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27 नवंबर 2022

Suran Vati | सूरणबटक/ सूरण वटी के फ़ायदे

 

suran vatak ke fayde

सूरणबटक जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है सूरण कन्द इसका एक घटक होने से इसका नाम सूरणबटक रखा गया है. सूरण को ही ओल और यम जैसे नामों से जाना जाता है.

सूरणबटक के घटक द्रव्य 

यह आयुर्वेदिक ग्रन्थ शारंगधर संहिता का योग है, इसे बनाने के लिए चाहिए होता है 

सूरण कन्द और विधारा बीज प्रत्येक 16 भाग, स्याह मूसली, चित्रकमूल-छाल प्रत्येक 8 भाग, हर्रे, बहेड़ा, आमला, वायविडंग, सोंठ, पीपल, शुद्ध भिलावा, पीपलामूल और तालिशपत्र प्रत्येक 4-4 भाग, काली मिर्च, दालचीनी और छोटी इलायची प्रत्येक 2 भाग, गुड़ सभी जड़ी-बूटियों के वज़न के बराबर.

सूरणबटक निर्माण विधि 

सभी जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण बनाने के बाद गुड़ की चाशनी बनाकर मिक्स कर अच्छी तरह से कुटाई करने के बाद 500 मिलीग्राम की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लिया जाता है. यही सूरणबटक कहलाता है. 

सूरणबटक की मात्रा और सेवन विधि 

दो से चार गोली तक सुबह-शाम गर्म दूध या गर्म पानी से लेना चाहिए 

सूरणबटक के फ़ायदे 

जैसा की शुरू में ही कहा हूँ बवासीर की पॉपुलर मेडिसिन है. यह जठराग्नि को तेज़ कर पाचन को सुधारती है. 

बवासीर-भगन्दर इत्यादि को दूर कर शरीर को शक्ति देती है. 

मूल ग्रन्थ के अनुसार श्वास, कास, क्षय रोग, हिचकी, प्रमेह, प्लीहा इत्यादि रोगों में भी यह असरदार है. 

स्थानीय वैद्य जी की सलाह से ही इसका सेवन करें. 





20 सितंबर 2022

लम्पी वायरस की आयुर्वेदिक औषधि और उपचार | Ayurvedic Medicine for Lumpy Virus

 

lumpy virus ayurvedic treatment

जैसा कि आप सभी जानते हैं आज के समय लम्पी वायरस के हज़ारों पशुओं की मौत हो रही है. तो आज के विडियो में मैं लम्पी वायरस के लिए सफल आयुर्वेदिक उपचार के बारे में बताने वाला हूँ, तो आईये इसके बारे में सबकुछ विस्तार से जानते हैं. 

लम्पी वायरस क्या है? और इसके क्या लक्षण हैं?

यह एक स्किन डिजीज है जो केप्रीपॉक्स वायरस के कारन होती है. इसके कारन गाय और भैंस के शरीर पर मोटी-मोटी गाँठ होने लगती है. इस से संक्रमित होने पर मवेशी को हल्का बुखार, शरीर पर मोटे-मोटे दाने होना, गिल्टी होना और फिर इसका ज़ख्म में बदल जाना, नाक बहना, मुंह से लार गिरना और दुधारू मवेशी में दूध की कमी होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. 


चूँकि यह एक संक्रामक रोग है तो पीड़ित पशु को अलग सैनीटाइज़ जगह पर रखना चाहिए ताकि दुसरे मवेशियों में इसका संक्रमण न फैले. फिटकरी के पानी और नीम के पानी से धो सकते हैं, बुखार के लक्षण हों तो नहाना नहीं चाहिए और बारिश के पानी से भी बचाना चाहिए, और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए धुनी जलाना चाहिए. 

धुनी जलाने के लिए आपको यह चीज़ें चाहिए होंगी - 

हल्दी, नीम की पत्ती, सरसों दाना और अजवायन

इसे पुराने जुट के बोरे में जलाकर धुवाँ देना चाहिए, इस से काफ़ी लाभ होता है और संक्रमण भी नहीं फैलता है. 

जैसा कि आप सभी जानते हैं इस बीमारी में पशुओं के शरीर पर गिल्टियाँ होकर पक कर फूटने लगती हैं तो इसके लिए लगाने के लिए इस तरह से आयुर्वेदिक मलहम बनायें- 

इसे बनाने के लिए आपको चाहिए होगा 

सोना गेरू, मेहँदी पाउडर और गाय का घी मिक्स कर ज़ख्म की ड्रेसिंग कर लगाना चाहिए. 

