भारत की सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक हिन्दी वेबसाइट लखैपुर डॉट कॉम पर आपका स्वागत है

24 May 2018

Filaria Treatment | फ़ाइलेरिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा- वैद्य जी की डायरी #10


आज वैद्य जी की डायरी में मैं आज बताने वाला हूँ फ़ाइलेरिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे में. 

जी हाँ दोस्तों, आप में से कई लोग अक्सर पूछते रहते हैं इस बीमारी के इलाज के बारे में. तो आईये जानते हैं फ़ाइलेरिया के लिए इफेक्टिव आयुर्वेदिक योग की पूरी डिटेल - 

फ़ाइलेरिया को आयुर्वेद में श्लीपद के नाम से जाना जाता है जिसे हाथी पाँव भी कहते हैं. इसमें पैर हाथी के पैर की तरह मोटा हो जाता है इसीलिए. यहाँ मैं दो तरह का योग बता रहा हूँ जो आपको यूट्यूब और कहीं और भी इन्टरनेट पर आज से पहले नहीं मिला होगा. 

योग नंबर  - 1

यह शास्त्रीय दवाओं का योग है इसके लिए आपको चाहिए होगा -

नित्यानंद रस - 10 ग्राम,

रस माणिक्य - 10 ग्राम, 

शुद्ध गंधक - 20 ग्राम और 

पञ्चतिक्त घृत गुग्गुल - 25 ग्राम

सबसे पहले तो रस माणिक्य को खरल करें और दूसरी दवाओं को मिक्स कर पीसकर बराबर मात्रा की 90 पुड़िया बना लें. इस एक-एक पुड़िया सुबह-दोपहर-शाम सहजन के छाल के क्वाथ से लेना है. 

इसका सेवन करते हुवे पुनर्नवामूल को पीसकर इसका लेप करना है रोज़ दो बार. 

योग नंबर - 2 

यह एक अनुभूत या टेस्टेड योग है जो एक वैद्य जी का है, फ़ाइलेरिया के रोगियों के लिए काफ़ी असरदार है. इसे बनाने के लिए चाहिए होता है- 

सिहोरा की छाल, त्रिफला, एरण्ड के जड़ की छाल, रास्ना और पुनर्नवा की जड़ प्रत्येक एक एक किलो और गोमूत्र 20 लीटर. 

सभी चीजों को मोटा-मोटा कूटकर गोमूत्र में भीगा दें और 24 घंटे के बाद कड़ाही में डालकर उबालें, जब 5 लीटर बचे तो ठण्डा होने पर छान लें और उसमे 500 ग्राम बड़ी हर्रे के छिल्का का बारीक चूर्ण मिक्स कर पकाएं. जब गोली बनाने लायक गाढ़ा हो जाये तो मटर के बराबर की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. इसका नाम श्लिपदारि गुटिका है. 

इसे दो-दो गोली रोज़ दो से तीन बार तक पानी से लेना है. नया-पुराना हर तरह का फ़ाइलेरिया तीन से छह महिना में दूर हो जाता है. 

योग नंबर दो सभी लोग को पसंद नहीं होता क्यूंकि इसमें गोमूत्र है और बनाना भी आसान नहीं. योग नंबर एक इजी है और सभी लोग यूज़ भी कर सकते हैं. योग नंबर 1 में रसायन औषधि है इसलिए इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए. मेरी विडियो देखने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टर बंधू अपने रोगियों पर इन योगों का प्रयोग कर यश प्राप्त करें. 

दो दोस्तों, वैद्य जी की डायरी में ये थी आज की जानकारी फ़ाइलेरिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे में. 




वैद्य जी की डायरी के दुसरे उपयोगी योग - 












loading...

22 May 2018

Bael Fruit or Wood Apple Benefits | बेल के फ़ायदे जानिए


बेल जो है गर्मी के मौसम में मिलने वाला फल है जो बेहतरीन दवा भी है. पका बेल को ऐसे भी खाया जाता है, इसका शर्बत भी बनाया जाता है और कुछ आयुर्वेदिक दवाएँ भी इस से बनाई जाती हैं. यह एसिडिटी, पेट की गर्मी, कब्ज़, डायरिया, Dysentery और पेट के कीड़ों को दूर करता है, तो आईये जानते हैं बेल के फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

बेल को हिंदी भाषी राज्यों में बेल के नाम से ही जाना जाता है जो हमारे देश भारत के अलावा, श्रीलंका, थाईलैंड, बांग्लादेश और दुसरे एशिया के देशों में भी पाया जाता है. इसे बेल, बिल्व, श्रीफल और अंग्रेजी में Wood Apple और Elephant Apple कहा जाता है. जबकि इसका वानस्पतिक नाम Aegle marmelos है. 

