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09 January 2020

Sangjarahat Bhasma | संगजराहत भस्म, गुण उपयोग, निर्माण और प्रयोग विधि


यह एक शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जो रक्तपित्त, बॉडी में कहीं से भी ब्लीडिंग होना, ल्यूकोरिया, धात रोग, सुजाक और पायरिया जैसे अनेकों रोगों में प्रयोग की जाती है, तो आईये जानते हैं संगजराहत भस्म क्या है? इसके गुण, उपयोग और निर्माण विधि के बारे में विस्तर से -

संगजराहत भस्म क्या है?

संग का मतलब होता है पत्थर यह एक तरह का खनिज होता है. यह सफ़ेद रंग का चिकना और बड़ा ही मुलायम पत्थर होता है. इसे घीया पाठा भी कहा जाता है. यूनानी में इसे संगजराहत ही कहते हैं जबकि संस्कृत में इसे दुग्ध पाषाण के नाम से जाना जाता है. दुग्ध का मतलब दूध और पाषाण का मतलब पत्थर, दूध की तरह सफ़ेद रंग का होने से इसे संस्कृत में दुग्ध पाषाण कहा गया है.

अंग्रेज़ी में इसे Talc और Soft Stone नाम से जाना जाता है. दन्त मंजन और Talcum Powder में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

संगजराहत भस्म निर्माण विधि - 

सबसे पहले इसके टुकड़ों को आग में गर्म कर गावज़बाँ के काढ़े में बुझाना चाहिए इसके बाद मिट्टी का एक बर्तन लेकर उसमे पहले घृतकुमारी का गूदा डाला जाता है उसके बाद संगजराहत और फिर ऊपर से घृतकुमारी का गूदा डालकर बर्तन का मूंह बंदकर सम्पुट की अग्नि दी जाती है. ठण्डा होने पर बारीक पीसकर रख लिया जाता है. कुछ वैद्य लोग इसे डायरेक्ट घृतकुमारी के गूदे के साथ भस्म बनाते हैं तो कुछ लोग घृत कुमारी की जगह नीम के पत्तों के साथ इसकी भस्म बनाते हैं. एक आलसी वैद्य जी को बिना भस्म बनाये इसका इस्तेमाल करते हुवे देखा, जो कि बिल्कुल ग़लत है. ऐसे ही लोग आयुर्वेद को बदनाम करते हैं. एक्सटर्नल यूज़ के लिए चलेगा पर इंटरनल यूज़ के लिए विधि पूर्वक भस्म बनाना बहुत ज़रूरी है.

संगजराहत भस्म के गुण या Properties 

इसके गुणों की बात करें तो आयुर्वेद और यूनानी मतानुसार यह तासीर में ठण्डी और पित्तशामक है. यह खून बहना रोकने में बेहद असरदार है. यह रक्त पित्त, ख़ूनी दस्त, ख़ूनी उल्टी, श्वेत प्रदर, रक्तप्रदर, स्वप्नदोष, सुजाक और पायरिया जैसी दांत की बीमारियों में भी असरदार है.

संगजराहत भस्म की मात्रा और सेवन विधि – 500mg से एक ग्राम तक सुबह-शाम शहद, मक्खन, मलाई या रोगानुसार अनुपान से.

आईये अब जानते हैं रोगानुसार संगजराहत भस्म के प्रयोग -

रक्त पित्त(कहीं से भी ब्लीडिंग होने)में - संगजराहत भस्म 5 ग्राम + कामदुधा रस मोती युक्त 1 ग्राम + वल्लभ रसायन 2.5 ग्राम. सभी को मिलाकर 10 ख़ुराक बना लेना है. एक-एक मात्रा सुबह-शाम दूब घास के रस के साथ देना चाहिए. साथ में उशिरासव भी पीना चाहिय.

स्वप्नदोष(स्वप्न प्रमेह, नाईटफॉल) में- संगजराहत भस्म 10 ग्राम + प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम + स्फटिक भस्म 5 ग्राम + आमलकी रसायन 20 ग्राम. सभी को मिलाकर 40 डोज़ बना लें. एक-एक डोज़ सुबह-शाम गिलोय के रस से देना चाहिए.

पूयमेह(सुज़ाक) में - संगजराहत भस्म 500mg शहद से सुबह-शाम देना चाहिए और ऊपर से चन्दनासव पीना चाहिए.

दन्तरोग(मसूड़ों से खून आना, दांत हिलना) में - संगजराहत भस्म में स्फटिक भस्म और माजूफल का चूर्ण मिक्स कर मंजन करना चाहिए. हमारे स्टोर पर मिलने वाला दन्त रक्षक पाउडर में संगजराहत मुख्य घटक है और यह दन्त मंजन दाँतों की समस्या के लिए बेजोड़ है. यह सारी जानकारी मेरी पुस्तक 'आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा' में भी दी गयी है.