अब बात खाने वाली आयुर्वेदिक दवा की - 

जैसे ही आप के मवेशी में लम्पी वायरस के लक्षण दिखें तो उसे सबसे पहले दुसरे मवेशियों से अलग-थलग कर यह उपचार दें - 

हल्दी पाउडर 50 ग्राम 

पार्ले जी बिस्कुट 100 ग्राम 

पेरासिटामोल 2 ग्राम(500mg की चार टेबलेट) लेकर आधा लीटर पानी में घोलकर रोज़ दो से तीन बार तक पिलायें

आईये अब जानते हैं लम्पी वायरस की आयुर्वेदिक औषधि, जिसे एक अनुभवी वैद्य जी द्वारा बताया गया है - 

इसके लिए यह सब जड़ी-बूटियाँ चाहिए होंगी - 

हल्दी, सोंठ,अजवायन, बबूल छाल, कुटकी, चोपचीनी, शिरिस, धमासा, लोध्र पठानी, अकोल, बकायन, अमलतास, अर्जुन छाल, गूलर की छाल, असगन्ध और मूर्वा प्रत्येक 50-50 ग्राम 

वासा, अपामार्ग, खैर, इन्द्रजौ, सरपुंखा, इन्द्रायण, मकोय, कांचनार, नीम छाल, शीशम छाल, गिलोय, काकजंघा, भृंगराज, विधारा, सहजन, एरण्डमूल, पाषाणभेद, रास्ना, चिरायता, त्रिफला और गोक्षुर प्रत्येक 100-100 ग्राम लेकर चूर्ण बना लें. 

मात्रा और सेवन विधि -

व्यस्क मवेशी को 50 ग्राम की मात्रा में रोज़ दो से तीन बार तक गुनगुने पानी में घोलकर पीलाना चाहिय. कम उम्र के मवेशी को आधी मात्रा में दें. 

लम्पी वायरस की सभी अवस्थाओं में लाभकारी है. सभी जड़ी-बूटियाँ पंसारी की दुकान से मिल जाएँगी, अपने मवेशी को बचाने के लिए थोड़ी सी मेहनत से इसका निर्माण कर सकते हैं. 

मवेशी को खाने के लिए हरा ताज़ा चारा, निर्गुन्डी के पत्ते, मकोय पंचांग, सहजन के पत्ते, पुनर्नवा के पत्ते, परवल के पत्ते, पीपल के पत्ते इत्यादि देना चाहिए. संक्रमित मवेशी का दूध मनुष्य को सेवन नहीं करना ही उत्तम है.




24 जुलाई 2022

Phalarishta Benefits | फलारिष्ट के फ़ायदे

phalarishta benefits

आज की जानकारी है आयुर्वेदिक है फलारिष्ट के बारे में. यह मलेरिया, जौंडिस, पाचन की कमजोरी, बवासीर, हृदय रोग, कब्ज़, ग्रहणी और खून की कमी इत्यादि रोगों में प्रयोग की जाती है.

तो आईये जानते हैं फलारिष्ट का कम्पोजीशन, गुण-उपयोग और फ़ायदों के बारे में सबकुछ विस्तार से - 

सबसे पहले जानते हैं फलारिष्ट के घटक या कम्पोजीशन 

यह आयुर्वेदिक ग्रन्थ 'चरक संहिता' का योग है 

इसे बनाने के लिए चाहिए होता है बड़ी हर्रे और आँवला प्रत्येक 64 तोला, इन्द्रायण के फल, कैथ का गूदा, पाठा और चित्रकमूल प्रत्येक 8-8 तोला लेकर मोटा-मोटा कूटकर 25 लीटर पानी में क्वाथ बनायें, जब 6 लीटर काढ़ा बचे तो ठण्डा होने पर छानकर उसमे 5 किलो गुड़ और 8 तोला धाय के फूल मिलाकर चिकने बर्तन में 15 दिन के लिए सन्धान क्रिया के लिय रख दिया जाता है. इसके बाद छानकर बोतलों में भर लिया जाता है. यही फलारिष्ट कहलाता है. 