बेल जो है फाइबर रिच फ्रूट है, यह विटामिन्स, प्रोटीन और मिनरल्स से भरपूर होता है. आयुर्वेदिक दवाओं में बेल के फल और पत्तों का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है. 

बेल के फ़ायदे- 

बेल के पत्ते शुगर लेवल कम करने में बेहद असरदार हैं. डायबिटीज की आयुर्वेदिक दवाओं में इसे ज़रूर शामिल किया जाता है. 

बेल के फल के फ़ायदे जानने से पहले आप को एक इम्पोर्टेन्ट बात बता दूं कि कच्चे बेल और पके बेल दोनों की तासीर बिल्कुल अलग होती है. कच्चा बेल जो है एंटी डायरियल होता है यानि दस्त को रोकता है, जबकि पका बेल Laxative होता है यानी कब्ज़ को दूर करता है.

गर्मी के इस मौसम में पके बेल का शर्बत पीकर आप खुद को कूल रख सकते हैं. पके बेल को ऐसे ही खाएं या फिर शरबत बनाकर भी पी सकते हैं. 

बेल का शर्बत 🍹 - 

इसका शर्बत बनाने के लिए बेल के गुदे को पानी में मसलकर मोटी छलनी से छान ले और इसमें स्वादानुसार चीनी मिक्स कर दें. बस टेस्टी और हेल्दी बेल का शर्बत तैयार है. 

पका बेल खाने या इसका शर्बत पिने से पेट की गर्मी, एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, सीने की जलन, गैस और कब्ज़ दूर होती है. यह शरीर को तरावट देता है, बेल का शर्बत पिने से लू नहीं लगती है. 

बेल खाने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं और पेट में कीड़े होने से भी बचाता है. 

पके हुवे बेल के इस्तेमाल से पाइल्स या बवासीर में भी फ़ायदा होता है. 

यह शुगर को कण्ट्रोल करता है. शुगर के लिए इसके पत्ते सबसे ज़्यादा इफेक्टिव हैं. 
बेल कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और हार्ट को हेल्दी और फिर रखने में मदद करता है. यह Cardioprotective और हार्ट टॉनिक है.

एंटी ऑक्सीडेंट और विटामिन सी होने से यह एंटी एजिंग का काम करता है. स्किन का रूखापन दूर करता है.

यह दिमाग को शांति देता है और ब्रेन टॉनिक का भी काम करता है. तो दोस्तों, ये थे बेल के कुछ ख़ास फ़ायदे, अभी के इस मौसम में इसका इस्तेमाल कर फ़ायदा लीजिये. 

सावधानी- बेल का इस्तेमाल करते हुवे कुछ सावधानी भी रखनी चाहिए जैसे प्रेगनेंसी में और ब्रैस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाओं को इसका सेवन नहीं करना चाहिए. 


इसे भी जानिए - 





18 May 2018

Smritisagar Ras | स्मृतिसागर रस दिमाग की बीमारियों की बेजोड़ औषधि


स्मृतिसागर रस क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो एक बेहतरीन ब्रेन टॉनिक है. इसके इस्तेमाल से मेमोरी लॉस, Neuropathy, दिमाग की कमज़ोरी, बेहोशी, मृगी या एपिलेप्सी, पागलपन और हिस्टीरिया जैसी बीमारियाँ दूर होती हैं और बुद्धि और सिखने की क्षमता को यह बढ़ाता है. तो आइये जानते हैं स्मृतिसागर रस का कम्पोजीशन, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

स्मृतिसागर रस जैसा कि इसका नाम रखा गया है यानी यादाश्त या मेमोरी का समुन्दर. इसके इस्तेमाल से मेमोरी पॉवर बढ़ जाती है.