कट छिल जाने या किसी तरह की इंजुरी होने पर- किसी धारदार चीज़ से कट छिल जाने पर संगजराहत भस्म को पाउडर की तरह डालकर पट्टी कर देने से न सिर्फ़ ब्लीडिंग बन्द हो जाती है बल्कि इन्फेक्शन होने का भी ख़तरा नहीं रहता है. तो इस तरह से संगजराहत भस्म हर घर में रखने लायक घरेलु औषधि भी है.

संगजराहत भस्म मार्केट बहुत मुश्किल से मिलता है, पर यह अवेलेबल है ऑनलाइन जिसका लिंक  दिया गया है. 50 ग्राम की क़ीमत सिर्फ़ 60 रुपया है.


06 January 2020

Sanda Oil | सांडा तेल - जानिए इसकी सच्चाई


सांडा आयल या सांडे के तेल बारे में लगभग सभी जानते हैं, इसे लोग मर्दाना कमज़ोरी में यूज़ करते हैं. सांडे का तेल है क्या? क्या सच में इसकी मालिश से पुरुषों के यौन अंग की कमज़ोरी दूर होती है? इसके बारे में आयुर्वेद क्या कहता है? क्या इसका प्रयोग करना चाहिए? आईये सबकुछ डिटेल में जानते हैं इसके बारे में- 

सबसे पहले जानते हैं कि सांडा है क्या चीज़?

सांडा एक तरह का रेगिस्तानी छिपकली है जो भारत और पाकिस्तान के रेगिस्तानी इलाक़ो, जंगलों और कई दुसरे देशों में भी पाया जाता है. इसी की वसा या  चर्बी का तेल निकाल कर लोग बेचते हैं. 

फुटपाथ पर बाज़ारों में मजमा लगाकर इसका तेल बेचने वाले लोग अक्सर दिख जायेंगे. कई जगह पर साप्ताहिक बाज़ारों में भी यह लोग दिख जाते हैं. झारखण्ड में तो मैंने अक्सर आदिवासियों को इसे बेचते हुए देखा है. कम पढ़े लिखे और अनपढ़ लोग सुनी-सुनाई बातों में आकर इसे यूज़ करते है और कई लोगों को तो इस से नुकसान भी हो जाता है. 

इसे बेचने वाले कुछ लोग तो असली तेल देने के लिए इसे आपके सामने की चिर-फाड़ कर चर्बी को पिघलाकर तेल बनाकर देते हैं. 

इसे बेचने वाले लोग कभी एक जगह नहीं टिकते और बड़े धूर्त होते हैं, बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. इसकी मालिश से ये हो जायेगा वो जायेगा. 

तो क्या सांडे का तेल असरदार होता है? 

जैसा कि दावा किया जाता है एफ्रोडेसियाक या यौनेक्षा बढ़ाता है, सांडे का तेल इरेक्टाइल डिसफंक्शन और लिंग की कमज़ोरी को दूर कर देता है, यह बिल्कुल ग़लत है. इसके तेल में किसी जानवर में पाई जाने वाली चर्बी के गुण ही हैं. 
आधुनिक डॉक्टर भी इसे नहीं मानते जबकि आयुर्वेद में भी इसका कोई प्रयोग  नहीं बताया गया है. 

आपने देखा होगा इसका तेल बेचने वाले लोग जिन्दा सांडा को रखे रहते हैं जो भागता नहीं है, क्यूंकि इसके कमर के हड्डी को तोड़ दिया जाता है. जब कमर की हड्डी ही टूट गयी हो तो बेचारा मासूम प्राणी हिल भी कैसे सकता है? 

इसी मिथक और अन्धविश्वास के चलते यह बेजुबान जानवर अपनी जान गँवा रहा है और लगभग विलुप्त होने की कगार पर है. 

मिथक और सच्चाई - 

सांडा के बारे में बात बहुत पुराने समय से चली आ रही है कि इस प्राणी में अद्भुत शक्ति पाई जाती है जिसकी वजह से यह रेगिस्तान के तपाने वाली गर्मी में भी ज़िन्दा रहता है, इसलिए इसके तेल को लोग पावरफुल मानते हैं. यह सब बिल्कुल झूठ है, इसमें कोई सच्चाई नहीं, मॉडर्न रिसर्च से भी यह साबित हो चूका है कि इसके तेल में ऐसा कोई गुण नहीं. 

मर्दाना कमज़ोरी के लिए अगर मालिश ही करनी है तो आयुर्वेद में इसके लिए कई तरह के तेल हैं, इनका इस्तेमाल कीजिये. M-Oil और तरंग मसाज आयल का प्रयोग कीजिये और फ़ायदा उठाइए बिना किसी साइड इफ़ेक्ट के. यह ऑनलाइन अवेलेबल है जिसका लिंक  दिया गया है. 





