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16 May 2021

ऑक्सीजन लेवल गिरने नहीं देती यह औषधि - 100% गारन्टी

 


आज के समय में अक्सर लोग पूछते रहते हैं कि आयुर्वेद में ऐसी कोई औषधि है जो शरीर में ऑक्सीजन लेवल कम न होने दे? ऑक्सीजन की कमी से हमारे देश में हज़ारों मौतें हो रही हैं और लोग ऑक्सीजन सिलिंडर पाने के लिए कितना परेशान हो रहे हैं यह सब किसी से छुपा नहीं है. 

आयुर्वेदिक ग्रंथों में ऐसे अनेकों योग भरे पड़े हैं जो बड़ी से बड़ी बीमारी में तेज़ी से रिजल्ट देते हैं. ऐसा ही एक योग है 'गोरोचनादि गुलिका' 

गोरोचनादि गुलिका के घटक या कम्पोजीशन - 

यह एक स्वर्ण घटिक औषधि है जो अनेकों जड़ी-बूटियों और भस्मों के संयोग से बनायी जाती है, इसका मुख्य घटक गोरोचन है जिसके कारण ही इसे गोरोचनादि गुलिका का नाम दिया गया है. गुलिका, गुटिका, वटी जैसे नाम आयुर्वेद में गोली या टेबलेट के ही होते हैं. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे यह सब मिले होते हैं - 

गोरोचन, मृगश्रृंग भस्म, रुद्राक्ष, चन्दन, बच, उशीर, कमल, गोश्रृंग,महिषा श्रृंग, नाग भस्म, स्वर्ण भस्म, प्रवाल भस्म, टंकण भस्म, रसौत, कपूर, अम्बर, जीरा, काला जीरा, द्रोणपुष्पि, किरातिक्त, कर्पसा, अपामार्ग, लहसुन, चीराबिल्व, सोंठ, मिर्च, पीपल, अग्निमन्था, ईश्वरी, पाठा, शँखपुष्पि, नीलिनी, हर्रे, बहेड़ा, आँवला, जायफल, सौंफ़ और मोथा प्रत्येक समान भाग लेना होता है. 

निर्माण विधि यह है कि सभी जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण कर भस्मों को मिलाकर अदरक के रस में घोटकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. 

मात्रा और सेवन विधि 

एक से दो-गोली तक सुबह-दोपहर-शाम यानि डेली तीन बार गर्म पानी से, या फिर वैद्य जी के निर्देशानुसार

गोरोचनादि गुलिका के गुण 

आयुर्वेदानुसार यह वात और कफ़ दोष को बैलेंस करता है और पित्त को जागृत करता है.

गोरोचनादि गुलिका के फ़ायदे 

इसके सेवन से पहले दिन से ही ऑक्सीजन लेवल गिरने नहीं देता और कोरोना जैसे तमाम लक्षणों को दूर करने में असरदार है. आज के समय में देश के कई अनुभवी वैद्य इसका प्रयोग कर लोगों की जान बचा रहे हैं. 

बुखार, न्युमोनिया, खांसी, सर्दी, साँस की तकलीफ, अस्थमा, गले का इन्फेक्शन, टोन्सीलाइटिस, कम सुनाई देना, आँखों की रौशनी की कमी, हार्ट की कमजोरी, पाचन शक्ति की कमज़ोरी जैसे रोगों को दूर करने में बेहद असरदार है. 

चूँकि यह अधीक प्रचलित योग नहीं है इसलिए इक्का दुक्का आयुर्वेदिक कम्पनियां ही इसका निर्माण करती हैं, जिसे आप सर्च कर सकते हैं या स्थानीय वैद्य जी से पता कर सकते हैं. 