स्मृतिसागर रस के घटक या कम्पोजीशन - 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे कई तरह की चीज़ों से बनाया जाता है जैसे - शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक की कज्जली 20 ग्राम, शुद्ध हरताल, शुद्ध मैनशील, स्वर्णमाक्षिक भस्म और ताम्र भस्म प्रत्येक 10-10 ग्राम. भावना देने के लिए मीठी बच और ब्राह्मी के क्वाथ के अलावा ज्योतिष्मती का तेल भी चाहिए होता है. 


स्मृतिसागर रस निर्माण विधि - 

बनाने का तरीका यह है कि सभी चीजों को पत्थर के खरल में डालकर घोटें और सबसे पहले मीठी बच के काढ़े की 21 भावना दें और उसके बाद ब्रह्मी के क्वाथ की 21 भावना देने के बाद ज्योतिष्मती के तेल में घोंटकर 125mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. यही स्मृतिसागर रस है. 

स्मृतिसागर रस की मात्रा और सेवन विधि -

एक-एक गोली सुबह शाम घी या ब्राह्मी घृत से खाकर ऊपर से दूध  पीना चाहिए. 


स्मृतिसागर रस के फ़ायदे- 

दिमाग की कमज़ोरी, नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी को यह दूर करती है. यह दिमाग को ताक़त देती है और मेमोरी पॉवर, बुद्धि और सिखने की क्षमता को बढ़ा देती है.
ज़्यादा सोचने, चिंता करने, शोक, दुःख या फिर सर में चोट लगने की वजह से होने वाले मानसिक रोगों में असरदार है. 

मृगी या एपिलेप्सी में इसका ज़रूर सेवन करना चाहिए. हिस्टीरिया और पागलपन जैसी बीमारी में भी असरदार है. मृगी में इसके साथ में वातकुलान्तक रस, सारस्वत चूर्ण, सारस्वतारिष्ट और अश्वगंधारिष्ट जैसी दवाओं के साथ लॉन्ग टाइम तक लेने से बीमारी दूर हो जाती है. 

फेसिअल पैरालिसिस में भी इसका अच्छा रिजल्ट मिलता है ख़ासकर जब नाड़ियों में रक्त का थक्का जमने से पक्षाघात हुवा हो. 

कुल मिलाकर देखा जाये तो स्मृतिसागर रस ब्रेन के लिए एक बेहतरीन दवा है, यह मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस भी है. स्कूल लाइफ में मैं इसे यूज़ कर चूका हूँ. 

बेस्ट क्वालिटी की उच्च गुणवत्ता वाली औषधि उचित मूल्य में ख़रीदें हमारे स्टोर lakhaipur.in से – स्मृतिसागर रस 100 gram



इसे भी जानिए - 








16 May 2018

Nimbadi Churna | निम्बादि चूर्ण हर तरह के चर्मरोगों की बेजोड़ औषधि


निम्बादि चूर्ण जो है ऐसी आयुर्वेदिक दवा है जो हर तरह की स्किन डिजीज में असरदार है. खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी से लेकर एक्जिमा, सोरायसिस और कुष्ठरोग जैसी बड़ी बीमारियों को भी दूर कर देती है. तो आईये जानते हैं निम्बादि चूर्ण का कम्पोजीशन, बनाने का तरीका, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

निम्बादि चूर्ण के घटक या कम्पोजीशन-

इसके लिए चाहिए होता है नीम की छाल, गिलोय, हर्रे, आँवला, सोंठ, सोमराजी, वायविडंग, पीपल, अजवायन, बच, ज़ीरा, कुटकी, खैरसार, सेंधानमक, यवक्षार, हल्दी, दारूहल्दी, नागरमोथा, देवदार और कूठ सभी बराबर वज़न में. 

बनाने का तरीका यह होता है कि सभी को कूट-पीसकर कपड़छन चूर्ण बनाकर रख लें. यही निम्बादि चूर्ण है, यह भैषज्य रत्नावली का योग है. 

'
निम्बादि चूर्ण की मात्रा और सेवनविधि - 

दो से चार ग्राम तक सुबह शाम पानी से या फिर खदिरारिष्ट, मंजिष्ठारिष्ट जैसी दवाओं के साथ लेना चाहिए. 