फलारिष्ट की मात्रा और सेवन विधि 

15 से 30 ML तक भोजन के बाद समान भाग जल मिलाकर लेना चाहिए

फलारिष्ट के गुण 

यह दीपन-पाचन, बलवर्द्धक और पुष्टिकारक है. 

फलारिष्ट के फ़ायदे 

मूल ग्रन्थ के अनुसार इसके सेवन से ग्रहणी, अर्श, पांडू, प्लीहा, कामला, विषम ज्वर, वायु तथा मल-मूत्र का अवरोध, अग्निमान्ध, खाँसी, गुल्म और उदावर्त जैसे रोगों को नष्ट करता है और जठराग्नि को प्रदीप्त करता है. 

आसान शब्दों में कहा जाये तो इसके सेवन से क़ब्ज़ दूर होती है और बवासीर में लाभ होता है.

इसके सेवन से पेशाब साफ़ होता है, पेशाब खुलकर होता है इसके मूत्रल गुणों के कारन.

पाचन शक्ति को ठीक करता है, भूख लगती है और इसके सेवन से हाजमा दुरुस्त हो जाता है.

स्प्लीन का बढ़ जाना, जौंडिस, पीलिया, कामला इत्यादि में लाभकारी है.

धड़कन, घबराहट, दिल की कमज़ोरी जैसे हार्ट की प्रॉब्लम में भी फ़ायदा होता है. 

मलेरिया बुखार को दूर करने में भी सहायक है. 


बलारिष्ट के फ़ायदे 




14 जुलाई 2022

इन बर्तनों में भोजन करने के फ़ायदे और नुकसान

mitti ke bartan ke fayde

क्या आपके घर में एल्युमीनियम के बर्तन में खाना पकाया जाता है?

क्या आप एल्युमीनियम या फाइबर के बर्तन में भोजन करते हैं?

यदि हाँ तो आज की जानकारी आप सभी के लिए बहुत ज़रूरी है, क्यूंकि आज मैं बात करने वाला हूँ कि किस चीज़ के बर्तन में भोजन करने या फिर खाना पकाने से क्या-क्या नुकसान और फ़ायदे हैं. तो आइये सबकुछ विस्तार से जानते हैं - 

बर्तनों का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है, इसके बिना जीवन की कल्पना बड़ी ही मुश्किल है. 

धातु की बर्तनों के इस्तेमाल से होने वाले फ़ायदे और नुकसान की बात करूँगा पर उस से पहले प्लास्टिक और फाइबर के बर्तन के बारे में जानते हैं. 

प्लास्टिक आज हमारे जीवन में हमारी लाइफ स्टाइल में इस क़दर शामिल हो गया है कि इस से छुटकारा पाना असम्भव तो नहीं पर मुश्किल ज़रूर है. 

चाय के कप से लेकर टिफ़िन बॉक्स तक हर जगह प्लास्टिक हमारे जीवन इतना घुसा हुआ है कि अब तो खून में भी प्लास्टिक के पार्टिकल्स पाए जा रहे हैं. मॉडर्न रिसर्च से ब्लड टेस्ट में यह साबित हो चूका है, क्यूंकि जाने-अनजाने में हम प्लास्टिक भी खा रहे हैं. 

प्लास्टिक और फाइबर के किसी भी तरह के बर्तन में भोजन करने से कैंसर जैसे मारक रोग होते हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. 

पहले के समय में हमारे घरों में सिर्फ लोहा, पीतल, ताम्बा के बर्तन ही यूज़ होते थे. मिट्टी के बर्तन तो प्राचीन काल से प्रयोग होते रहे हैं. इनके बाद आया एल्युमीनियम, इसके बाद स्टेनलेस स्टील और अब प्लाटिक फाइबर वाला युग है. आईये जानते हैं कि किस बर्तन में भोजन करने या पकाने से क्या फ़ायदे और क्या नुकसान हैं- 

मिट्टी के बर्तन 

मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने से ज़रूरी पोषक तत्व मिलते हैं जिस से बीमारी दूर रहती है. मॉडर्न साइंस से भी यह साबित हो गया है कि मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने और खाने से कई सारी बीमारियाँ दूर होती है. आयुर्वेद में भी मिट्टी के बर्तन का प्रयोग करने का निर्देश है क्यूंकि इसमें बने भोजन के पोषक तत्व शत प्रतिशत सुरक्षित रहते हैं और इसमें बने भोजन का स्वाद भी अच्छा होता है. कुल्हड़ की चाय और डिस्पोजेबल प्लास्टिक के कप की चाय के स्वाद का अन्तर तो आप बहुत अच्छे से जानते हैं. मिट्टी के बर्तन में आपको फ़ायदा और स्वाद दोनों मिलेगा. नुकसान जीरो, मतलब कोई भी नुकसान नहीं. 