09 May 2021

Drink daily and boost your Immunity | अपनी इम्युनिटी बढ़ाएं इस काढ़े से

 


पिछले विडियो में मैंने एक काढ़े का ज़िक्र किया था जिसके सेवन से मुझे कोरोना जैसे लक्षणों में काफ़ी लाभ हुआ था. तो आईये जानते हैं इस काढ़े के फ़ायदे और इसमें मिलायी जाने वाली चीजों के गुण के बारे में विस्तार से जानते हैं- 

सबसे पहले एक बार फिर से काढ़ा का Ingredients एक बार फिर से जान लेते हैं -

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काढ़ा बनाने के लिए चाहिए होता है 

लौंग 4 दाना 

इलायची 4 दाना 

दालचीनी - छोटा टुकड़ा 

काली मिर्च 5 दाना 

तेजपात 3 पीस 

तुलसी के पत्ते 7 पीस 

कलोंजी(मंग्रेला) 1/2 स्पून 

अदरक- छोटा टुकड़ा 

हल्दी 1 स्पून 

गुड़ 2 स्पून 

इन सभी को 1 लीटर पानी में उबालकर चाय की तरह पीना है. चाहें तो इसमें आप आधा स्पून चाय पत्ती भी मिला सकते हैं 

इस काढ़ा के फ़ायदे- 

इसे पीने से सर्दी-खाँसी, जुकाम, बुखार, मुँह का स्वाद जाना, स्मेल नहीं आना जैसे लक्षणों में फ़ायदा मिलता है और यह इम्युनिटी पॉवर या रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. इसे पीने से वायरल रोगों से बचाव होता है. 

आईये अब जान लेते हैं इसमें मिलायी गयी चीजों के बारे में आयुर्वेद क्या कहता है, थोड़ा संक्षेप में जान लेते हैं - 

लौंग -

अंग्रेज़ी में इसे क्लोव कहते हैं जबकि आयुर्वेद में इसे लवंग कहा गया है. लौंग के गुणों की बात करें तो यह एंटी वायरल, एंटी सेप्टिक, एंटी-माइक्रोबियल जैसे गुणों से भरपूर होता है. सर्दी-जुकाम, साइनस, दांत दर्द को दूर करता है और पाचन ठीक करने में मदद करता है. 

इलायची -

छोटी इलायची एक बेजोड़ आयुर्वेदिक औषधि है. न सिर्फ इसका सुगन्ध और स्वाद बढ़िया होता है बल्कि गुणों में भी बेजोड़ है. खाँसी, सर्दी-जुकाम, गले की ख़राश, गले की सुजन, गैस, एसिडिटी और साँस की तकलीफ़ में यह असरदार है. यह एन्टी ऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होती है.

दालचीनी - 

दालचीनी ब्लड प्रेशर को नार्मल करती है. सर्दी-जुकाम और एलर्जी को दूर करती है और बचाव भी करती है. आयुर्वेद का प्रसिद्ध योग 'त्रिजात' का यह अभिन्न अंग है. जो लगभग सभी रसायन औषधियों में प्रयोग होती है. 

काली मिर्च-

अंग्रेजी में ब्लैक पीपर, पीपर और लोकल भाषा में गोलकी के नाम से भी जाना जाता है. यह भी आयुर्वेदिक औषधियों की अभिन्न अंग है. सर्दी-खाँसी, जुकाम, सर दर्द दूर करती है. दांत दर्द, पाचन कमजोरी, कोलेस्ट्रॉल, शुगर इत्यादि अनेकों रोगों में इसका सेवन लाभकारी है. इसके गुणों की जितना प्रशंशा की जाये कम है. 

तेजपात -

इसे पत्ता और तीस पत्ता भी कहा जाता है. भारतीय किचन में यह प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है. यह हार्ट को शक्ति देता है. सर्दी, जुकाम, कफ़ को दूर करता है 

तुलसी - 

तुलसी को कौन नहीं जानता? तुलसी की पत्तियां बुखार, सर्दी-जुकाम, ठण्ड लग्न, बलगम आना, खांसी, सर दर्द, साँस की तकलीफ़ जैसी अनेक समस्याओं के लिए बेहद असरदार है. इम्युनिटी बढ़ाने और निरोग रखने में मदद करती है. 

कलौंजी -

कलौंजी को मंग्रेला के नाम से जाना जाता है. यह त्रिदोष नाशक है. काले रंग के यह छोटे-छोटे बीज बड़े-बड़े गुणों से भरपूर होते हैं. यह सर से लेकर पैर तक के सभी रोगों में फ़ायदेमंद है. हदीस में है कि काले रंग के यह छोटे बीज मौत के सिवा हर मर्ज़ को दूर करता है. 

अदरक - 

वात-कफ़ रोगों के लिए अदरक बेजोड़ औषधि है. इसके बिना आयुर्वेद की कोई भी रसायन औषधि नहीं बनती है. सर्दी-जुकाम, कफ़ को दूर करने में बेजोड़ है. कब्ज़, गैस, कोलेस्ट्रॉल, गठिया, वातरोग जैसे अनेकों रोगों में असरदार है. 