निम्बादि चूर्ण के गुण -

यह रक्तशोधक है यानि इफेक्टिव ब्लड प्योरीफ़ायर है. Anti-allergic, Antibiotic और Anti-fungal जैसे गुणों से भरपूर होती है. 

निम्बादि चूर्ण के फ़ायदे -

यह हर तरह के चर्मरोगों या स्किन डिजीज की बेहतरीन दवा है. छोटे-मोटे फोड़े-फुंसी और खुजली से लेकर दाद, एक्जिमा, सोरायसिस और कुष्टव्याधि तक में यह दवा असरदार है. आयुर्वेदिक डॉक्टर लोग हर तरह के चर्मरोगों में इसका प्रयोग करते हैं. 

इन सब के अलावा आमवात की वजह से होने वाली सुजन, पांडू, कामला और गुल्म जैसे रोगों में भी असरदार है. 

चर्मरोगों में निम्बादि चूर्ण चूर्ण के साथ रस माणिक्य और गंधक रसायन जैसी दवा मिलाकर लेने से बेहतरीन रिज़ल्ट मिलता है, यह मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस भी है. 

बेस्ट क्वालिटी का निम्बादि चूर्ण ऑनलाइन खरीदें हमारे स्टोर lakhaipur.in से - 



   इसे भी जानिए -








11 May 2018

Narikela Lavana Benefits | नारिकेल लवण के गुण, उपयोग एवम प्रयोग विधि



नारिकेल-लवण आयुर्वेदिक औषधि है जो पित्त विकार, पेट दर्द और एसिडिटी जैसी प्रॉब्लम में बेहद असरदार है. तो आईये जानते हैं नारिकेल-लवण को बनाने का तरीका, इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

नारिकेल-लवण के घटक एवम निर्माण विधि- 

यह नारियल और सेंधा नमक के मिश्रण से बना होता है. इसे बनाने के लिए चाहिए होता है सेंधा नमक का चूर्ण और जटा निकला हुवा नारियल. 

बनाने का तरीका यह होता है कि जटा निकले हुवे पके नारियल में छेद कर उसका पानी निकाल दें और उस छेद से सेंधा नमक का चूर्ण भरकर, छेद बंदकर कपड़मिट्टी कर सुखा दें और इसके बाद महापुट में रखकर फूँक दें. पूरी तरह से ठण्डा होने पर ऊपर के जले काले भाग को हटाकर नमक को निकालकर पीसकर रख लें. यह नारिकेल लवण है. 

नारिकेल-लवण के गुण -

आयुर्वेदानुसार यह पाचक और  पित्त नाशक है, वात दोष का भी शमन करता है. Antacid और Anti-spasmodic जैसे गुणों से भरपूर है. 

नारिकेल-लवण के फ़ायदे - 

पित्त विकार, एसिडिटी, पेट का दर्द, खाना खाने के बाद होने वाला पेट का दर्द या परिणामशूल जैसी प्रॉब्लम में यह बेहद असरदार है. 

यह खाना हज़म करने में मदद करता है. कफज, पित्तज, वातज और सन्निपातज शूल यह हर तरह के पेट दर्द में असरदार है. 

नारिकेल-लवण की मात्रा और सेवन विधि - 

एक से दो ग्राम तक पानी के साथ या फिर आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह के अनुसार लेना चाहिए. इसे नवसादर, घी और यवक्षार के साथ भी लिया जाता है. नमक की मात्रा होने से हाई ब्लड प्रेशर वालों को नहीं लेना चाहिए. आयुर्वेदिक कम्पनियों का यह मिल जाता है, इसे ऑनलाइन भी ख़रीद सकते हैं. 


09 May 2018

Panchagavya Ghrita Benefits | पंचगव्य घृत के गुण, प्रयोग और निर्माण विधि


पंचगव्य घृत क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो मानसिक रोगों जैसे मिर्गी, मैनिया, अपस्मार, लिवर की बीमारी और बुखार जैसे कई तरह की बीमारियों को दूर करती है. तो आइये जानते हैं पंचगव्य घृत का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इतेमाल की पूरी डिटेल - 

पंचगव्य घृत का कम्पोजीशन - 

जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है पंचगव्य, पंच का मतलब पांच और गव्य का मतलब है गाय यानि गाय के पाँच चीज़ों से बनी हुयी घी.