लोहे के बर्तन 

लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति बढ़ती है और शरीर से लोहा या आयरन की कमी नहीं होने पाती है. खून की कमी, जौंडिस, सुजन और शरीर का पीलापन इत्यादि रोग दूर होते हैं.

ध्यान रहे, लोहे के बर्तन में खाना पकाने से यह लाभ होते हैं. लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्यूंकि कहा गया है कि लोहे के बर्तन में खाना खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है. 

पीतल के बर्तन

पीतल के बर्तनों में भोजन पकाने या भोजन करने से कृमि रोग, वात और कफ़ दोष की बीमारियाँ नहीं होती हैं. पीतल के बर्तन में बने भोजन के सिर्फ़ 7 प्रतिशत पोषक तत्व ही नष्ट होते हैं. 

तांबा के बर्तन 

तांबे के बर्तन में रखा पानी स्वास्थ के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में पानी पीने से रक्त शुद्ध होता है, यादाश्त बढ़ती है, लिवर हेल्दी रहता है और शरीर से विषैले तत्व दूर होते हैं, यानी बॉडी से Toxins को दूर करता है. ध्यान रहे, तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए, इस से नुकसान होता है. 

काँसा के बर्तन 

काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज़ होती है, रक्त शुद्ध होता है, भूख बढती है और रक्तपित्त दूर होता है. काँसे के बर्तन में भोजन पकाने से सिर्फ 3 प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं. 

ध्यान रहे, काँसे के बर्तन में खट्टी चीज़ें नहीं परोसनी चाहिए, इस धातु से खट्टी चीजें रिएक्शन कर विषैली हो जाती हैं जिस से नुकसान होता है. 

स्टील के बर्तन 

स्टेनलेस स्टील के बर्तन जिसे आम बोलचाल में स्टील का बर्तन कहा जाता है. इसमें भोजन पकाने या खाने से किसी भी तरह की कोई क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं होती है. इसलिए स्टील के बर्तन में पकाने या  खाने से किसी भी तरह का कोई फ़ायदा या कोई नुकसान नहीं होता है. 

सोना के बर्तन 

सोने के बर्तन में भोजन पकाने या भोजन करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, मज़बूत और ताक़तवर बनते हैं और आँखों की रौशनी बढ़ती है. सोना एक गर्म तासीर वाला धातु है,इसलिए राजा लोग सोने के बर्तन में खाया करते थे. 

चाँदी के बर्तन 

जैसा कि आप जानते हैं चाँदी एक ठंडी तासीर की धातु है जो शरीर को अन्दर से ठण्डक पहुँचाती है. चाँदी के बर्तन में भोजन पकाने या भोजन करने से दिमाग तेज़ होता है, आँखों की रौशनी बढती है, दिमाग कूल रहता है, पित्त, कफ़ और वात यानी तीनो दोष नियंत्रित रहते हैं. 


चाँदी के बर्तन के फ़ायदे और नुकसान 

और अब अंत में 

एल्युमीनियम के बर्तन 

जैसा कि आप जानते हैं बोक्स़ाइट नामक खनिज से एल्युमीनियम बनता है. एल्युमीनियम के बर्तन में खाना बनाने या खाने से शरीर को सिर्फ और सिर्फ नुकसान होता है. यह शरीर से आयरन और कैल्शियम को सोख लेता है. एल्युमीनियम के बर्तन में खाना पकाने या खाने से हड्डी कमज़ोर होती है, मानसिक रोग होते हैं, नर्वस सिस्टम को नुकसान होता है, लिवर की बीमारी, किडनी फ़ेल होना, टी.बी., अस्थमा, जोड़ों का दर्द, शुगर जैसी अनेकों बीमारी होती है. 

एल्युमीनियम के बने प्रेशर कुकर में खाना बनाने से 87 प्रतिशत तक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. तो आप समझ सकते हैं कि एल्युमीनियम के बर्तन हमारे स्वास्थ के लिए कितना ख़तरनाक हैं. 

एक पते की बात - प्रेशर कुकर में दाल गलती है, दाल पकती नहीं!

