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22 November 2020

Know Your Prakriti | जानिए अपनी प्रकृति को | Tridosha Quiz

 

tridosha quiz

आज चर्चा करने वाला हूँ प्रकृति के बारे में. कफ़, पित्त और वात के बारे में आपने सुना ही होगा. तो आईये जानते हैं कि प्रकृति क्या है? प्रकृति के भेद, प्रकृति की पहचान, इनका स्थान और इसके बारे में सबकुछ विस्तार से - 

शरीर की प्रकृति को Constitution of Body कह सकते हैं. प्रकृति को ही 'तासीर' भी कहा जाता है. 

वात से अस्सी, पित्त से चालीस और कफ से बीस तरह के रोग होते हैं

कफ दोष- शरीर की सरंचना को नियंत्रित और प्रभावित करता है

पित्त दोष - पाचन क्रिया को नियंत्रित और प्रभावित करता है

वात दोष - गति को नियंत्रित और प्रभावित करता है

हमारे आयुर्वेद के मनीषियों ने बहुत पहले ही  बता दिया था गर्भ काल से ही दोषों की प्रकृति मनुष्य पर असर करने लगती है. यह सब कई मॉडर्न रिसर्च से भी साबित हो चूका है



कफ़, पित्त और वात यह तीन तरह की मुख्य प्रकृति होती है पर इसके भी कुछ भेद होते हैं. आचार्य चरक के अनुसार कुल सात प्रकृतियों के शरीर होते हैं.

1) कफ प्रकृति

2) पित्त प्रकृति 

3) वात प्रकृति 

4) वातपित्त प्रकृति 

5) वातकफ प्रकृति 

6) पित्तकफ प्रकृति 

7) वातपित्तकफ प्रकृति या मिश्रित प्रकृति, इसकी को 'सम' प्रकृति भी कहा जाता है.



कफ प्रकृति 

कफ- जल और पृथ्वी का प्रतिनिधि है 

कफ का स्थान 

उरः प्रदेश यानी चेस्ट या सिने के पूरा एरिया, कन्ठ, नासिका, बाहू, आमाशय, छोटे बड़े जॉइंट्स, ग्रीवा, मेद यह सब कफ के स्थान होते हैं.

कफ प्रकृति के गुण -कफ को श्लेष्मा भी कहते हैं यह चिकना, मुलायम, गाढ़ा, स्वाद में मीठा, शीतल यानी ठण्डा और लुआबदार होता है. 

कफ प्रकृति वाले व्यक्ति का चेहरा गोल-मटोल, शरीर गठीला और पुष्ट होता है.

कफ प्रकृति वाले लोग कोई भी काम जल्दबाज़ी में नहीं करते हैं, Slow Activity के होते हैं. मोटापे की प्रवृति होती है, शहनशील होते हैं. 

इनकी चाल धीमी होती है, नीन्द गहरी आती है, शरीर माँसल होता है. कोई निर्णय सोच-समझ का लेते हैं. 

कफ प्रकृति के मनुष्य शांत, सुखी, ओजस्वी, गंभीर और दीर्घायु होते हैं



पित्त प्रकृति 

पित्त - अग्नि और जल का प्रतिनिधि है 

पित्त का स्थान- पित्त का प्रधान स्थान पक्वाशय या आंत और आमाशय की मध्यस्थली(ग्रहणी) है. लिवर-स्प्लीन, हार्ट, स्किन और दृष्टि में भी पित्त का स्थान है. आचार्य चरक के अनुसार रस, रक्त, लसिका, स्वेद और आमाशय पित्त का स्थान है.

पित्त का मूल गुण उष्ण या गर्म होता है. 

पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति मयाने क़द के न लम्बे न बौने, न मोटे न दुबले होते हैं.

शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति मध्यम होती है और मेहनती होते हैं

पित्त प्रकृति वालों में गुस्सा जल्दी होना, चिड़चिड़ापन, गर्मी बर्दाश्त नहीं होना, तेज़ भूख लगना, गर्म चीज़ सूट नहीं करना जैसे लक्षण होते हैं.

टाइम के पाबन्द, तेज़ चाल, चैलेंज एक्सेप्ट करने वाले और कंसंट्रेशन वाले होते हैं. 

