छोटी इलायची एक बेजोड़ आयुर्वेदिक औषधि है. न सिर्फ इसका सुगन्ध और स्वाद बढ़िया होता है बल्कि गुणों में भी बेजोड़ है. खाँसी, सर्दी-जुकाम, गले की ख़राश, गले की सुजन, गैस, एसिडिटी और साँस की तकलीफ़ में यह असरदार है. यह एन्टी ऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होती है.

दालचीनी - 

दालचीनी ब्लड प्रेशर को नार्मल करती है. सर्दी-जुकाम और एलर्जी को दूर करती है और बचाव भी करती है. आयुर्वेद का प्रसिद्ध योग 'त्रिजात' का यह अभिन्न अंग है. जो लगभग सभी रसायन औषधियों में प्रयोग होती है. 

काली मिर्च-

अंग्रेजी में ब्लैक पीपर, पीपर और लोकल भाषा में गोलकी के नाम से भी जाना जाता है. यह भी आयुर्वेदिक औषधियों की अभिन्न अंग है. सर्दी-खाँसी, जुकाम, सर दर्द दूर करती है. दांत दर्द, पाचन कमजोरी, कोलेस्ट्रॉल, शुगर इत्यादि अनेकों रोगों में इसका सेवन लाभकारी है. इसके गुणों की जितना प्रशंशा की जाये कम है. 

तेजपात -

इसे पत्ता और तीस पत्ता भी कहा जाता है. भारतीय किचन में यह प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है. यह हार्ट को शक्ति देता है. सर्दी, जुकाम, कफ़ को दूर करता है 

तुलसी - 

तुलसी को कौन नहीं जानता? तुलसी की पत्तियां बुखार, सर्दी-जुकाम, ठण्ड लग्न, बलगम आना, खांसी, सर दर्द, साँस की तकलीफ़ जैसी अनेक समस्याओं के लिए बेहद असरदार है. इम्युनिटी बढ़ाने और निरोग रखने में मदद करती है. 

कलौंजी -

कलौंजी को मंग्रेला के नाम से जाना जाता है. यह त्रिदोष नाशक है. काले रंग के यह छोटे-छोटे बीज बड़े-बड़े गुणों से भरपूर होते हैं. यह सर से लेकर पैर तक के सभी रोगों में फ़ायदेमंद है. हदीस में है कि काले रंग के यह छोटे बीज मौत के सिवा हर मर्ज़ को दूर करता है. 

अदरक - 

वात-कफ़ रोगों के लिए अदरक बेजोड़ औषधि है. इसके बिना आयुर्वेद की कोई भी रसायन औषधि नहीं बनती है. सर्दी-जुकाम, कफ़ को दूर करने में बेजोड़ है. कब्ज़, गैस, कोलेस्ट्रॉल, गठिया, वातरोग जैसे अनेकों रोगों में असरदार है. 

हल्दी - 

पीले रंग की यह जड़ी गुणों का भण्डार है. यह नेचुरल एन्टी बायोटिक की तरह काम करती है वह भी बिना साइड इफ़ेक्ट के. स्किन से लेकर लिवर, सर्दी-जुकाम से लेकर कैंसर जैसी बीमारी में भी असरदार है. एंटी ऑक्सीडेंट है, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है. 

गुड़ - 

स्वाद में मीठापन लिए हुआ यह पदार्थ हमारे हेल्थ के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद है. जुकाम और खाँसी को दूर करता है. कब्ज़, गैस, पाचन शक्ति की कमज़ोरी, खून की कमी जैसे अनेकों रोगों में इसके सेवन से लाभ होता है. 

तो दोस्तों, अब आप समझ सकते हैं कि इतनी सारी चीज़ों को मिलाकर बनाने के बाद यह काढ़ा कितना असरदार हो जाता है. यह एक ऐसा कॉम्बिनेशन है जिसका मुकाबला दूसरा कोई भी काढ़ा नहीं कर सकता. 

आज के समय के लिए यह सबसे उपयुक्त है. सभी लोगों को इसका सेवन कर लाभ उठाना चाहिए. 