अब आप कहेंगे कि कौन सा बर्तन यूज़ करें?

खाने पीने के लिए आप स्टील का बर्तन यूज़ कीजिये, पकाने में भी, क्यूंकि यह चीप है, सर्वसुलभ भी है. काँच का बर्तन या फिर चीनी मिट्टी के बर्तन भी आप खाने पीने के लिए यूज़ कर सकते हैं. 

पकाने के लिए बेस्ट क्या है, वह तो मैं बता ही चूका हूँ. पर अब आपको बताना है कि कौन सा बर्तन आपके घर में यूज़ होता है? कमेंट ज़रूर कीजियेगा. 




07 जुलाई 2022

Chaxushya Capsule | आँख की बीमारियों की आयुर्वेदिक औषधि - चक्षुष्य कैप्सूल

 

chaxushya capsule for eye disease

चक्षुष्य कैप्सूल आँखों की हर तरह की बीमारियों में असरदार है, तो आईये जानते चक्षुष्य कैप्सूल के गुण, उपयोग के बारे में सबकुछ विस्तार से - 

चक्षुष्य कैप्सूल के घटक या कम्पोजीशन 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो यह बना होता है त्रिफला घनसत्व, मुलेठी घनसत्व और सप्तामृत लौह के मिश्रण से

इसमें मिली हुयी सभी औषधि उच्च गुणवत्ता वाली होती है. सप्तामृत लौह के बारे में डिटेल्स पढने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये.

 त्रिफला और मुलेठी के फ़ायदे कौन नहीं जानता? इनका आनुपातिक मिश्रण इसे अपने आप में बड़ा यूनिक बना देता है. 

चक्षुष्य कैप्सूल के फ़ायदे 

नज़र कमज़ोर होना या आँखों की रौशनी कम होना, धुन्धला दिखाई देना, रतौंधी इत्यादि आँखों की समस्त समस्याओं में इसका प्रयोग करना चाहिए. 

आजकल छोटे-छोटे बच्चों के आँख पर भी मोटे-मोटे चश्मे चढ़े होते हैं, अगर इसका यूज़ किया जाये तो चश्मा लगने से बचा जा सकता है. 

चक्षुष्य कैप्सूल की मात्रा और सेवन विधि 

एक-एक कैप्सूल सुबह-शाम पानी से. बच्चों को भी इसे दे सकते हैं, कैप्सूल खोलकर आधी मात्रा में सुबह-शाम. 

इसके साथ में लगाने के लिए सुरमा और महा त्रिफला घृत का भी सेवन करने से जल्दी लाभ होता है. 

पूरी तरह से सुरक्षित औषधि है, किसी भी उम्र के लोग यूज़ कर सकते हैं. 60 कैप्सूल के एक पैक की क़ीमत है सिर्फ़ 185 रुपया जिसे ऑनलाइन खरीदें का लिंक निचे दिया गया है. 



23 जून 2022

Adhunik Naadi Pariksha E Book | आधुनिक नाड़ी परीक्षा - ई बुक

adhunik naadi pariksha
नाड़ी परीक्षा करना या नब्ज़ चेक करने से शरीर में क्या चल रहा है, और क्या बीमारी है इसका सटीक अनुमान लगाया जाता है. या फिर यह कहिये कि अनुभवी नाड़ी वैद्य आपसे बिना कुछ पूछे आपको क्या-क्या बीमारी है बता देते हैं सिर्फ़ नाड़ी परिक्षण से. 

यदि आपको इसमें रूचि है और चाहते हैं कि आपको इसकी थोड़ी-बहुत जानकारी हो जाये तो आपको 'आधुनिक नाड़ी परीक्षा - ई बुक' पढनी चाहिए.

इस से आपको नाड़ी परिक्षण की बेसिक जानकारी हो जाएगी और इसका अभ्यास कर इसमें सक्षम भी हो जायेंगे. 

इस ई बुक में नाड़ी परीक्षा की सभी बेसिक जानकारी दी गयी है जैसे - 

  • नाड़ी परीक्षा क्या है?
  • नाड़ी परिक्षण क्यूँ करते हैं?
  • नाड़ी परीक्षा कब और कहाँ करना चाहिए?
  • नाड़ी परीक्षा के स्तर या Levels 
  • नाड़ी परीक्षा के नियम 
  • नाड़ी परीक्षा में प्रयुक्त होने वाले आधुनिक उपकरण इत्यादि 

इस ई बुक में आपको मिल जायेगा टेक्स्ट, चार्ट और एनीमेशन भी

तो देर किस बात की? अभी आर्डर कीजिये. इस ई बुक की क़ीमत है 999 रूपये पर हमारे चैनल के सभी दर्शकों को सिर्फ ऑफर प्राइस सिर्फ 500 रूपये में दी जा रही है. 