26 December 2019

Siddh Makardhwaj | सिद्ध मकरध्वज - कमज़ोरी दूर करने वाली बेजोड़ औषधि


मकरध्वज आयुर्वेद की एक ऐसी पॉपुलर दवा है जिसके बारे में सभी लोग कुछ न कुछ जानते ही हैं. इसी के सबसे उच्च गुणवत्ता वाले रूप सिद्ध मकरध्वज के ऐसे ऐसे गुण और प्रयोग के बारे में आज बताने वाला हूँ जो शायेद ही आपने पहले कभी सुना हो. तो आईये इसके बार में विस्तार से जानते हैं -

मकरध्वज अपने आप में एक बेजोड़ औषधि है जिसे बड़े-बड़े डॉक्टर भी मान चुके हैं. सिद्ध मकरध्वज टॉप क्लास का होता है और इसी के बारे में आज विशेष चर्चा करूँगा. मकरध्वज के दुसरे योगों की जानकारी पहले भी दी गयी है, जिसका लिंक दिया जा रहा है.


सिद्ध मकरध्वज पारा गंधक और स्वर्ण का विशेष योग है. सबसे पहले भोले शंकर जी ने इसे बनाकर सिद्धों को इसका सेवन कराया था इसलिए इसे सिद्ध मकरध्वज कहते हैं.

सिद्ध मकरध्वज के सेवन से ताक़त बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है. वैसे तो यह पुरे शरीर के लिए लाभकारी है पर हार्ट, ब्रेन और नर्वस सिस्टम पर इसका सबसे ज्यादा असर होता है. बच्चे, बड़े, बूढ़े, जवान, महिला और पुरुष सभी के लिए यह फ़ायदेमंद है. अनुपान भेद से इसे अनेकों रोगों में प्रयोग किया जाता है. किस बीमारी में इसे किस चीज़ के साथ लेना है, आगे सब बताऊंगा. पर उस से पहले ठण्ड के इस मौसम में इसका प्रयोग जान लिजिए-

चूँकि इंडिया में अभी जाड़े का मौसम आ गया है, कई लोगों को ठण्ड बहुत ज़्यादा महसूस होती है उनके लिए सिद्ध मकरध्वज बड़े काम की चीज़ है.

तो भई, अगर आपको ठण्ड ज़्यादा लगती है और गर्म कपड़ों से दबे रहते हैं तो अभी से सिद्ध मकरध्वज का विधि पूर्वक सेवन शुरू कीजिये और फिर देखिये इसका चमत्कार.
स्कुल के दिनों की एक घटना मुझे याद आती है-

जनवरी का महिना था, कडकडाती ठण्ड थी, गाँव से मुझे शहर जाना था किसी काम से. उन दिनों गाँव में यातायात का कोई साधन नहीं था, पैदल चलकर बस स्टैंड तक जाना पड़ता था और बिच में एक नदी है मोहाने जिसमे उस समय पानी थोड़ी धारा थी, लगभग एक डेढ़ फिट तक ही पानी था. सुबह-सुबह ठण्ड इतना थी कि मैं स्वेटर के ऊपर जैकेट, टोपी, मफ़लर सब पहने जा रहा था. नदी को ऐसे ही पार करना होता था, पानी इतना ठन्डा होता था कि जितना पैर पानी में जाता था लगता था की बस पैर कट गया है.

तो ऐसी ठण्ड में देखता हूँ कि एक साधू जी नदी में नहाकर भीगा गमछा पहने खुले बदन इस ठण्ड में मज़े से चले जा रहे हैं. यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था. बाद में पता चला कि वह साधू जी ठण्ड के पुरे मौसम में सिद्ध मकरध्वज का सेवन करते थे जिसकी वजह से ठण्ड उनसे कोसों दूर रहती थी.

ठण्ड को दूर करने के लिए मकरध्वज का मैं प्रत्यक्ष अनुभव कर देख चूका हूँ. आप भी एक बार ट्राई ज़रूर कीजिये. सिद्ध मकरध्वज ओरिजिनल होना चाहिय तभी पूरा लाभ मिलेगा. ओरिजिनल सिद्ध मकरध्वज न. 1 का लिंक दिया जा रहा है.


सिद्ध मकरध्वज की सेवन विधि -

मकरध्वज को एक विशेष विधि से सेवन करने का विधान है. सही विधि से सेवन करने पर ही इसके सारे गुणों की प्राप्ति होती है.

तो अब सवाल यह उठता है कि इसके सेवन की सही विधि क्या है?

सिद्ध मकरध्वज को शहद के साथ अच्छी तरह से खरल कर सेवन से इसका पूरा लाभ मिलता है. जैसा कि शास्त्रों में भी कहा गया है - 'मर्दनम गुणवर्धनम' 

अथार्त- मर्दन करने से इसके गुणों में वृद्धि हो जाती है. जितना पॉसिबल हो इसे शहद के साथ खरल या पेश्टर में डालकर मर्दन कर ही यूज़ करना चाहिए.

125 mg से 375 mg तक आयु के अनुसार इसकी मात्रा लेकर एक स्पून शहद के साथ दस से 15 मिनट तक खरल कर रोज़ दो से तीन बार तक इसका सेवन करें और फिर चमत्कार देखें. अगर किसी ख़ास बीमारी के लिए इसे लेना है तो उस बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवा के साथ इसे मिक्स कर लेना चाहिए.