सात्विक आहार इनको पसन्द होता है. चाय-काफ़ी, नशा और गर्म तासीर वाले भोजन इनको सूट नहीं करते. 

पित्त प्रकृति के लोगों की पाचन शक्ति तेज़ होती है, गर्मी बहुत लगती है और पसीना भी जल्दी आता है. 



वात प्रकृति 

वात का स्थान 

पक्वाशय ही वात या वायु का विशेष स्थान है. अस्थि या हड्डी, पैर की हड्डी और त्वचा में यह विधमान होता है.

वात- आकाश और वायु का प्रतिनिधि है 

वात प्रकृति के गुण - यह रुखा, ठण्डा, लघु जैसे गुणों वाला होता है. 

वात प्रकृति के व्यक्ति का शरीर हल्का, दुबले क़द-काठी वाला होता है, इनकी आवाज़ कमज़ोर और फटी हुयी होती है, कोई भी काम तेज़ी से करते हैं, नीन्द कम आती है, गहरी नींद नहीं आती.

भूख और पाचन शक्ति अनियमित होती है, कब्ज़, चिंता, तनाव जैसी समस्या हो सकती है. 

वात प्रकृति वाले ज़्यादा बात करने वाले, चिन्ता करने वाले, तिल को ताड़ बनाने वाले और किसी बात पर क़ायम नहीं रहने वाले होते हैं.

वात प्रकृति वालों को अवर बल वाला कहा गया है.

वात पित्त प्रकृति 

वात पित्त प्रकृति के व्यक्ति में गर्मी सहन करने की थोड़ी क्षमता होती है. बुद्धि तेज़ होती है, कोई भी चैलेंज एक्सेप्ट करने से पहले थोड़ा घबराते हैं परन्तु पीछे नहीं हटते. संवेदनशीलता, धैर्य की कमी और तनाव जैसे लक्षण इनमे पाए जाते हैं. 

पित्त कफ़ प्रकृति 

इनका शरीर भारी पर सुडौल होता है. चाल और बुद्धि तेज़, गुस्सा और Criticize करने की आदत होती है.

वात कफ प्रकृति 

ऐसे व्यक्ति संवेदनशील, शांत, सुगठित शरीर वाले और शान्ति प्रिय होते हैं. पाचन मन्द होता है और ठण्डा आहार-विहार इनको सूट नहीं करता है. 

सम प्रकृति या त्रिदोष प्रकृति 

ऐसे प्रकृति वालों का तीनो दोष यानी कफ, पित्त और वात बैलेंस होता है. ऐसी व्यक्ति हर तरह से फिट और स्वस्थ होते हैं और लम्बा जीवन जीते हैं. 

तो यह थी प्रकृति के बारे में संक्षेप में जानकारी, चूँकि यह एक लम्बा विषय है इसपर घन्टों चर्चा की जाये तो भी कम पड़ेगा. 

आप किस प्रकृति के हैं आसानी से जानने के लिए आप 'प्रकृति निर्धारक प्रश्नोत्तरी' या क्विज में हिस्सा लेकर जान सकते हैं जिसका लिंक दिया गया है - प्रकृति निर्धारक प्रश्नोत्तरी 



20 November 2020

Bilwadi Lehya Benefits | बिल्वादि लेह्य/बिल्वाअवलेह के फ़ायदे

 

bilwadi lehya

बिल्वादि लेह्य को बिल्वा अवलेह, बिल्वादि लेह्यम जैसे नामों से जाना जाता है जिसका विवरण 'सहस्र योग'  में मिलता है जिसका मुख्य घटक बिल्व फल मज्जा का कच्चा बेल का गूदा होता है. 

बिल्वादि लेह्य के घटक या कम्पोजीशन 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बिल्व फल क्वाथ, गुड़, नागरमोथा, धनियाँ, जीरा, छोटी इलायची, दालचीनी, नागकेशर और त्रिकटु यानि सोंठ, मिर्च और पीपल के मिश्रण से अवलेह-पाक निर्माण विधि से बनाया जाता है. 