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वैद्य लखैपुरी की दूसरी पुस्तकें - 

आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा

पुरुष यौन रोग कारन और उपचार 



15 जून 2022

Pital Bhasma Benefits & How to Make | पीतल भस्म के फ़ायदे

pitaj bhasma benefits in hindi
आज की जानकारी है पीतल भस्म के बारे में. पीतल के बर्तन का इस्तेमाल तो आपने कभी न कभी किया ही होगा. इसी पीतल से आयुर्वेद की यह औषधि भी बनायी जाती है, यह जानकर आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए. 

पीतल क्या है? इसकी भस्म कैसे बनाई जाती है? इसके क्या-क्या फ़ायदे हैं? और इसका उपयोग कैसे किया जाये? आईये इन सबके बारे में विस्तार से जानते हैं - 

पीतल क्या है? 

जैसा कि हम सभी देखते हैं कि बर्तन और टूल्स में इसका प्रयोग किया जाता है. पीतल दो तरह की चीज़ों के मिश्रण से बनी धातु है. दो भाग ताँबा और एक भाग जस्ता के मिश्रण से बनने वाली धातु पीतल कहलाती है. 

ताँबा और जस्ता से भी आयुर्वेदिक दवा बनती है, ताँबा से बनी औषधि को ताम्र भस्म और जस्ता से बनी औषधि को यशद भस्म कहा जाता है जिसके बारे में बहुत पहले बता चूका हूँ.


ताम्र भस्म और यशद भस्म ही अधीक प्रचलित है और अधीक प्रयोग की जाती है, पीतल भस्म ज़्यादा प्रचलित नहीं. 

पीतल भस्म निर्माण विधि 

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि किसी भी धातु की भस्म बनाने के लिए सबसे पहले इसे शोधित करना होता है. शास्त्रों में कहा गया है कि जिस पीतल को अग्नि में तपाकर काँजी में बुझाने से ताँबे के जैसा रंग निकले और जो देखने में पीला, वज़न में भारी और चोट सहन करने वाला हो उसी पीतल को भस्म बनाने के लिए प्रयोग में लेना चाहिए. 

पीतल शुद्धीकरण 

पीतल को शुद्ध करने के लिए इसके पतले-पतले पत्तर बनाकर आग में तपाकर  हल्दी चूर्ण मिले हुए निर्गुन्डी के रस में सात बार बुझाने से पीतल शुद्ध हो जाता है. 

इसे शोधित करने की दूसरी विधि यह है कि पीतल के बुरादे को आग में गर्म कर निर्गुन्डी के रस या फिर काँजी में बुझाने से भी शुद्ध हो जाता है. 

पीतल भस्म निर्माण विधि 

आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके भस्म बनाने की दो-तीन विधि बताई गयी है. शुद्ध किये गए पीतल कागज़ के जैसे पतले पत्र बनवा लें. इसके बाद शुद्ध गन्धक और शुद्ध मैनशील इसके वज़न के बराबर लेकर घृतकुमारी के रस में घोंटकर पीतल के पत्रों पर लेपकर सुखा लें. इसके बाद सराब सम्पुट में बन्दकर गजपुट की अग्नि दें. इसी तरह से तीन पुट देने से काले रंग की भस्म तैयार होती है. यह सब औषधि निर्माण की टेक्निकल बाते हैं, इसका निर्माण सबके लिए संभव नहीं. बस प्रोसेस समझने के लिए संक्षेप में बता दिया हूँ. 

पीतल भस्म की मात्रा और सेवन विधि 

60 मिलीग्राम से 125 मिलीग्राम तक सुबह-शाम शहद, अनार के शर्बत या रोगानुसार उचित अनुपान से 

आयुर्वेद में इसे विषनाशक, वीर्यवर्द्धक, कृमि और पलित रोगनाशक कहा गया है. इसकी भस्म स्वाद में तीक्ष्ण और रुक्ष होती है, दिखने में काले रंग की काजल की तरह.