सिद्ध मकरध्वज के गुण -

अगर मैं कहूँ कि सिद्ध मकरध्वज गुणों की खान है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. मकरध्वज के जैसी दवा दुनिया की किसी भी पैथी में नहीं है. यह मरणासन्न रोगी को भी  बचा देती है.

आयुर्वेदानुसार यह त्रिदोष नाशक है जिस से यह हर तरह की बीमारी में लाभकारी है.
इसके गुणों की बात करें तो यह ताक़त बढ़ाने वाली बेजोड़ दवा है. यह हार्ट और नर्वस सिस्टम को ताक़त देती है. खून की कमी और कमज़ोरी दूर कर वज़न बढ़ाती है.

शीघ्रपतन, इरेक्टाइल डिसफंक्शन,नपुँसकता और वीर्य विकारों के लिए बेजोड़ है. न्युमोनिया, खांसी, दमा, टी. बी., हृदय रोग, हर तरह की बुखार, हर तरह की कमज़ोरी, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ना इत्यादि अनेकों रोगों में इसका प्रयोग करना चाहिए.

यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है. बहुत सारे लोग ठण्ड के मौसम में इसका सेवन कर पुरे साल उर्जावान बने रहते हैं. अभी का मौसम इसके इस्तेमाल के लिए सबसे बेस्ट है.

चूँकि सिद्ध मकरध्वज योगवाही भी है, मतलब जिस किसी भी दवा के साथ मिक्स कर यूज़ करेंगे यह उसके गुणों को बढ़ा देता है. अनुपान भेद से यह अनेकों रोगों में प्रयोग किया जाता है, आईये संक्षेप में कुछ बता देता हूँ जैसे -

सर्दी खाँसी में - पान के रस, अदरक के रस, मुलेठी चूर्ण, पीपल चूर्ण के साथ इसे लेना चाहिए

साधारण बुखार में - पीपल और अदरक के रस के साथ
मलेरिया में - करंज बीज या सुदर्शन चूर्ण के साथ
टाइफाइड में - मोती पिष्टी के साथ
जीर्ण ज्वर या पुरानी बुखार में - पीपल चूर्ण के साथ
कब्ज़ में - त्रिफला चूर्ण या त्रिफला क्वाथ के साथ
एसिडिटी में - आँवला चूर्ण या गिलोय सत्व के साथ
आँव वाले दस्त में - बेलगिरी चूर्ण या आमपाचक चूर्ण के साथ
बवासीर में - सुरण चूर्ण या कंकायण वटी के साथ
संग्रहणी या आई बी एस में - भुने हुवे जीरा के चूर्ण, शहद और छाछ के साथ
हृदय रोगों में - मोती पिष्टी और अर्जुन की छाल के चूर्ण के साथ
पागलपन में - सर्पगंधा चूर्ण के साथ
मृगी में - बच के चूर्ण के साथ
गैस में - भुनी हींग के साथ
पथरी में - गोक्षुर और कुल्थी के क्वाथ के साथ
धात रोग में - गिलोय के रस के साथ
स्वप्नदोष में - कबाब चीनी चूर्ण के साथ
शीघ्रपतन में - कौंच बीज चूर्ण या दिर्घायु चूर्ण के साथ
डायबिटीज में - गुडमार और जामुन गुठली चूर्ण के साथ
एनीमिया या खून की कमी में - लौह भस्म के साथ
ल्यूकोरिया में - तण्डूलोदक के साथ

तो दोस्तों, इस तरह से अनेकों रोगों में इसे उचित अनुपान के साथ प्रयोग किया जाता है. 
बेस्ट क्वालिटी का स्पेशल सिद्ध मकरध्वज न. 1 ऑनलाइन अवेलेबल है, 1 ग्राम का पैक सिर्फ 150 रुपया में जिसका लिंक गया है. 


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14 December 2019

Filaria Treatment | फ़ाइलेरिया का महाकाल - श्लिपदहर योग


यह एक ऐसी बीमारी है जिसके कारन रोगी का जीवन कठिन हो जाता है जिस से चलना फिरना और यहाँ तक की उठने बैठने में भी समस्या हो जाती है, तो आईये इसकी चिकित्सा के बारे में विस्तार से जानते हैं - 

फ़ाइलेरिया को श्लिपद और हाथी पाँव के नाम से भी जाना जाता है. रोगी का पैर फूलकर हाथी के पैर की तरह मोटा हो जाता है जिसे लोग हाथी पाँव भी कहते हैं. 

फ़ाइलेरिया रोग का कारण - 

आयुर्वेदानुसार एक तरह की कृमि ही इसका कारन है और इसे मॉडर्न साइंस भी मानता है. 

क्या यह रोग ठीक हो सकता है? 