हल्दी - 

पीले रंग की यह जड़ी गुणों का भण्डार है. यह नेचुरल एन्टी बायोटिक की तरह काम करती है वह भी बिना साइड इफ़ेक्ट के. स्किन से लेकर लिवर, सर्दी-जुकाम से लेकर कैंसर जैसी बीमारी में भी असरदार है. एंटी ऑक्सीडेंट है, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है. 

गुड़ - 

स्वाद में मीठापन लिए हुआ यह पदार्थ हमारे हेल्थ के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद है. जुकाम और खाँसी को दूर करता है. कब्ज़, गैस, पाचन शक्ति की कमज़ोरी, खून की कमी जैसे अनेकों रोगों में इसके सेवन से लाभ होता है. 

तो दोस्तों, अब आप समझ सकते हैं कि इतनी सारी चीज़ों को मिलाकर बनाने के बाद यह काढ़ा कितना असरदार हो जाता है. यह एक ऐसा कॉम्बिनेशन है जिसका मुकाबला दूसरा कोई भी काढ़ा नहीं कर सकता. 

आज के समय के लिए यह सबसे उपयुक्त है. सभी लोगों को इसका सेवन कर लाभ उठाना चाहिए. 

पित्तज प्रकृति के लोग या जिनको एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी जैसी समस्या हो तो कम मात्रा में ही इसका सेवन करें. 

और बहुत ज़्यादा भी इसका यूज़ न करें कि पेट गर्म हो जाये. हर चीज़ को अपनी बॉडी के अनुसार ही लेना चाहिए. कोई भी चीज़ कितनी भी अच्छी क्यों न हो, बहुत ज़्यादा यूज़ करना ठीक नहीं होता.

कहा भी गया है - अति सर्वर्त्र वर्जयेत




06 May 2021

My Personal Experience | तेज़ बुखार, खाँसी, सर्दी, मुँह का स्वाद जाना, स्मेल नहीं आना से मुक्ति

 इस विडियो में मैं आपको बताने वाला हूँ कि मुझे कोरोना जैसे लक्षण होने पर कौन सी औषधि सेवन करने से मुक्ति मिली है - 


जय हिन्द, जय आयुर्वेद !


01 February 2021

Berberis Aristata | दारुहल्दी क्या है रसौत क्या है?

 

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दारूहल्दी के बारे में आपने सुना होगा, बहुत सारी आयुर्वेदिक औषधियों के कम्पोजीशन में इसका ज़िक्र होता है. दारुहल्दी दारू या शराब है या हल्दी? कई लोग ग़लतफहमी में इसे कुछ और समझ बैठते हैं, तो आईये इसके बारे में सारी चीज़ें क्लियर कर देता हूँ - 

दारुहल्दी नाम की जो औषधि है वह न तो दारु है और न ही हल्दी. कई जगह शराब को भी दारु कहा जाता है. 

दारुहल्दी को संस्कृत में दारूहरिद्रा कहा जाता है. यहाँ दारु का अर्थ है 'लकड़ी' और हरिद्रा मतलब हल्दी 

तो इस तरह से दारूहल्दी का अर्थ निकलता है हल्दी के जैसी पीले रँग की लकड़ी. यह बिलकुल पीले रंग की होती है, देखते पर ऐसा लगता है कि पीले रंग से रंगा गया हो. 

आईये अब भाषा भेद से इसका नाम जानते हैं - 

संस्कृत में - दारूहरिद्रा, दार्वी, कंटकटेरी और पंचपचा भी कहा जाता है

हिंदी में - दारुहल्दी 

गुजराती में - दारुहलदर 

मराठी में - दारूहलद 

बंगाली में - दारूहरिद्रा 

पंजाबी में - दारहल्दी 

तमिल में - मरमंजल 

तेलगु में - कस्तूरीपुष्प 

फ़ारसी में- दारचोबा 

अंग्रेजी  में - इण्डियन बर्बेरी(Indian Barberry)

लैटिन में - बर्बेरिस एरिस्टेटा(Berberis Aristata) कहते हैं.

होम्योपैथिक दवा बर्बेरिस इसी से बनायी जाती है. 