इसकी तासीर के बारे में मज़ेदार बात बताऊँ की यह ठण्डा और गर्म दोनों है. यदि से इसे ठण्डी तासीर की चीज़ के साथ सेवन किया जाये तो तासीर में ठण्डा है और अगर गर्म चीज़ के साथ सेवन करेंगे तो गर्म करेगा. 

पीतल भस्म के फ़ायदे 

रक्तपित्त, कुष्ठव्याधि, वातरोग, पांडू, कामला, प्रमेह, अर्श, संग्रहणी, श्वास इत्यादि रोग नाशक है. 

आसान शब्दों में कहूँ तो इसके सेवन से गर्मी, जौंडिस, खून की कमी, बवासीर, दम, IBS, दर्द वाले रोग, गठिया बात, गर्मी, कोढ़ जैसी बीमारियों में फ़ायदा होता है. 

इसे वैद्य जी की सलाह से, वैद्य जी देख रेख में ही सेवन करना चाहिए. और अब अंत में एक बात और जान लीजिये कि जिनको ताम्र भस्म सूट नहीं करती उनको यह सूट करती है. 





11 जून 2022

Vyadhiharan Rasayan | व्याधिहरण रसायन

vyadhiharan rasayan

आज की जानकारी है एक ज़बरदस्त आयुर्वेदिक औषधि व्याधिहरण रसायन के बारे में. 

इसे कई जगह व्याधिहरण रस के नाम से भी जाना जाता है. यह तेज़ी से असर करने वाली ऐसी औषधि है जो अनुपान भेद से अनेकों रोगों को दूर करती है. 

तो आईये जानते हैं व्याधिहरण रसायन गुण, उपयोग निर्माण विधि और फ़ायदे के बारे सबकुछ विस्तार से - 

व्याधिहरण रसायन जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है यह व्याधि यानी रोग-बीमारी को दूर करने वाली रसायन औषधि है. यह कूपीपक्व रसायन औषधि है जो तेज़ अग्नि से विशेष विधि से बनाई जाती है. 

यह रक्तदोष नाशक, विष नाशक, एन्टी सेप्टिक औषधि है. 

व्याधिहरण रसायन के फ़ायदे 

यह नए पुराने उपदंश और उसके कारन उत्पन्न लक्षणों को दूर करती है. शास्त्रों में कहा गया है कि उपदंश का विष हड्डी तक पहुँच गया हो तब भी इस से लाभ होता है. 

रक्त विकार, गठिया, बात, हर तरह के ज़ख्म, खाज-खुजली, फोड़ा-फुंसी, भगन्दर कुष्ठ तथा चर्म रोगों में जैसे चकत्ते, अण्डवृद्धि, नाखून टेढ़ा होना, शोथ, वृक्कशोथ आदि में गुणकारी है. 

अनुभवी वैद्यगण ही इसका प्रयोग करते हैं, वैद्य  जी की सलाह के बिना इसे कभी भी  न लें. 

व्याधिहरण रसायन की मात्रा और सेवन विधि 

60 मिलीग्राम से 125 मिलीग्राम तक घी, शहद, अद्रक के रस, पान के रस या रोगानुसार उचित अनुपान से स्थानीय वैद्य जी की देख रेख में ही लेना चाहिए. 

व्याधिहरण रसायन के घटक या कम्पोजीशन 

यह छह चीज़ों के मिश्रण से बनाया जाता है. इसके निर्माण के लिए चाहिए होता है शुद्ध, पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध संखिया, शुद्ध हरताल, शुद्ध मैनसिल और रस कपूर सभी समान मात्रा में. 

व्याधिहरण रसायन निर्माण विधि 

इसके निर्माण के लिए सबसे पहले पारा-गंधक की कज्जली बनाकर दूसरी चीज़े मिक्स घोटने के बाद आतिशी शीशी में भरकर 'बालुका यंत्र' में रखकर क्रम से मृदु, मध्यम और तीक्ष्ण आँच लगातार तीन दिन तक दी जाती है. इसके बाद ठण्डा होने पर शीशी निकालकर दवा निकाल ली जाती है. 

इसे बनाने की प्रक्रिया जटिल है, बस आपकी जानकारी के लिए संक्षेप में बताया हूँ. सिद्धहस्त अनुभवी वैद्य ही इसका निर्माण कर सकते हैं, सब के बस की बात नहीं.