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसे गाय से प्राप्त होने वाली पांच चीजें मिलाकर बनाया जाता है जैसे गोमय स्वरस यानि गाय गोबर का एक्सट्रेक्ट, गाय का दूध, गाय की दही, गोमूत्र प्रत्येक एक-एक भाग और गाय का घी चौथाई भाग. 

बनाने का तरीका यह होता है कि सभी चीजों को मिलाकर तब तक पकाया जाता है जब तक कि सिर्फ घी बचे. इसके बाद ठण्डा होने पर छानकर रख लिया जाता है, यही पंचगव्य घृत है. 

गोमय और गोमूत्र से बना होने से कई लोग इसे पसंद नहीं करते, पर जो भी हो आयुर्वेद में ऐसी चीज़ें होती ही हैं. 


पंचगव्य घृत के गुण - 

आयुर्वेदानुसार यह त्रिदोष नाशक है, नर्वस सिस्टम पर इसका सबसे ज़्यादा असर होता है. यह Anti-epileptic, Anticonvulsant, रक्त शोधक या ब्लड प्योरीफ़ायर और लिवर प्रोटेक्टिव जैसे गुणों से भरपूर होती है. 

पंचगव्य घृत के फ़ायदे- 

पंचकर्म के स्नेहन कर्म में लिए इसे प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है. पंचकर्म स्पेशलिस्ट रोगी की कंडीशन के अनुसार इसका प्रयोग कराते हैं. 

नर्वस सिस्टम के रोग जैसे नींद नहीं आना, मैनिया, मिर्गी या एपिलेप्सी, अपस्मार या पागलपन, हिस्टीरिया और बुखार जैसी बीमारियों में इसका प्रयोग होता है. 

यह नर्वस सिस्टम, ब्रेन, आँख और बॉडी के दुसरे ऑर्गन को ताक़त देती है. 

लिवर की बीमारी जैसे पांडू, कमला, कब्ज़ और आँतों का सूखापन को दूर करती है. 

पंचगव्य घृत की मात्रा और सेवन विधि - 

चौथाई से आधा स्पून तक सुबह शाम गुनगुने पानी या दूध से लेना चाहिए. इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ही लें. शुगर, कोलेस्ट्रॉल और हार्ट डिजीज में सावधानी से यूज़ करना चाहिए. ज्यादा डोज़ होने पर दस्त और पेट की खराबी हो सकती है. आयुर्वेदिक कम्पनियों की यह मिल जाती है. ऑनलाइन ख़रीदें निचे दिये लिंक से - 



इसे भी जानिए - 


07 May 2018

Shatavaryadi Churna | शतावर्यादि चूर्ण के फ़ायदे जानिए


शतावर्यादि चूर्ण यौनशक्ति वर्धक आयुर्वेदिक औषधि है जो यौन कमजोरी और हर तरह  पुरुष रोगों को दूर करती है. तो आईये जानते हैं शतावर्यादि चूर्ण का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

शतावर्यादि चूर्ण के घटक और निर्माण विधि - 

जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है इसमें शतावर के अलावा दूसरी जड़ी-बूटियाँ भी होती हैं. इसके कम्पोजीशन की बात करें तो इसमें पाँच चीज़ें मिली होती हैं- 
शतावर, अश्वगंधा, गोखुरू, सफ़ेद मुसली और कौंच बीज(छिल्का निकले हुवे) सभी बराबर वज़न में.
सभी को कूट-पीसकर चूर्ण बना लिया जाता है, यही इसे बनाने का तरीका है. 

शतावर्यादि चूर्ण के गुण -

यह पौष्टिक, बाजीकारक और वीर्यवर्धक है. वीर्यदोष को दूर कर गाढ़ा, हेल्दी वीर्य बनाता है. 

शतावर्यादि चूर्ण के फ़ायदे -

यौन शक्ति बढ़ाने वाली यह एक नेचुरल दवा है. इसके इस्तेमाल से पॉवर-स्टैमिना बढ़ता है. शुक्राणुओं की कमी, वीर्य का पतलापन और शीघ्रपतन जैसे हर तरह के पुरुष रोग दूर होते हैं.