आयुर्वेद में मूल रूप से इसकी लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है. 



आयुर्वेदानुसार यह कफपित्त शामक है यानी कफ़ दोष और पित्त दोष का शमन करती है. कामला, यकृत के रोग यानी लिवर की सभी बीमारियाँ, प्रमेह, व्रण या ज़ख्म और रक्तदोष से होने वाले रोग और नेत्र रोगों में यह लाभकारी है. 

रसौत क्या है? 

यह दारूहल्दी से बनाया जाता है. इसे रसौत, रसवत, रसांजन जैसे नामों से भी जाना जाता है. यह असल दारूहल्दी का ही कंसंट्रेशन है. 



रसौत कैसे बनाया जाता है?

रसौत या रसांजन बनाने के लिए दारूहल्दी के छोटे छोटे बारीक टुकड़े कर इसके वज़न का 16 गुना पानी मिलाकर क्वाथ बनाया जाता है. जब एक चौथाई पानी शेष रहे तो छानकर दुबारा हलवे की तरह गाढ़ा होने तक उबाला जाता है,इसके बाद धुप में सुखा लिया जाता है. यही रसौत या रसांजन है.

इसे अनेकों औषधियों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है. यूनानी में भी रसौत का बहुत प्रयोग होता है. 


17 January 2021

Navratna Kalpamrit Ras | नवरत्नकल्पामृत रस के गुण और उपयोग

 

navratna kalapamrit ras benefits

नवरत्नकल्पामृत रस जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है नवरत्नों से बनी अमृत के समान कल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली रसायन औषधि. 

नवरत्नकल्पामृत रस के घटक या कम्पोजीशन - 

इसके घटक या कम्पोजीशन की बात करें तो इसमें नौ प्रकार के रत्न या नवरत्नों के अतिरिक्त स्वर्ण भस्म जैसे दुसरे जैसे कई मूल्यवान भस्मों के संयोग से बनाया जाता है. 

रस तंत्र सार में इसके घटक कुछ इस तरह से हैं - 

पन्ना पिष्टी, पुखराज पिष्टी, नीलम पिष्टी, माणिक्य पिष्टी, वैडूर्य पिष्टी, गोमेदमणि पिष्टी और मुक्ता पिष्टी प्रत्येक एक-एक तोला, रजत भस्म, प्रवाल पिष्टी और रजावर्त पिष्टी प्रत्येक दो-दो तोला, स्वर्ण भस्म, लौह भस्म, यशद भस्म और अभ्रक भस्म प्रत्येक 6-6 माशा, शुद्ध गुग्गुल, शुद्ध शिलाजीत और गुडूचीघन प्रत्येक 11-11 तोला, गाय का घी आवश्यकतानुसार

नवरत्नकल्पामृत रस निर्माण विधि 

सबसे पहले सभी भस्मो और पिष्टी को मिक्स कर खरल कर गुग्गुल, शिलाजीत और गुडूचीघन मिक्स कर थोड़ा-थोड़ा घी मिलाते हुए कूटें, इसके बाद एक-एक रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लिया जाता है. यही नवरत्नकल्पामृत रस की निर्माण विधि है. वैसे यह बना हुआ उपलब्ध है जिसका लिंक दिया गया है. 

नवरत्नकल्पामृत रस की मात्रा और सेवन विधि 

एक से दो गोली तक सुबह-शाम दूध या रोगानुसार उचित अनुपान से वैद्य जी के निर्देशानुसार सेवन करना चाहिए

नवरत्नकल्पामृत रस के गुण 

यह त्रिदोष नाशक है, पर मेनली वात और पित्त दोष को बैलेंस करता है यानी, वातहर, पित्त नाशक, हेमाटेमिक, दिल और दिमाग को पुष्टि देने वाला, रस, रक्तादि सभी धातुओं को पुष्ट बनाता है.

नवरत्नकल्पामृत रस के फ़ायदे 

वैसे तो यह अनेको रोगों में असरदार है, यहाँ पर इसके कुछ मेन फ़ायदे बता रहा हूँ - 

यह नेचुरल कैल्शियम से भरपूर है तो यह हड्डी की कमज़ोरी और इसकी वजह से होने वाले सभी रोगों में बेहद असरदार है. 

यह शरीर के सभी धातुओं की पुष्टि कर शरीर को निरोग बनाने में सहायता करता है. 