जी हाँ, आयुर्वेदिक चिकित्सा से यह रोग ठीक हो जाता है इसमें कोई शक नहीं. इसके लिए लम्बे समय तक दवा लेनी होती है. जब तक आपने धैर्य नहीं होगा, इस रोग से मुक्ति नहीं मिलेगी. 

होता क्या है कि अक्सर लोग दो चार महीने दवा खाकर छोड़ देते हैं और मान लेते हैं कि रोग ठीक नहीं होगा. इस से छुटकारा पाने के लिए एक से दो साल तक औषधि का सेवन करना पड़ता है तभी रोग निर्मूल हो जाता है और दुबारा नहीं होता. 
साध्य फ़ाइलेरिया(नया रोग)

दो चार साल तक का पुराना रोग जल्दी ठीक हो जाता है परन्तु जिसमे रोगी की त्वचा कछुआ के पीठ के समान कड़ी हो गयी हो, असाध्य माना जाता है. पर यह भी ठीक हो सकता है औषधि के निरन्तर सेवन से, साथ में अग्निकर्म और जलौकावचारण भी करना चाहिए इसके लिए. 
असाध्य फ़ाइलेरिया(बहुत पुराना रोग)


फ़ाइलेरिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा - 

इसकी आयुर्वेदिक चिकित्सा से पहले दो बात का ध्यान रखना होगा. पहली बात यह कि बड़े धैर्य के साथ आपको इसकी औषधि सेवन करनी पड़ेगी 

और दूसरी बात यह कि खाने-पिने में परहेज़ भी करना होगा. यदि आप खान-पान में परहेज़ नहीं करेंगे तो सफलता नहीं मिलेगी. 

परहेज़ क्या-क्या करना है?

फ़ाइलेरिया की इस दवा का इस्तेमाल करते हुए आलू, केला, उरद, गोभी, आम, अरबी, कटहल, शकरकंद, ठण्डा पानी, ठंडा भोजन, फ्रिज की चीज़, गन्ना, गुड़, चीनी, दूध और दूध से बनी चीजों का परहेज़ करना चहिये. 

आईये अब जानते हैं इसकी औषधि के बारे में. चूँकि इसका मूलकारण कृमि है तो कृमिघन औषधियों के मिश्रण से बनाया गया है - श्लिपदहर योग 
शास्त्रों में भी कहा गया है - 

'प्रकृति विघातस्त्वेषां कटुतिक्त कषायक्षारोष्णानां द्रव्याणामुपयोगः,
यच्चान्यदापि किन्चिच्छलेष्म पुरीषप्रत्यानीकभूतं तत् स्यात् ||'

अथार्त - कृमियों की प्रकृति का नाश कटु, कषाय, क्षार और उष्णवीर्य वाले द्रव्यों के उपयोग से होता है और जो भी क्रिया, द्रव्य उपचारादि कफ तथा पुरीष के गुणों के विपरीत होते हैं, उनके सेवन से भी कृमियों का विनाश होता है. 

श्लिपदहर योग इसी तरह की कृमिनाशक और फ़ाइलेरिया में प्रयुक्त होने वाली औषधियों का बेजोड़ मिश्रण है. 

श्लिपदहर योग के घटक या कम्पोजीशन - 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे श्लीपदगजकेशरी रस, नित्यानन्द रस, कृमिमुदगर रस, कृमिकुठार रस, नागार्जुनाभ्र रस और कृष्ण भृंगराज घनसत्व का उचित संयोग होता है. इसकी बनी बनाई पुड़िया अब उपलब्ध है. इसके साथ में फ़ाइलेरियल कैप्सूल का भी सेवन करना चाहिए.

औषधि की मात्रा और सेवन विधि - 

श्लीपदहर योग एक पुडिया रोज़ दो से तीन बार तक शहद में मिक्स कर 
फ़ाइलेरियल कैप्सूल एक-एक सुबह-शाम.

संभव हो तो इनके साथ में गोमूत्र अर्क, आसव या क्षार में से कोई एक भी एक सेवन कर सकते हैं. 

यह दोनों औषधि अवेलेबल है ऑनलाइन जिसका लिंक दिया गया है -



 फ़ाइलेरियल कैप्सूल के 120 पैक की क़ीमत है सिर्फ़ 400 रुपया जबकि श्लीपदहर योग के 90 मात्रा की क़ीमत है 999 रुपया. दोनों दवा मिलाकर सिर्फ़ एक हज़ार से 1200 तक एक महीने का खर्च होता है जो कि कोई अफ़ोर्ड कर सकता है, इस महाव्याधि से मुक्ति पाने के लिए. 

तो दोस्तों, अगर किसी को फ़ाइलेरिया से मुक्ति पानी है तो बताई गयी दवा को धैर्यपूर्वक सेवन करना चाहिए. यह कष्टकारक महाव्याधि दूर होगी, यह आयुर्वेद की गारन्टी है!!! 