नसों की कमज़ोरी दूर करता है और निर्दोष वीर्य का निर्माण करता है जिस से Male Infertility की समस्या दूर होती है.

चिंता, तनाव और थकान को दूर करता है, एंटी-एजिंग गुणों से भरपूर है. 

शतावर्यादि चूर्ण की मात्रा और सेवन विधि - 

एक स्पून या तीन से पाँच ग्राम तक सुबह और सोने से एक घंटा पहले दूध से लेना चाहिए. या फिर डॉक्टर की सलाह के अनुसार. इसका सेवन करते हुवे ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, तभी पूरा लाभ मिलता है. आयुर्वेदिक कम्पनियों का यह बना बनाया भी मिल जाता है, इसे ऑनलाइन ख़रीद सकते हैं निचे दिए लिंक से- 




  इसे भी जानिए - 






loading...

06 May 2018

Chintamani Chaturmukh Ras | चिन्तामणि चतुर्मुख रस | Lakhaipur.com


चिन्तामणि चतुर्मुख रस क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो एक स्वर्णयुक्त औषधि है जिसके इस्तेमाल से मृगी, हिस्टीरिया, पागलपन और पैरालाइसीस जैसे वात रोग  भी दूर होते हैं. तो आइये जानते हैं चिन्तामणि चतुर्मुख रस के घटक, निर्माणविधि इसके फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

चिन्तामणि चतुर्मुख रस के घटक और निर्माण विधि - 

इसके लिए चाहिए होता है रस सिन्दूर- 40 ग्राम, लौह भस्म, अभ्रक भस्म-प्रत्येक 20-20 ग्राम और स्वर्ण भस्म- 10 ग्राम.

बनाने का तरीका यह है कि सबसे पहले रस सिन्दूर को खरल करें और दुसरे भस्मों को मिक्स कर घृतकुमारी के रस में मर्दन कर गोला बना लें और इस गोले को एरण्ड के पत्तों में लपेटकर धान के ढेर में तीन दिनों तक दबाकर रख दें. 

इसके बाद एरण्ड के पत्तों को हटाकर अच्छी तरह से खरलकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. बस चिन्तामणि चतुर्मुख रस तैयार है. 

चिन्तामणि चतुर्मुख रस के गुण -

आयुर्वेदानुसार यह बेहतरीन वात नाशक और योगवाही रसायन है. Anti-epileptic, Anticonvulsant यही आक्षेप या दौरा दूर करने वाला, कार्डियक टॉनिक, ब्रेन टॉनिक, नसों की कमज़ोरी दूर करने वाला और पौष्टिक गुणों से भरपूर होता है.


चिन्तामणि चतुर्मुख रस के फ़ायदे- 

स्वर्ण भस्म और दुसरे भस्मों के मिला होने से यह तेज़ी से असर करने वाली रसायन औषधि है. इसके इस्तेमाल से मृगी या एपिलेप्सी, कठिन से कठिन उन्माद, अपस्मार या पागलपन और हिस्टीरिया जैसे रोग दूर होते हैं. 

लकवा, पक्षाघात, फेसिअल पैरालिसिस, धनुर्वात या किसी भी तरह का पैरालिसिस हो तो इस से दूर होता है. 

यह ह्रदय को शक्ति देता है और हार्ट की बीमारियों को दूर करता है. पौष्टिक गुण होने से बीमारी के बाद होने वाली कमज़ोरी को भी दूर करता है. 


चिन्तामणि चतुर्मुख रस की मात्रा और सेवन विधि - 

एक-एक गोली सुबह शाम त्रिफला चूर्ण और शहद के साथ या फिर रोगानुसार उचित अनुपन से आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से लेना चाहिए. मृगी, हिस्टीरिया और पागलपन जैसे रोगों में जटामांसी क्वाथ, महा चैतस घृत, ब्राह्मी घृत या पञ्चगव्य घृत के साथ लेने से अच्छा लाभ होता है. वात रोगों जैसे लकवा, पक्षाघात में महा रस्नादी क्वाथ या रसोन घृत के साथ लेना चाहिए. 