जीर्ण वात रोगों में धैर्यपूर्वक इसका सेवन करने से लाभ होता है.

महिला, पुरुष, बच्चे-बुज़ुर्ग सभी के लिए यह लाभकारी है. 

नस, किडनी, हार्ट, ब्रेन, स्किन, लंग्स इत्यादि सर से लेकर पैर तक यानि पूरी बॉडी के सभी Organs को शक्ति देता है. 

आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार यह अर्श, प्रमेह, क्षय, जीर्ण ज्वर, स्वास-कास, मूत्र रोग, वातरोग, पांडू, कन्ठमाला, अबुर्द या हर तरह का सिस्ट और ट्यूमर, आलस्य, विष, आम विष और गैस इत्यादि रोगों में लाभकारी है.

कल्प के रूप में रोगानुसार उचित अनुपान से एक साल तक सेवन कराया जाता है. 

यह पूरी तरह से सुरक्षित औषधि है, किसी तरह का कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता है लॉन्ग टाइम तक यूज़ करने पर भी. 

होम्योपैथिक और एलोपैथीक दवा लेते हुए भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं कुछ समय के अंतर से. 

उंझा के 60 गोली की क़ीमत है 522 रुपया जिसे आप ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं www.lakhaipur.in से, लिंक दिया गया है-  Buy Now





06 December 2020

जानिए कौन सा आहार खाने से कौन सा दोष कम होगा या बढ़ेगा?

 

dosha aur aahar

दोस्तों, स्वस्थ रहने के लिए उचित आहार-विहार का बड़ा महत्त्व है. एक कहावत भी है - "जैसा खाए अन्न, वैसा रहे मन" 

स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेद के अनुसार आपके भोजन में छह 'रस' होने चाहिए, तभी यह संतुलित भोजन कहलाता है. रस का यहाँ मतलब है स्वाद से. आयुर्वेद के अनुसार दुनिया में जितने भी तरह के आहार और औषधि हैं इसी छह रस में सभी आ जाते हैं. 

अब आप सोच रहे होंगे कि यह छह रस कौन कौन हैं? यह छह रस हैं- 

1) मधुर(मीठा)

2) अम्ल(खट्टा)

3) लवण(नमक या नमकीन)

4) कटु(कड़वा)

5) तिक्त(तीता, तीखा)

6) कषाय(कसैला) 

यही छह रस हैं और इनमे से तीन शीतल यानी तासीर में ठण्डे और तीन उष्ण यानी तासीर में गर्म होते हैं. 

ठण्डे तासीर वाले - मधुर, तिक्त और कषाय 

गर्म तासीर वाले - कटु, अम्ल और लवण 

अब आते हैं मुद्दे की बात पर कि किसी तरह के आहार कौन से दोष को बढ़ाते या कम करते हैं?

सबसे पहले जानते हैं 'वात' कम करने और संतुलन या बैलेंस करने वाले आहार के बारे में.

वात संशमन और संतुलन करने वाले अनाज 

ज्वार, मक्का, जौ, राई, सरसों, हर तरह की दाल, चना इत्यादि इनका सेवन कम मात्रा में करना चाहिए जबकि गेंहूँ, चावल, मूँग की दाल का अधीक सेवन कर सकते हैं. 

वात संशमन और संतुलन करने वाले फल 

चीकू, मीठे बेर, लीची, सेब, अन्नानास, तरबूज, अंजीर, अँगूर, पपीता, अमरुद, बादाम, आलूबुखारा इत्यादि अधीक सेवन कर सकते हैं जबकि ड्राई फ्रूट्स, नाशपाती, आम इत्यादि कम मात्रा में सेवन करना चाहिए

वात संशमन और संतुलन करने वाली सब्जियां 

लौकी, टिंडा, टमाटर, शलजम, भिन्डी, चुकन्दर, गाजर, खीरा इत्यादि. जबकि फूल गोभी, पत्ता गोभी, आलू, सेम, मटर, अंकुरित अनाज, मिर्च-मसाला और मुली का कम से कम सेवन करना चाहिए 

तेल में - तिल तेल, बादाम का तेल, सोयाबीन तेल का सेवन ठीक रहता है. 