फ़ाइलेरियल कैप्सूल की जानकारी 

फ़ाइलेरिया का उपचार 

07 December 2019

Diabetes Herbal Remedy | मधुमेह की आयुर्वेदिक औषधि


अगर आप डायबिटीज से परेशान हैं और शुगर लेवल बढ़ा हुआ है तो आजकी जानकारी आपके लिए है. जैसा कि आप सभी जानते हैं जिस किसी को डायबिटीज हो जाती है उसे मीठी चीज़ों से परहेज़ करना पड़ता है और साथ ही शुगर लेवल कण्ट्रोल में रखने के लिए दवाईयाँ लेनी पड़ती है. और यदि आप अंग्रेज़ी दवा पर डिपेंड  हैं तो इसका डोज़ धीरे-धीरे बढ़ता ही जाता है और किसी-किसी को तो इन्सुलिन का इंजेक्शन तक लेने की नौबत आ जाती है. तो ऐसी कौन सी दवा ली जाये जिस से न सिर्फ़ शुगर लेवल नार्मल रहे बल्कि इस बीमारी से मुक्ति भी मिले? आईये इसके बार में विस्तार से जानते हैं - 

आप मानें या न माने टाइप वन और टाइप टू या हर तरह की डायबिटीज के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ आयुर्वेदिक दवाएँ ही सबसे बेस्ट हैं. और यदि नियमपूर्वक इनका सेवन किया जाये और रोग नया हो तो आप इस बीमारी से छुटकारा पा सकते हैं. 
तो अब सवाल यह उठता है कि कौन सी औषधि इसके लिए सेवन करनी चाहिए? 

अपने अनुभव के आधार पर मेरा जवाब यह है इसके लिए काष्ठ औषधियों के योग के साथ रसायन औषधि भी लेना आवश्यक है तभी बेस्ट रिजल्ट मिलता है. 

इसके लिए कम से कम दो तरह की औषधि लेनी चाहिए सुगरोल चूर्ण और स्पेशल बसन्त कुसुमाकर रस 

यह जो सुगरोल चूर्ण है इसका कॉम्बिनेशन बेजोड़ है. इसे मधुमेह के लिए प्रयुक्त होने वाली जड़ी-बूटियों के संतुलित मिश्रण से बनाया गया है. इसके मुख्य घटक हैं - 
जम्बूफल की गुठली, गुडमार, नाय, बेलपत्र, तेजपत्र और मेथीदाना जैसी चीज़ें इसका मुख्य घटक होती हैं. 

इसके निरंतर सेवन से ब्लड शुगर और यूरिन शुगर का लेवल नार्मल हो जाता है. शुगर को कण्ट्रोल करने वाली किसी भी अंग्रेजी दवा से यह सौ गुना बेहतर है. क्यूंकि इसका कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता और डायबिटीज की वजह से होने वाली दूसरी कम्पलीकेशन को भी दूर कर देता है. 

इसके साथ जो दवा लेनी होती है वह है स्पेशल बसन्त कुसुमाकर रस. वैसे तो यह आयुर्वेद की पॉपुलर मेडिसिन है जो मार्केट में कई बड़ी नामी कंपनियों की मिल जाती है पर उनसे इसके जैसा रिजल्ट नहीं मिलता है क्यूंकि यह जो स्पेशल बसन्त कुसुमाकर रस है इसे विशेष भावना देकर बनाया गया है. यह एक बेजोड़ शास्त्रीय योग है जो बीमारी दूर कर शरीर में नवयौवन लाता है और चुस्ती-फुर्ती का संचार करता है. 

शास्त्रों में इसकी प्रशंशा में लिखा गया है- सर्व रोगों वसन्ते !!

अथार्त - जिस तरह से बसन्त का मौसम आने पर फूल खिल जाते हैं ठीक उसी तरह इस औषधि के सेवन से शरीर में नयी शक्ति, स्फूर्ति और ऊर्जा आती है और शरीर खिल उठता है. यह पुरुषों की मर्दाना कमज़ोरी, यौन रोगों और महिलाओं के लिए भी समान रूपसे लाभकारी है. 

बसन्त कुसुमाकर रस के बारे में अधिकतर लोगों में यह धारणा कि बुजुर्गों की दवा और सिर्फ डायबिटीज के लिए है. यह बिल्कुल ग़लत है, अनुपान भेद से यह अनेक रोगों में प्रयोग की जाती है. 

इन दो दवाओं के इस्तेमाल से अनेकों रोगियों को लाभ हुआ है. उदाहरण के लिए एक रोगी की रिपोर्ट बताना चाहूँगा -

51 साल की एक महिला रोगी जिनका ब्लड सुगर लेवल 400 से ऊपर था और इसकी वजह से आँखों की रौशनी भी कम हो गयी थी. 20 अगस्त की इनकी रिपोर्ट देख सकते हैं - 

एक हफ़्ते यही दवा इस्तेमाल करने के बाद जब टेस्ट कराया गया तो रिपोर्ट में शुगर 145 आयी, 28 अगस्त की रिपोर्ट आप देख सकते हैं - 


11 सितम्बर की रिपोर्ट नार्मल आई और उनकी सारी प्रॉब्लम दूर हो गयी, जैसा कि आप रिपोर्ट में देख सकते हैं - 



यह तो Example का तौर पर बता रहा हूँ, ऐसे बहुत सारी रिपोर्ट्स से मेरा व्हाट्सऐप भरा पड़ा है. 