बिल्वादि लेह्य की मात्रा और सेवन विधि 

5 से 10 ग्राम रोज़ दो-तीन बार या वैद्य जी के निर्देशानुसार 

बिल्वादि लेह्य के फ़ायदे 

उल्टी, दस्त, पेचिश, अरुचि, ग्रहणी या IBS, आँव आना जैसी समस्या होने पर इसका सेवन किया जाता है. 

खाना खाते ही दस्त होना और बार-बार दस्त होने में सही डोज़ में इसका सेवन करना चाहिए.

खाँसी और अस्थमा में भी इस से लाभ होता है. 

चूँकि यह मल बाँधने वाली ग्राही औषधि है तो अधीक मात्रा में सेवन करने से कब्ज़ हो सकता है, इसका ध्यान रखना चाहिए. 

बच्चे-बड़े सभी को इसका सेवन करा सकते हैं, बस इसका डोज़ उम्र के हिसाब से होना चाहिए. 

ऑनलाइन ख़रीदने का लिंक दिया गया है- Dabur Bilwadi Lehya




25 October 2020

Sickle Cell Anemia Ayurvedic Medicine | वैद्य जी की डायरी#20


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सिकल सेल एनीमिया का नाम आपने सुना ही होगा, एक और जहाँ allopath इसमें फ़ेल है तो वहीँ दूसरी ओर आयुर्वेद इस रोग को नष्ट करने की क्षमता रखता है. वैद्य जी की डायरी में इसी के बारे में आज एक उपयोगी जानकारी दे रहा हूँ - 

सिकल सेल एनीमिया क्या है? 

सिकल सेल एनीमिया खून की ऐसी बीमारी है जिस से खून में RBC या लाल रक्त कोशिकाएँ बहुत कम बनती हैं. आधुनिक विज्ञान इसे जेनेटिक या आनुवांशिक मानता है. 

स्वस्थ शरीर में हीमोग्लोबिन की कोशिका ऐसी होती है जबकि सिकल सेल में कुछ इस तरह की दिखती है. 



इसके रोगी की औसत आयु बहुत कम जाती है. ये सब जानकारी तो आपको कहीं भी मिल जाएगी, आईये जानते हैं कि आयुर्वेद में इसका क्या उपाय है-

सिकल सेल एनीमिया के लिए असरदार आयुर्वेदिक योग -

सिकल सेल एनीमिया नाशक योग 

यह एक बहुत अनुभवी वैद्य जी का योग है जो आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ. इसके लिए आपको यह औषधियाँ लेनी होगी -

सहस्रपुटी अभ्रक भस्म 2 ग्राम + मुक्ता पिष्टी(न. 1) 2 ग्राम + पूर्णचन्द्रोदय मकरध्वज 2 ग्राम + प्रवाल पिष्टी 2 ग्राम + कसीस भस्म 2 ग्राम + पुटपक्व विषमज्वरांतक लौह 1 ग्राम और असली बंशलोचन 5 ग्राम

सिकल सेल एनीमिया नाशक योग की निर्माण विधि कुछ इस तरह से  है- 

सबसे पहले पूर्णचन्द्रोदय मकरध्वज को अच्छी तरह से खरल कर लें इसके बाद बारीक पिसा हुआ बंशलोचन और दुसरे भस्मो को मिलाकर ताज़ी गिलोय के रस, भृंगराज के रस और त्रिफला के क्वाथ की एक-एक भावना देकर सुखाकर रख लें. बस सिकल सेल एनीमिया नाशक योग तैयार है. 

मात्रा और सेवन विधि 

चार रत्ती या 500 mg सुबह-दोपहर-शाम शहद से यह व्यस्क व्यक्ति की मात्रा है. बच्चों को आधी से एक रत्ती तक उनकी उम्र के अनुसार रोज़ तीन बार तक शहद से चटाना चाहिए. 

औषध सेवन काल में पथ्य-अपथ्य का भी पालन कराएँ. नमक, मिर्च-मसाला, तेल, फ्राइड फ़ूड और गरिष्ठ भोजन से परहेज़ करना चाहिए. 

गाजर, टमाटर, चुकन्दर, अनार, खजूर, मुनक्का या किशमिश और अंजीर का सेवन करना चाहिए. 



21 October 2020

बवासीर से परेशान हैं तो यह ज़रूर पियें !!!