यह सब हो गया विस्तार से, आईये अब जान लेते हैं 'वात प्रकोप' बढ़ाने वाले आहार जिसे हमेशा याद रखें, विशेषकर वात प्रक्रति वाले लोग - 

वात प्रकोपक(असंतुलक) आहार - 

भारी भोजन, गरिष्ठ भोजन, फ़ास्ट फ़ूड, जंक फ़ूड, सॉफ्ट ड्रिंक्स, कोल्ड ड्रिंक्स, चटपटा भोजन, हर तरह की मिर्च, रुखा-सुखा भोजन, चना, ज्वर, मूँग, कोदो, पलक, मसूर, चना, तीखा, कषैला, कड़वा और उत्तेजक भोजन इत्यादि. 

पित्त का शमन और संतुलन(Balance) करने वाले आहार 

ठण्डी तासीर वाले सभी आहार पित्त को कम करते हैं. यहाँ पर ध्यान रखें आहार तासीर में ठण्डा होना चाहिए, फ्रिज का आइटम, कोल्ड ड्रिंक्स या आइस क्रीम ठण्डे तो होते हैं पर मूल रूप से इनकी तासीर ठण्डी नहीं होती. 

पित्त कम करने वाले आहार की बात करें तो इसमें देसी गेहूं, पुराना चावल, नारियल, सेब, अंजीर, मीठे अंगूर, किशमिश, तरबूजा, खरबूजा, केला, पपीता, पत्ता गोभी, साग, चुकंदर, परवल, लौकी, तोरई, टिंडा इत्यादि प्रमुख हैं. 

तेल में नारियल तेल, जैतून तेल, सूरजमुखी तेल का सेवन करना चाहिए.

ताज़ा, छाछ, मीठा ठण्डा दूध भी पित्त शामक है. 


अब जान लीजिये पित्त प्रकोपक या पित्त दोष बढ़ाने वाले प्रमुख आहार - 

जिनका पित्त दोष बढ़ा हुआ हो उनको इन चीज़ों से परहेज़ रखना चाहिए जैसे - गर्म और उत्तेजक आहार, अंडा, मछली, नॉन वेज, चाय-काफ़ी, तम्बाकू, शराब, सिगरेट, खट्टा, कड़वा, अधीक नमकीन और तेल वाले भोजन इत्यादि.


कफ का शमन और संतुलन(Balance) करने वाले आहार 

कफ दोष बढ़ा होने पर गर्म तासीर वाले भोजन, गर्म पानी, हल्का, रुखा-सुखा आहार लेना चाहिए. 

कफ को कम और बैलेंस करने वाले आहार यह सब हैं जैसे - जौ, बाजरा, मकई, चना की रोटी, सरसों, फलों में - सेब, नाशपाती, अनार, सब्जियों में - गाजर, गोभी, लहसुन, प्याज़, पत्तेदार सब्जी, पलक, बथुआ, मेथी इत्यादि. 

कफ दोष बढ़ा होने पर दूध और दूध से बने पदार्थ बहुत कम लेना चाहिए. मिठाई का भी सेवन न करें. मसलों में - दालचीनी, मेथी, सोंठ, पीपल, हल्दी, काली मिर्च इत्यादि का सेवन करना चाहिए. 

ठण्डा, खट्टा, मीठा, नमकीन और लुआबदार पदार्थ कफ प्रकोप को बढ़ाते हैं. 


तो दोस्तों, यह थी जानकारी आहार के बारे में कि कौन से दोष में कौन सा आहार खाना चाहिए या परहेज़ करना चाहिए. 

पर एक बात ज़रूर याद रखिये कि आपका डॉक्टर या वैद्य आपकी बीमारी के बारे में बेहतर जनता है, इसलिए वैद्य जी की सलाह के अनुसार परहेज़ अवश्य करें. 



22 November 2020

Know Your Prakriti | जानिए अपनी प्रकृति को | Tridosha Quiz

 

tridosha quiz

आज चर्चा करने वाला हूँ प्रकृति के बारे में. कफ़, पित्त और वात के बारे में आपने सुना ही होगा. तो आईये जानते हैं कि प्रकृति क्या है? प्रकृति के भेद, प्रकृति की पहचान, इनका स्थान और इसके बारे में सबकुछ विस्तार से - 

शरीर की प्रकृति को Constitution of Body कह सकते हैं. प्रकृति को ही 'तासीर' भी कहा जाता है. 