औषधि की मात्रा और सेवन विधि - 

चूर्ण को एक स्पून सुबह-शाम लेना है ताज़े पानी से भोजन के बाद. और स्पेशल बसन्त कुसुमाकर रस की जो गोली है इसे 2-2 गोली सुबह-शाम आधा कप दूध में घोलकर लेना चाहिए. 

चूर्ण की क़ीमत सिर्फ़ 100 रुपया सौ ग्राम के पैक की, जबकि स्पेशल बसन्तकुसुमाकर रस 325 रुपया का है 1 पैक

यह दोनों दवा अवेलेबल है ऑनलाइन जिसका लिंक दिया जा रहा है -



तो दोस्तों, ये थी आज की जानकारी डायबिटीज या मधुमेह से मुक्ति दिलाने वाली औषधि के बारे में. 

08 October 2019

Kanyalohadi Vati Benefits | कन्यालोहादि वटी के गुण एवं उपयोग


कन्यालोहादि वटी लड़कियों और महिलाओं के लिए ख़ास आयुर्वेदिक औषधि है जो मासिक धर्म या पीरियड सम्बंधित सभी समस्याओं को दूर करने में बेजोड़ है. इसके सेवन से पीरियड का नहीं आना, पीरियड कम आना, पीरियड में दर्द होना, PCOS, PCOD जैसी समस्या दूर होती है. 

कन्यालोहादि वटी के घटक या कम्पोजीशन - 

इसे एलुआ, शुद्ध कसीस, दालचीनी, छोटी इलायची, सोंठ और गुलकन्द के मिश्रण से बनाया जाता है. 

कन्यालोहादि वटी के फ़ायदे- 

कन्या या कम उम्र की लड़कियों और महिलाओं के लिए यह औषधि वरदान समान है. मासिक धर्म या पीरियड की सभी परेशानियों को दूर करने में यह बेजोड़ है.

समय से पीरियड नहीं होना, पीरियड कम होना, पीरियड में दर्द होना, पीरियड देर से होना जैसी समस्या दूर करती है. 

यह खून की कमी को दूर करती है, गर्भाशय में रक्त प्रवाह को बढ़ाती है. 

पित्त दोष और वात को दूर करती है, शरीर को ठंडक देती है और कब्ज़ दूर करती है. 

कुल मिलाकर बस समझ लीजिये कि PCOS और पीरियड की समस्या के लिए यह एक बेहतरीन दवा है. 

कन्यालोहादि वटी की मात्रा और सेवन विधि - 

दो से तीन गोली तक सुबह शाम भोजन के बाद पानी से लेना चाहिए. कम पीरियड होने पर इसे रोज़ तीन बार तक भी लिया जा सकता है. प्रेगनेंसी में इसे नहीं लेना चाहिए. यह ऑनलाइन उपलब्ध है जिसका लिंक निचे दिया जा रहा है. 


27 August 2019

Herbal Remedy for Uric Acid | यूरिक एसिड की आयुर्वेदिक औषधि - वैद्य जी की डायरी | यूरोक्योर चूर्ण


आज आप सभी की डिमांड पर वैद्य जी की डायरी में यूरिक एसिड को दूर करने वाला योग बताने वाला हूँ. यूरिक एसिड को आप सभी जानते ही हैं. यूरिक एसिड बढ़ने पर दर्द, जोड़ों का दर्द, जोड़ों की सुजन जैसी कई तरह की समस्या हो जाती है. इसके लिए लोग अंग्रेज़ी दवा का सहारा लेते हैं. आयुर्वेद में भी इसका सटीक उपचार है जो पहले ख़ुराक से ही असर दिखाता है, तो आईये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं - 

यूरिक एसिड दूर करने वाले योग का नाम मैंने रखा है यूरोक्योर चूर्ण. बढ़े हुए यूरिक एसिड के अनेकों रोगियों पर इसका सफलतापूर्वक परिक्षण करने के बाद आपके सामने इसे प्रस्तुत कर रहा हूँ.

यूरोक्योर चूर्ण के घटक या कम्पोजीशन - 

इसे शांकर योग विशेष और सुरंजान शीरीं के मिश्रण से बनाया जाता है. अब आप सोच रहे होंगे कि शांकर योग विशेष क्या है? यह एक थोड़ा लेंदी योग है इसके बारे में किसी दुसरे विडियो में विस्तार से बताऊंगा. 

यूरोक्योर चूर्ण के गुण - 

इसके गुणों की बात करें इसके मुख्य गुण हैं दर्द नाशक, सुजन नाशक, मूत्रल और यूरिक एसिड नाशक.