 

home remedy for piles

बवासीर बड़ा ही कष्टदायक रोग है, इसे आयुर्वेद में अर्श कहा गया है जबकि अंग्रेजी में पाइल्स और हेमोराइड जैसे नामो से जाना जाता है. पाइल्स के रोगी के लिए छाछ बहुत फ़ायदेमंद होती है, तो आईये इसके बारे में सबकुछ जानते हैं - 

छाछ को आयुर्वेद में तक्र कहते हैं, इसे मट्ठा, बटर मिल्क और यहाँ दुबई और गल्फ कंट्री में लबन जैसे नामों से भी जाना जाता है. 

विधिपूर्वक बना हुआ छाछ बवासीर के रोगियों के लिए दवा की तरह काम करता है चाहे बवासीर कैसी भी हो, ख़ूनी हो या बादी.

तो सवाल यह उठता है कि तक्र या छाछ है क्या और इसे बनाने की सही विधि क्या है?

अच्छी तरह से पके हुए गाय के दूध से जमे हुए दही में इसकी  आधी मात्रा में पानी मिलाकर मथकर मक्खन अलग कर रख लें, यही तक्र या छाछ है. 

ताज़े छाछ के सेवन से न सिर्फ़ बवासीर बल्कि पेट की बीमारियों में भी फ़ायदा होता है. बवासीर के रोगी जितना हो सके छाछ का सेवन करना चाहिए. पेट की बीमारियों और बवासीर को बिना दवा के दूर करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सक 'मट्ठा कल्प' कराते हैं. मट्ठा कल्प के बारे में फिर कभी विस्तार से बताऊंगा.

तक्र या छाछ के सेवन से ठीक हुआ बवासीर दुबारा नहीं होता है, ऐसा चरक संहिता में है.

आचार्य चरक के अनुसार - 

हतानि न विरोहन्ति तक्रेण गुदजानि तू |

भूमावपि निषिक्तं तद्दहेत्तक्रं तृणोलुपम |

कि पुनर्दीप्त कायाग्नने: शुष्कान्यर्शासि देहिन: ||

अर्थात- तक्र द्वारा नष्ट हुए अर्श पुनः उत्पन्न नहीं होते हैं. इसका उदाहरण देते हुए आचार्य चरक कहते हैं कि जब भूमि पर सिंचा हुआ तक्र वहां के त्रिन समूह को जलाता है, तब प्रदीप्ति जठराग्नि वाले मनुष्य शुष्कार्श का क्या कहना. अर्थात तक्र के सेवन से अर्श समूल नष्ट हो जाता है. 

तो इस तरह से आयुर्वेदिक ग्रन्थों से भी यह साबित हो जाता है कि तक्र या छाछ बवासीर के रोगियों के लिए बहुत लाभकारी है. 






11 October 2020

Bajikaran Churna | बाजीकरण चूर्ण - वैद्य जी की डायरी # 19

 

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आज वैद्य जी की डायरी में बताने वाला हूँ बाजीकरण चूर्ण के बारे में जो कमज़ोरी, वीर्य विकार, नामर्दी, शीघ्रपतन, जोड़ों का दर्द और कमर दर्द जैसे रोगों में असरदार है, तो आइये बाजीकरण चूर्ण के बारे में सबकुछ जानते हैं- 

बाजीकरण चूर्ण एक अनुभूत योग है जिसका निर्माण कर प्रयोग किया जाता है.

बाजीकरण चूर्ण के घटक- 

इसके घटक या कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बनाने के लिए चाहिए होता है असगंध नागौरी, विधारा और मधुयष्टि एक-एक भाग, देसी सोंठ और गिलोय सत्व चौथाई भाग और मिश्री दो भाग. निर्माण विधि बहुत ही सरल है, सभी काष्टऔषधियों का चूर्ण कर पीसी मिश्री और गिलोय सत्व मिक्स कर रख लें. 

बाजीकरण चूर्ण की मात्रा और सेवन विधि - 

एक स्पून या 5 से 10 ग्राम तक सुबह-शाम फाँक कर ऊपर से मिश्री मिला गुनगुना दूध पियें या गुनगुना पानी. भोजन के बाद ही सेवन करें.