वात से अस्सी, पित्त से चालीस और कफ से बीस तरह के रोग होते हैं

कफ दोष- शरीर की सरंचना को नियंत्रित और प्रभावित करता है

पित्त दोष - पाचन क्रिया को नियंत्रित और प्रभावित करता है

वात दोष - गति को नियंत्रित और प्रभावित करता है

हमारे आयुर्वेद के मनीषियों ने बहुत पहले ही  बता दिया था गर्भ काल से ही दोषों की प्रकृति मनुष्य पर असर करने लगती है. यह सब कई मॉडर्न रिसर्च से भी साबित हो चूका है



कफ़, पित्त और वात यह तीन तरह की मुख्य प्रकृति होती है पर इसके भी कुछ भेद होते हैं. आचार्य चरक के अनुसार कुल सात प्रकृतियों के शरीर होते हैं.

1) कफ प्रकृति

2) पित्त प्रकृति 

3) वात प्रकृति 

4) वातपित्त प्रकृति 

5) वातकफ प्रकृति 

6) पित्तकफ प्रकृति 

7) वातपित्तकफ प्रकृति या मिश्रित प्रकृति, इसकी को 'सम' प्रकृति भी कहा जाता है.



कफ प्रकृति 

कफ- जल और पृथ्वी का प्रतिनिधि है 

कफ का स्थान 

उरः प्रदेश यानी चेस्ट या सिने के पूरा एरिया, कन्ठ, नासिका, बाहू, आमाशय, छोटे बड़े जॉइंट्स, ग्रीवा, मेद यह सब कफ के स्थान होते हैं.

कफ प्रकृति के गुण -कफ को श्लेष्मा भी कहते हैं यह चिकना, मुलायम, गाढ़ा, स्वाद में मीठा, शीतल यानी ठण्डा और लुआबदार होता है. 

कफ प्रकृति वाले व्यक्ति का चेहरा गोल-मटोल, शरीर गठीला और पुष्ट होता है.

कफ प्रकृति वाले लोग कोई भी काम जल्दबाज़ी में नहीं करते हैं, Slow Activity के होते हैं. मोटापे की प्रवृति होती है, शहनशील होते हैं. 

इनकी चाल धीमी होती है, नीन्द गहरी आती है, शरीर माँसल होता है. कोई निर्णय सोच-समझ का लेते हैं. 

कफ प्रकृति के मनुष्य शांत, सुखी, ओजस्वी, गंभीर और दीर्घायु होते हैं



पित्त प्रकृति 

पित्त - अग्नि और जल का प्रतिनिधि है 

पित्त का स्थान- पित्त का प्रधान स्थान पक्वाशय या आंत और आमाशय की मध्यस्थली(ग्रहणी) है. लिवर-स्प्लीन, हार्ट, स्किन और दृष्टि में भी पित्त का स्थान है. आचार्य चरक के अनुसार रस, रक्त, लसिका, स्वेद और आमाशय पित्त का स्थान है.

पित्त का मूल गुण उष्ण या गर्म होता है. 

पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति मयाने क़द के न लम्बे न बौने, न मोटे न दुबले होते हैं.

शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति मध्यम होती है और मेहनती होते हैं

पित्त प्रकृति वालों में गुस्सा जल्दी होना, चिड़चिड़ापन, गर्मी बर्दाश्त नहीं होना, तेज़ भूख लगना, गर्म चीज़ सूट नहीं करना जैसे लक्षण होते हैं.

टाइम के पाबन्द, तेज़ चाल, चैलेंज एक्सेप्ट करने वाले और कंसंट्रेशन वाले होते हैं. 

सात्विक आहार इनको पसन्द होता है. चाय-काफ़ी, नशा और गर्म तासीर वाले भोजन इनको सूट नहीं करते. 

पित्त प्रकृति के लोगों की पाचन शक्ति तेज़ होती है, गर्मी बहुत लगती है और पसीना भी जल्दी आता है. 



वात प्रकृति 

वात का स्थान 

पक्वाशय ही वात या वायु का विशेष स्थान है. अस्थि या हड्डी, पैर की हड्डी और त्वचा में यह विधमान होता है.

वात- आकाश और वायु का प्रतिनिधि है 

वात प्रकृति के गुण - यह रुखा, ठण्डा, लघु जैसे गुणों वाला होता है. 