यूरोक्योर चूर्ण के फ़ायदे - 

बढ़े हुए यूरिक एसिड को कम कर नार्मल करना ही इसका मेन फ़ायदा है. 

यूरिक एसिड बढ़ने से होने वाला दर्द, सुजन इत्यादि को दूर करता है.

यह मूत्रल होने से पेशाब को बढ़ाता है और शरीर से यूरिक एसिड को निकाल देता है. 

कुल मिलाकर बस यह समझ लीजिये की यूरिक एसिड को कम करने की यह बेहतरीन आयुर्वेदिक दवा है जो Allopath की तरह साइड इफ़ेक्ट नहीं करती है. 

यूरोक्योर चूर्ण की मात्रा और सेवन विधि - 

एक-एक ग्राम सुबह-दोपहर-शाम दूध के साथ. इसका सेवन करते हुए नॉन वेज और हर तरह की दालों से परहेज़ करना चाहिए. यूरोक्योर चूर्ण अब अवेलेबल है हमारे स्टोर पर 100 ग्राम का पैक सिर्फ 600 रुपया में, जिसका लिंक दिया जा रहा है.




 अगर किन्ही को यूरिक एसिड बढ़ने के कारन समस्या है तो इसका प्रयोग कर लाभ उठायें और मेरा चैनल देखने वाले डॉक्टर्स से अनुरोध है कि अपने रोगियों पर इसका प्रयोग कराकर यश अर्जित करें. 

17 August 2019

Kaharwa Pishtee Benefits | कहरवा पिष्टी के फ़ायदे जानिए


आज की की जानकारी है एक बेहद असरदार औषधि कहरवा पिष्टी के बारे में जो आयुर्वेद के साथ-साथ यूनानी में भी इस्तेमाल की जाती है. इस विडियो में आप जानेंगे कहरवा के गुण, निर्माण और प्रयोग विधि के बारे में विस्तार से - 

कहरवा एक अरबी शब्द है जिसका मतलब होता है विधुत या बिजली. आयुर्वेद में इसे 'तृणकान्तमणि' कहते हैं पर यह कहरवा के नाम से ही प्रचलित है. यह गोंद की तरह का एक पदार्थ है जो बर्मा और दूसरी जगहों की खानों से निकलता है. यह सोने के जैसा पीले रंग का दीखता है. 

कहरवा पिष्टी निर्माण विधि -

 इसके छोटे-छोटे टुकड़े कर चूर्ण बनाकर खरल में डालकर गुलाब जल मिला-मिलाकर दस-पंद्रह दिनों तक खरल कर सुखाकर रख लेना चाहिए. इसका भस्म भी बनाया जाता है पर इसकी पिष्टी ही ज़्यादा गुणकारी होती है. 

कहरवा पिष्टी के गुण - 

इसके गुणों की बात करें तो यह शीतल यानि तासीर में ठंडा, पित्त नाशक, दाह नाशक यानि शरीर की गर्मी और जलन को दूर करने वाला, दिल को ताक़त देने वाला, रक्तनिरोधक यानि ब्लीडिंग रोकने वाला चाहे ब्लीडिंग शरीर के अन्दर से हो या बाहर शरीर में  कहीं से भी हो और व्रण नाशक जैसे कई तरह के गुणों से भरपूर होता है. 

कहरवा पिष्टी के फ़ायदे - 

पित्तज विकारों जैसे रक्तपित्त, अम्लपित्त, उलटी, शरीर की गर्मी, जलन, ज़्यादा प्यास लगना, ज़्यादा पसीना आना, ख़ूनी दस्त, नाक-मुँह या शरीर में कहीं से भी ब्लीडिंग होना, रक्त प्रदर, ख़ूनी  बवासीर इत्यादि में इसका प्रयोग किया जाता है. 

दिल की कमज़ोरी, लिवर, पेट, किडनी की कमज़ोरी इत्यादि में भी दूसरी दवाओं के साथ इसे देना चाहिए.

व्रण नाशक गुण होने से यह हर तरह के ज़ख्म के लिए भी असरदार है. ज़ख्म से मवाद आता हो, बदबू आती हो और यहाँ तक की कीड़े भी पड़ गए हों तो ड्रेसिंग कर इसे पाउडर की तरह छिड़कना चाहिए. 

 अधिकतर लोग समझते हैं कि आयुर्वेद में ज़ख्म के लिए कोई पाउडर नहीं होता, तो समझ लीजिये की कहरवा पिष्टी ज़ख्म के लिए भी बेहतरीन पाउडर है. एंटीबायोटिक वाले अंग्रेज़ी पाउडर से कहीं बेहतर. 

यह एक ऐसी दवा है जिसे खाने के साथ-साथ लगाने में भी प्रयोग कर सकते हैं. उच्च गुणवत्ता वाला विधि पूर्वक बनाया हुआ कहरवा पिष्टी अब अवेलेबल है हमारे स्टोर पर जिसका लिंक दिया गया है-