बाजीकरण चूर्ण के फ़ायदे 

इसके सेवन से मर्दाना कमज़ोरी, नामर्दी, वीर्य विकार जैसे समस्त पुरुष यौन रोगों में लाभ होता है. 

जोड़ों का दर्द, कमर दर्द, गठिया-साइटिका जैसे वात रोग, हड्डी से कट-कट की आवाज़ आना जैसी प्रॉब्लम में भी इस से दूर होती है, लगातार इसका सेवन करते रहने से.

पाचन शक्ति को सुधारता है और कब्ज़ दूर करता है. महिला-पुरुष सभी इसका सेवन कर सकते हैं. 

हर मौसम में इसका प्रयोग कर सकते हैं, लॉन्ग टाइम तक सेवन करने से भी कोई नुकसान नहीं होता है. लगातार कुछ समय इसका प्रयोग करने से निश्चित रूपसे लाभ होता है.

यह मार्केट में नहीं मिलता, इसे ख़ुद बनाकर यूज़ करें या फिर अमृत योग मिले हुवे बाजीकरण चूर्ण ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं जिसका लिंक दिया गया है- बाजीकरण चूर्ण




01 October 2020

Vatgajendrasingh Ras | वातगजेन्द्रसिंह रस

 

vat gajendra singh ras

वातगजेन्द्रसिंह रस के बारे में जो एक दिव्य औषधि है. यह 80 प्रकार के वातरोग, 40 प्रकार के पित्तरोग और 20 प्रकार के कफ रोगों को दूर करती है. तो आईये जानते हैं वातगजेन्द्रसिंह रस का कम्पोजीशन, गुण-धर्म, निर्माण विधि और इसके उपयोग के बारे में विस्तार से - 

वातगजेन्द्रसिंह रस भैषज्य रत्नावली का योग है जो सिद्धहस्त वैद्यों द्वारा निर्माण कर प्रयोग किया जाता है. आज के समय में इक्का-दुक्का कंपनियां ही इसका निर्माण करती हैं. 

वातगजेन्द्रसिंह रस के घटक या कम्पोजीशन- 

इसे बनाने के लिए चाहिए होता है अभ्रक भसम, लौह भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, ताम्र भस्म, नाग भस्म, टंकण भस्म, शोधित बच्छनाग, सेन्धा नमक, लौंग, शोधित हींग और जायफल प्रत्येक 10-10 ग्राम 

छोटी इलायची के बीज, तेजपात, दालचीनी, हर्रे, बहेड़ा और आँवला प्रत्येक 5-5 ग्राम 

वातगजेन्द्रसिंह रस निर्माण विधि - 

सबसे पहले शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक को मिक्स कर खरलकर कज्जली बना लें और भस्मो को मिला लें, इसके बाद दूसरी औषधियों का बारीक चूर्ण मिक्स कर घृतकुमारी के रस में घोटकर दो-दो रत्ती या 250 mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. यही वातगजेन्द्रसिंह रस है. 

वातगजेन्द्रसिंह रस के गुण - यह एक रसायन औषधि तो है ही, इसके गुणों की बात करें तो यह त्रिदोष नाशक है यानी वात, पित्त और कफ तीनों तरह के दोषों को नष्ट करता है. यह शोधक, दीपक, रक्त वर्द्धक, बल-वीर्य वर्द्धक, मांसवर्द्धक और इन्द्रियों को शक्ति देता है. वात नाड़ियों की विकृति से होने वाले अनेकों रोगों को नष्ट करता है. 

वातगजेन्द्रसिंह रस के फ़ायदे- 

जैसा कि शुरु में बताया 80 प्रकार के वातरोग, 40 प्रकार के पित्तरोग और 20 प्रकार के कफ रोगों को दूर करने में सक्षम है. 

जोड़ों का दर्द, लकवा, पक्षाघात, साइटिका, आमवात जैसे हर तरह के वातरोगों में असरदार है.

वीर्य नाश या अधीक मैथुन के कारण इन्द्रियों की शक्ति क्षीण हो गयी हो तो इसके सेवन से लाभ होता है.

यह आमदोष का दूर करता है और पाचन तंत्र को बल देता है. यह विषनाशक है और सुजन को भी दूर करता है.