वात प्रकृति के व्यक्ति का शरीर हल्का, दुबले क़द-काठी वाला होता है, इनकी आवाज़ कमज़ोर और फटी हुयी होती है, कोई भी काम तेज़ी से करते हैं, नीन्द कम आती है, गहरी नींद नहीं आती.

भूख और पाचन शक्ति अनियमित होती है, कब्ज़, चिंता, तनाव जैसी समस्या हो सकती है. 

वात प्रकृति वाले ज़्यादा बात करने वाले, चिन्ता करने वाले, तिल को ताड़ बनाने वाले और किसी बात पर क़ायम नहीं रहने वाले होते हैं.

वात प्रकृति वालों को अवर बल वाला कहा गया है.

वात पित्त प्रकृति 

वात पित्त प्रकृति के व्यक्ति में गर्मी सहन करने की थोड़ी क्षमता होती है. बुद्धि तेज़ होती है, कोई भी चैलेंज एक्सेप्ट करने से पहले थोड़ा घबराते हैं परन्तु पीछे नहीं हटते. संवेदनशीलता, धैर्य की कमी और तनाव जैसे लक्षण इनमे पाए जाते हैं. 

पित्त कफ़ प्रकृति 

इनका शरीर भारी पर सुडौल होता है. चाल और बुद्धि तेज़, गुस्सा और Criticize करने की आदत होती है.

वात कफ प्रकृति 

ऐसे व्यक्ति संवेदनशील, शांत, सुगठित शरीर वाले और शान्ति प्रिय होते हैं. पाचन मन्द होता है और ठण्डा आहार-विहार इनको सूट नहीं करता है. 

सम प्रकृति या त्रिदोष प्रकृति 

ऐसे प्रकृति वालों का तीनो दोष यानी कफ, पित्त और वात बैलेंस होता है. ऐसी व्यक्ति हर तरह से फिट और स्वस्थ होते हैं और लम्बा जीवन जीते हैं. 

तो यह थी प्रकृति के बारे में संक्षेप में जानकारी, चूँकि यह एक लम्बा विषय है इसपर घन्टों चर्चा की जाये तो भी कम पड़ेगा. 

आप किस प्रकृति के हैं आसानी से जानने के लिए आप 'प्रकृति निर्धारक प्रश्नोत्तरी' या क्विज में हिस्सा लेकर जान सकते हैं जिसका लिंक दिया गया है - प्रकृति निर्धारक प्रश्नोत्तरी 



20 November 2020

Bilwadi Lehya Benefits | बिल्वादि लेह्य/बिल्वाअवलेह के फ़ायदे

 

bilwadi lehya

बिल्वादि लेह्य को बिल्वा अवलेह, बिल्वादि लेह्यम जैसे नामों से जाना जाता है जिसका विवरण 'सहस्र योग'  में मिलता है जिसका मुख्य घटक बिल्व फल मज्जा का कच्चा बेल का गूदा होता है. 

बिल्वादि लेह्य के घटक या कम्पोजीशन 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बिल्व फल क्वाथ, गुड़, नागरमोथा, धनियाँ, जीरा, छोटी इलायची, दालचीनी, नागकेशर और त्रिकटु यानि सोंठ, मिर्च और पीपल के मिश्रण से अवलेह-पाक निर्माण विधि से बनाया जाता है. 

बिल्वादि लेह्य की मात्रा और सेवन विधि 

5 से 10 ग्राम रोज़ दो-तीन बार या वैद्य जी के निर्देशानुसार 

बिल्वादि लेह्य के फ़ायदे 

उल्टी, दस्त, पेचिश, अरुचि, ग्रहणी या IBS, आँव आना जैसी समस्या होने पर इसका सेवन किया जाता है. 

खाना खाते ही दस्त होना और बार-बार दस्त होने में सही डोज़ में इसका सेवन करना चाहिए.

खाँसी और अस्थमा में भी इस से लाभ होता है. 

चूँकि यह मल बाँधने वाली ग्राही औषधि है तो अधीक मात्रा में सेवन करने से कब्ज़ हो सकता है, इसका ध्यान रखना चाहिए. 

बच्चे-बड़े सभी को इसका सेवन करा सकते हैं, बस इसका डोज़ उम्र के हिसाब से होना चाहिए. 

ऑनलाइन ख़रीदने का लिंक दिया गया है- Dabur Bilwadi Lehya