इसे भी जानिए - 





04 May 2018

Chintamani Ras Benefits | चिन्तामणि रस के गुण, निर्माण और प्रयोग विधि


चिन्तामणि रस क्लासिकल आयुर्वेदिक मेडिसिन है जो हर तरह के ह्रदय रोग या हार्ट डिजीज, वात वाहिनी नाड़ियों की कमज़ोरी और हिस्टीरिया जैसी बीमारियों में बेहद असरदार है, तो आइये जानते हैं चिन्तामणि रस के बारे में पूरी डिटेल -

चिन्तामणि रस के घटक और निर्माण विधि - 

इसे बनाने के लिए चाहिए होता है शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, अभ्रक भस्म, लौह भस्म, वंग भस्म, शुद्ध शिलाजीत और अम्बर प्रत्येक 10-10 ग्राम, स्वर्ण भस्म- 2.5 ग्राम, मोती पिष्टी और चाँदी भस्म 5-5 ग्राम.

बनाने का तरीका यह है कि सबसे पहले पारा-गंधक को खरल करें उसके बाद दूसरी चीज़ें मिलाकर चित्रकमूल क्वाथ और भृंगराज के रस में एक-एक दिन तक घुटाई करें. अब इसके बाद अर्जुन के छाल के काढ़े में सात दिनों तक खरल करने के बाद एक-एक रत्ती या 125mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें, यही चिन्तामणि रस है. 

चिन्तामणि रस के फ़ायदे  - 

हर तरह की हार्ट की बीमारियों में यह बेहद असरदार है. हार्ट की कमजोरी, हार्ट का दर्द, दिल की धड़कन बढ़ा होना जैसी प्रॉब्लम में इसका इस्तेमाल किया जाता है.

ब्लड प्रेशर बढ़ा होने, हार्ट की बीमारी के साथ लिवर बढ़ने और पेट की प्रॉब्लम में असरदार है. 

वात वाहिनी नाड़ियों की कमज़ोरी दूर करता है, जिस से हिस्टीरिया और दौरे पड़ने वाले रोगों में भी अच्छा फ़ायदा होता है. 

चिन्तामणि रस की मात्रा और सेवन विधि - 

एक-एक गोली सुबह शाम शहद से या फिर रोगानुसार अनुपान से देना चाहिए. जैसे- दिल की बीमारीओं में खमीरा गाओज़बान, आँवला मुरब्बा के साथ. हाई ब्लड प्रेशर में मोती पिष्टी के साथ, वात रोगों में बलामूल क्वाथ के साथ. 

चूँकि यह रसायन औषधि है इसलिए इसे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से सही डोज़ में ही लेना चाहिए. डाबर, बैद्यनाथ जैसी आयुर्वेदिक कंपनियों का यह मिल जाता है. इसे ऑनलाइन भी ख़रीदा जा सकता है. इसके मिलते जुलते नाम वाली एक दूसरी औषधि है चिन्तामणि चतुर्मुख रस जिसकी जानकारी जल्द ही दी जाएगी. 

इसे भी जानिए - 






03 May 2018

Stretch Marks Removal Treatment | स्ट्रेच मार्क्स दूर करने की चिकित्सा - वैद्य जी की डायरी - 8


वैद्य जी की डायरी में आज बताने वाला हूँ स्ट्रेच मार्क्स दूर करने वाले आयुर्वेदिक योग के बारे में. प्रेगनेंसी में महिलाओं को पेट और जाँघ के आस-पास जो धारियाँ हो जाती हैं उसे ही स्ट्रेच मार्क्स कहते हैं, तो आईये जानते हैं इसे दूर करने वाले योग की पूरी डिटेल - 

स्ट्रेच मार्क्स या धारी दूर करने वाला आयुर्वेदिक योग - 

इसके लिए आपको चाहिए होगा नीम की पत्ती, बेर की पत्ती और काली तुलसी की पत्तियाँ तीनों बराबर मात्रा में. और मंजीठ इन सब के बराबर. मंजीठ को मंजिष्ठा भी कहते  हैं जो लाल रंग की पतली-पतली जड़ होती है, यह पंसारी की दुकान में मिल जाती है. 

अब सभी को पानी के साथ कूट-पीसकर गाढे लेप की तरह बना लें, ठीक वैसा ही जैसा लगाने के लिए मेहंदी पीसी जाती है. 