इसके सेवन से स्वस्थ मनुष्य अधिक स्वास्थ लाभ करते हैं और रोगी मनुष्य रोगमुक्त हो जाते हैं, यह रोगनाशक उत्तम रसायन है. 

वातगजेन्द्रसिंह रस की मात्रा और सेवन विधि - 

एक- एक गोली सुबह-शाम दूध से लेना चाहिए. 




06 September 2020

Tapyadi Lauh Benefits | ताप्यादि लौह के गुण और उपयोग

 


खून की कमी, जौंडिस, लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, पाचन विकृति और कुछ दुसरे रोगों में ताप्यादि लौह का प्रयोग किया जाता है, तो आईये जानते हैं ताप्यादि लौह क्या है? इसके कम्पोजीशन, निर्माण विधि और गुण-उपयोग के बारे में विस्तार से - 

ताप्यादि लौह शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जो लौह प्रधान होती है यानि आयरन रिच 

ताप्यादि लौह का कम्पोजीशन 

सभी लौह-मंडूर वाली औषधियों की तरह इसमें त्रिफला तो होता ही है. इसके सही कम्पोजीशन की बात करें तो इसके घटक कुछ इस तरह से होते हैं -

हर्रे, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, मिर्च, पीपल, चित्रकमूल और वायविडंग प्रत्येक 25-25 ग्राम, नागरमोथा 15 ग्राम, चव्य, देवदार, पिपरामूल, दालचीनी और दारूहल्दी प्रत्येक 10-10 ग्राम, लौह भस्म, चाँदी भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म और शुद्ध शिलाजीत प्रत्येक 100-100 ग्राम, मंडूर भस्म 200 ग्राम और पीसी हुयी मिश्री 320 ग्राम. यही इसका ओरिजिनल कम्पोजीशन होता है.

 आयुर्वेदिक कंपनियां इसे ताप्यादि लौह नम्बर-1 के नाम से बेचती हैं. चाँदी भस्म महँगी होने की वजह से बिना चाँदी भस्म वाला भी ताप्यादि लौह मिलता है जो महँगा नहीं होता, इसका भी वैसे ही इफेक्टिव है पर चाँदी भस्म मिले हुए ताप्यादि लौह से थोड़ा कम असरदार होता है.

ताप्यादि लौह निर्माण विधि 

सभी जड़ी-बूटियों का बारीक कपड़छन चूर्ण बनाकर इसमें भस्में और पीसी मिश्री मिक्स कर एयर टाइट डब्बे में रख लें. 

चूँकि औषध निर्माण का मेरा काफ़ी अनुभव रहा है तो बता दूँ कि चित्रकमूल और दारूहल्दी जैसी काष्ट औषधियों का बारीक चूर्ण बनाना बड़े ही परिश्रम का कार्य है. इनके छोटे-छोटे टुकड़े कर इमामदस्ते में डालकर जौकूट कर लें इसके बाद ही ग्राइंडर में डालकर पीसना चाहिए. हमारे समय में तो इमामदस्ते में ही कुटना पड़ता था, ग्राइंडर तो दूर की बात, गाँव में बिजली ही नहीं थी. 

ताप्यादि लौह की मात्रा और सेवन विधि 

तीन-तीन रत्ती या 375 से 500 mg तक दिन में दो बार मूली के रस या गोमूत्र से. 

ताप्यादि लौह के फ़ायदे

आयुर्वेदानुसार पांडू, कामला, प्रमेह, शोथ या सुजन और यकृत-प्लीहा रोगों को दूर करता है. 

ज़्यादा दिनों तक बुखार रहने से रस, रक्त, धातु और इन्द्री कमज़ोर होने से शारीरिक कमज़ोरी आ जाती है, पाचन ख़राब, खून की कमी, सुजन जैसी प्रॉब्लम होने पर इसके सेवन से लाभ होता है. 

किसी भी कारण से होने वाली खून की कमी, जौंडिस, कामला, लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, आँख, चेहरा, हाथ-पैर की सुजन जैसी समस्या इसके सेवन से दूर होती है. इसके सेवन से हीमोग्लोबिन नार्मल हो जाता है.