पित्तज प्रकृति के लोग या जिनको एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी जैसी समस्या हो तो कम मात्रा में ही इसका सेवन करें. 

और बहुत ज़्यादा भी इसका यूज़ न करें कि पेट गर्म हो जाये. हर चीज़ को अपनी बॉडी के अनुसार ही लेना चाहिए. कोई भी चीज़ कितनी भी अच्छी क्यों न हो, बहुत ज़्यादा यूज़ करना ठीक नहीं होता.

कहा भी गया है - अति सर्वर्त्र वर्जयेत




06 May 2021

My Personal Experience | तेज़ बुखार, खाँसी, सर्दी, मुँह का स्वाद जाना, स्मेल नहीं आना से मुक्ति

 इस विडियो में मैं आपको बताने वाला हूँ कि मुझे कोरोना जैसे लक्षण होने पर कौन सी औषधि सेवन करने से मुक्ति मिली है - 


जय हिन्द, जय आयुर्वेद !


01 February 2021

Berberis Aristata | दारुहल्दी क्या है रसौत क्या है?

 

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दारूहल्दी के बारे में आपने सुना होगा, बहुत सारी आयुर्वेदिक औषधियों के कम्पोजीशन में इसका ज़िक्र होता है. दारुहल्दी दारू या शराब है या हल्दी? कई लोग ग़लतफहमी में इसे कुछ और समझ बैठते हैं, तो आईये इसके बारे में सारी चीज़ें क्लियर कर देता हूँ - 

दारुहल्दी नाम की जो औषधि है वह न तो दारु है और न ही हल्दी. कई जगह शराब को भी दारु कहा जाता है. 

दारुहल्दी को संस्कृत में दारूहरिद्रा कहा जाता है. यहाँ दारु का अर्थ है 'लकड़ी' और हरिद्रा मतलब हल्दी 

तो इस तरह से दारूहल्दी का अर्थ निकलता है हल्दी के जैसी पीले रँग की लकड़ी. यह बिलकुल पीले रंग की होती है, देखते पर ऐसा लगता है कि पीले रंग से रंगा गया हो. 

आईये अब भाषा भेद से इसका नाम जानते हैं - 

संस्कृत में - दारूहरिद्रा, दार्वी, कंटकटेरी और पंचपचा भी कहा जाता है

हिंदी में - दारुहल्दी 

गुजराती में - दारुहलदर 

मराठी में - दारूहलद 

बंगाली में - दारूहरिद्रा 

पंजाबी में - दारहल्दी 

तमिल में - मरमंजल 

तेलगु में - कस्तूरीपुष्प 

फ़ारसी में- दारचोबा 

अंग्रेजी  में - इण्डियन बर्बेरी(Indian Barberry)

लैटिन में - बर्बेरिस एरिस्टेटा(Berberis Aristata) कहते हैं.

होम्योपैथिक दवा बर्बेरिस इसी से बनायी जाती है. 

आयुर्वेद में मूल रूप से इसकी लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है. 



आयुर्वेदानुसार यह कफपित्त शामक है यानी कफ़ दोष और पित्त दोष का शमन करती है. कामला, यकृत के रोग यानी लिवर की सभी बीमारियाँ, प्रमेह, व्रण या ज़ख्म और रक्तदोष से होने वाले रोग और नेत्र रोगों में यह लाभकारी है. 

रसौत क्या है? 

यह दारूहल्दी से बनाया जाता है. इसे रसौत, रसवत, रसांजन जैसे नामों से भी जाना जाता है. यह असल दारूहल्दी का ही कंसंट्रेशन है. 



रसौत कैसे बनाया जाता है?

रसौत या रसांजन बनाने के लिए दारूहल्दी के छोटे छोटे बारीक टुकड़े कर इसके वज़न का 16 गुना पानी मिलाकर क्वाथ बनाया जाता है. जब एक चौथाई पानी शेष रहे तो छानकर दुबारा हलवे की तरह गाढ़ा होने तक उबाला जाता है,इसके बाद धुप में सुखा लिया जाता है. यही रसौत या रसांजन है.

इसे अनेकों औषधियों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है. यूनानी में भी रसौत का बहुत प्रयोग होता है.