प्रयोग विधि- 

इस लेप को धारी वाली जगह पर लगाना है, जब लेप सुख जाएँ तो भीगे कपड़े से पोंछ लेना चाहिए. इसे हफ़्ता में तीन-चार बार करें. प्रेगनेंसी के सातवें महीने से इसके यूज़ करने से स्ट्रेच मार्क्स नहीं होने देता. और अगर स्ट्रेच मार्क्स हो भी गया हो तो इसके प्रयोग से मिट जाता है. 

प्रेगनेंसी के बाद भी स्ट्रेच मार्क्स मिटाने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. बिल्कुल सेफ़ प्रयोग है, किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होता है. मोटापा की वजह से होने वाला स्ट्रेच मार्क्स भी दूर हो जाता है.

इसे भी जानिए - 





02 May 2018

Sarpgandha Vati Benefits | सर्पगंधा वटी नीन्द लाने वाली बेजोड़ औषधि


सर्पगंधा वटी एक ऐसी दवा है जो हाई ब्लड प्रेशर को कम करती है, अच्छी नीन्द लाती है. इसके इस्तेमाल से अनिद्रा या नींद नहीं आना, अपस्मार-उन्माद यानि पागलपन जैसे मानसिक रोग दूर होते हैं, तो आईये जानते हैं सर्पगंधा वटी का कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी डिटेल - 

सर्पगंधा वटी के घटक और निर्माण विधि - 

इसे सर्पगंधाघन वटी भी कहते हैं. यहाँ सिद्ध प्रयोग संग्रह का नुस्खा बता रहा हूँ. इसे बनाने के लिए चाहिए होता है सर्पगंधा 10 किलो, खुरासानी अजवाइन 2 किलो, जटामांसी और  भांग का चूर्ण एक-एक किलो और पिपलामूल 200 ग्राम. 

बनाने का तरीका यह है कि सर्पगंधा को मोटा-मोटा कूट लें और पीपलामूल के अलावा सभी चीजों को 118 लीटर पानी में शाम को भीगा दें और सुबह इसका क्वाथ बनायें. जब पानी 25 लीटर बचे तो ठंडा होने पर छान ले और फिर कड़ाही में डालकर मंद आँच में हलवे की तरह गाढ़ा होने तक पकाएं. 

अब इसे गोली बनाए लायक होने तक धुप में सुखा दें और सबसे लास्ट में पीपलामूल का चूर्ण मिक्स कर दो-दो रत्ती की गोलियां बनाकर सुखा कर रख लें. मूल ग्रन्थ के अनुसार यहाँ बताई गई मात्रा बहुत ज़्यादा है, इसी अनुपात में आप कम मात्रा में भी बना सकते हैं. वैसे यह बनी बनाई भी मिल जाती है. 

सर्पगंधा वटी की मात्रा और सेवन विधि - 

2 से 3 गोली रात में सोने से पहले दूध से लेना चाहिए.

सर्पगंधा वटी के फ़ायदे - 

यह दिमाग को शांति देने और नींद लाने वाली अच्छी दवा है. यह हाई बी.पी. की कंडीशन में बेहद असरदार है. इसके इस्तेमाल से उन्माद, अपस्मार या पागलपन और हिस्टीरिया जैसे रोग दूर होते हैं. 

नींद नहीं आना या अनिद्रा में -  

दो गोली सोने से एक घंटा पहले दूध से देना चाहिए. अगर दो गोली से फ़ायदा न हो तो तीन से चार गोली तक एक बार में लिया जा सकता है. 

हाई ब्लड प्रेशर में - 

एक से दो गोली सुबह शाम पानी से लेना चाहिए. 
उन्माद, अपस्मार और पागलपन में - दो-दो गोली रोज़ तीन बार पानी से देने से अच्छा लाभ मिलता है. 

हिस्टीरिया में - 

एक से दो गोली सुबह शाम सारस्वतारिष्ट दो स्पून + अश्वगंधारिष्ट दो स्पून मिक्स कर देना चाहिए. 

सर्पगंधा वटी के साइड इफेक्ट्स - 

यह उष्णवीर्य या तासीर में गर्म दवा है और इस से नींद आती है, इसीलिए सही डोज़ में ही इसका इस्तेमाल करना चाहिए नहीं तो नुकसान हो सकता है. 

इसे भी जानिए -