प्रमेह, आँतों की कमजोरी, पाचन शक्ति की कमजोरी और शारीरिक कमज़ोरी में भी इस से लाभ होता है. 

महिलाओं के पीरियड रिलेटेड रोगों में भी इसके सेवन से लाभ होता है. 

लौह, मंडूर, शिलाजीत और चाँदी का मिश्रण होने से यह टॉनिक का भी काम करता है. 

इसके घटकों को ध्यान में रखते हुए वैद्यगण अनेकों रोगों  में सफलतापूर्वक प्रयोग करते हैं. 

आयुर्वेदिक कंपनियों का यह मिल जाता है, ऑनलाइन खरीदने का लिंक दिया गया है- 


30 August 2020

Krimimudgar Ras | कृमिमुद्गर रस

 

krimimudgar ras

कृमिमुद्गर रस शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जिसका वर्णन 'रसराजसुन्दर' नामक ग्रन्थ में मिलता है. 

कृमिमुद्गर रस  के घटक या कम्पोजीशन - 

शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गंधक दो भाग, अजमोद तीन भाग, वायविडंग चार भाग, शुद्ध कुचला पाँच भाग और पलाश के बीज छह भाग 

कृमिमुद्गर रस  निर्माण विधि - 

यानी यह बनता कैसे है? इसे बनाने के लिए सबसे पहले शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक को पत्थर के खरल में डालकर इतना खरल किया जाता है कि बिल्कुल काले रंग का काजल की तरह बन जाये. इसके बाद दूसरी सभी चीजों का बारीक पिसा हुआ चूर्ण मिक्स कर रख लें. इसकी गोली या टेबलेट भी बनायी जाती है. 



कृमिमुद्गर रस  की मात्रा और सेवन विधि -

दो से चार रत्ती या 250 mg से 500 mg तक. या यूँ समझ लीजिये की एक से दो गोली तक शहद के साथ खाकर ऊपर से नागरमोथा का क्वाथ पीना चाहिए. नागरमोथा क्वाथ न मिले तो विडंगासव या विडंगारिष्ट ले सकते हैं. 

तीन दिन तक इसे लेने के बाद जुलाब लेना चाहिए. या फिर पेट साफ़ करने वाली औषधि. जुलाब या विरेचन के लिए 'इच्छाभेदी रस' जैसी दवा लेनी चाहिए. या फिर रोगी कमज़ोर हो तो एरण्ड तेल या पंचसकार जैसा सौम्य विरेचन ही लेना चाहिए. 

कृमिमुद्गर रस के फ़ायदे -

कफ़ संचय से होने वाले पेट के कीड़ों के लिए तेज़ी से असर करने वाली दवा है. 

यह कृमिकुठार रस से ज़्यादा तेज़ और पावरफुल है, इस बात का ध्यान रखें.

पेट में कीड़े होने की वजह से होने वाला पेट दर्द, पेट फूलना, अरुचि, उल्टी, भूख नहीं लगना जैसी प्रॉब्लम दूर होती है इसके सेवन से. 

पेट में कीड़े होने के कारण कई बार शरीर में खुजली और लाल चकत्ते भी हो जाते हैं और लोग इसे एलर्जी समझ बैठते हैं. ऐसी स्थिति में कृमिमुद्गर रस का सेवन करना चाहिए.

कृमिमुद्गर रस न सिर्फ पेट के कीड़े बल्कि शरीर के दुसरे भाग के कृमिजनित रोगों में भी असरदार है. इसीलिए फ़ाइलेरिया की औषधि 'श्लीपदहर योग' का यह एक घटक है. 

कृमिमुद्गर रस के साइड इफ़ेक्ट -

चूँकि यह कुचला प्रधान योग है तो कोमल प्रकृति वालों को सूट नहीं करता और स्वाद में बहुत कड़वी होती है, इस लिए इसका टेबलेट निगलना ही उचित रहता है. हालाँकि इसकी गोली को पीसकर सेवन करना ही उत्तम है. 

कृमिमुद्गर रस मिलेगा कहाँ? यह ऑनलाइन मिलेगा जिसका लिंक दिया गया है-  Krimimudgar Ras 10 gram‎ 

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