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20 January 2022

AYUSH kwath benefits | आयुष क्वाथ के फ़ायदे

 

ayush kwath benefits

आयुष क्वाथ क्या है?

चार तरह की जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बनी हुयी औषधि को आयुष क्वाथ का नाम दिया गया है. इसे भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने प्रचलित किया है. 

इसके घटक की बात करें तो इसमें तुलसी के पत्ते चार भाग, दालचीनी दो भाग, काली मिर्च एक भाग और सोंठ दो भाग का मिश्रण होता है. 

आयुष क्वाथ सेवन विधि 

3 ग्राम इस मिश्रण को लेकर 150 ML में पानी में अच्छी तरह से उबालकर या काढ़ा बनाकर इसमें थोड़ा गुड़ मिक्स कर चाय की तरह पीना चाहिए. इसमें निम्बू का रस भी मिला सकते हैं.

आयुष क्वाथ के फ़ायदे 

इम्युनिटी बढ़ाने और वायरल रोगों से बचाव करने में यह काफ़ी असरदार है. कोरोना काल में यह काफ़ी प्रचलित हुआ है. 

कम से कम रोज़ एक बार इसका सेवन करते रहने से आप मौसम बदलने से होने वाली परेशानी जैसे सर्दी, जुकाम, खाँसी, बुखार इत्यादि से बच सकते हैं. 

टाइफाइड, मलेरिया, चिकनगुनिया और डेंगू जैसी बीमारियों से बचाव में भी सहायक है. 

कुल मिलाकर देखा जाये तो यह बहुत ही सिंपल पर असरदार कॉम्बिनेशन है जिसे हर उम्र के लोग सेवन कर सकते हैं. 

ऑनलाइन खरीदने का लिंक दिया गया है- Buy AYUSH kwath online





06 January 2022

Dhanyapanchaka Kwath & Dhanyapanchakarishta | धान्यपंचक क्वाथ और धान्यपंचकारिष्ट

 

dhanyapanchak kwath

आज की जानकारी है धान्यपंचक के बारे में. इसका क्वाथ बनाकर और रिष्ट बनाकर दोनों तरह से प्रयोग किया जाता है तो आइये धान्यपंचक क्वाथ और धान्यपंचकारिष्ट के गुण, उपयोग और निर्माण विधि के बारे में सबकुछ विस्तार से जानते हैं- 

सबसे पहले जानते हैं धान्यपंचक क्वाथ के बारे में 

धान्यपंचक क्वाथ के घटक 

इसके लिए पांच चीज़ लेनी होती है धनिया, खस, बेल गिरी, नागरमोथा और सोंठ. सभी को बराबर वज़न में लेकर मोटा-मोटा कूटकर रख लें. 

10 ग्राम इसके जौकूट चूर्ण को 100 ml पानी उबालना होता है. जब लगभग 40 ml पानी बचे तो ठण्डा होने पर छानकर रोगी को पीना चाहिए. 

इसी तरह से रोज़ इसकी दो से तीन मात्रा तक लेनी चाहिए.

धान्यपंचक क्वाथ के फ़ायदे 

अतिसार यानी दस्त या लूज़ मोशन होने पर इसका प्रयोग किया जाता है. 

रक्त अतिसार जिसमे दस्त में खून आता हो और पित्तज अतिसार में सोंठ की जगह सौंफ मिलाकर क्वाथ बनाकर सेवन करना चाहिए. 

यह दीपन-पाचन और ग्राही गुणों से भरपूर होता है. 

धान्यपंचकारिष्ट 

धान्यपंचकारिष्ट के घटक भी वही हैं बस इसकी निर्माण विधि अलग होती है. 

धान्यपंचकारिष्ट निर्माण विधि 

बराबर वज़न में मिली हुयी सभी पाँच चीज़(धनिया, खस, बेल गिरी, नागरमोथा और सोंठ) का जौकूट चूर्ण डेढ़ किलो लेकर 64 लीटर पानी में क्वाथ करें, जब 16 लीटर पानी बचे इसमें 6 किलो गुड़ और आधा किलो धाय फुल मिलाकर चिकने पात्र में एक महिना के लिए संधान के लिए छोड़ दिया जाता है. एक महिना बाद इसे छानकर बोतलों में भरकर रख लिया जाता है. यह सिद्ध योग संग्रह का योग है. 

धान्यपंचकारिष्ट की मात्रा और सेवन विधि 

15 से 30 ML तक सुबह-शाम बराबर मात्रा में पानी मिलाकर लेना चाहिए

धान्यपंचकारिष्ट के फ़ायदे 

 अतिसार, प्रवाहिका और संग्रहणी में इसके सेवन से लाभ होता है. 

यह भी दीपन-पाचन और ग्राही है, इसके फ़ायदे भी धान्यपंचक क्वाथ वाले ही हैं बल्कि उस से कहीं बेहतर. 

तो दोस्तों, यह थी आज की जानकारी धान्यपंचक क्वाथ और धान्यपंचकारिष्ट के बारे में



15 December 2021

Yakuti Rasayan | याकूती रसायन

 

yakuti ras

आज की जानकारी याकूती रसायन के बारे में. इसे याकूती रस के नाम से भी जाना जाता है यह हार्ट प्रोटेक्टिव और Nervine टॉनिक है जो हृदय की निर्बलता, सन्निपात और मस्तिष्क की दुर्बलता जैसे रोगों में प्रयोग की जाती है. तो आईये जानते हैं याकूती रसायन के गुण, उपयोग और निर्माण विधि के बारे में सबकुछ विस्तार से - 

याकूती रसायन एक स्वर्णयुक्त आयुर्वेदिक औषधि है जो अम्बर, केशर जैसे बहुमूल्य चीज़ों के मिश्रण से बनती है. 

याकूती रसायन के घटक या कम्पोजीशन 

 इसके घटक या कम्पोजीशन की बात करें तो इसे बनाने के लिए चाहिए होता है माणिक्य पिष्टी, पन्ना पिष्टी, प्रवाल पिष्टी, कहरवा पिष्टी, चन्द्रोदय, सोने का वर्क़, अम्बर, कस्तूरी, आबेरेशम कतरा हुआ और केशर प्रत्येक 20-20 ग्राम, बहमन सफ़ेद, बहमन सुर्ख, जायफल, लौंग और सफ़ेद मिर्च का कपड़छन चूर्ण प्रत्येक 10-10 ग्राम और गुलाब जल प्रयाप्त मात्रा में.

याकूती रसायन की निर्माण विधि 

सबसे पहले चन्द्रोदय को खरल करें इसके बाद कस्तूरी और अम्बर को छोड़कर दूसरी सभी चीज़ मिक्स कर लगातार 21 दिनों तक गुलाब जल में खरल करना होता है. अम्बर और कस्तूरी लास्ट दिन में मिक्स कर खरलकर 125mg की गोलियां बनाकर छाया में सुखाकर रख लिया जाता है. यही याकूती रसायन या याकूती रस है. आज के समय में कस्तूरी नहीं मिलती, जिस से इसका वैसा लाभ नहीं मिलता जैसा पहले के समय में वैद्यगण इसे बनाकर प्रयोग करते थे. 

इसे ऑनलाइन ख़रीदने का लिंक - 

Baidyanath Yakuti Ras (10Tablet) 

Baidyanath Yakuti Ras 

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याकूती रसायन की मात्रा और सेवन विधि 

एक-एक गोली सुबह-शाम शहद, खमीरा गाओज़बाँ या उचित अनुपान से 

याकूती रसायन के गुण 

यह वात और पित्त नाशक है, तासीर में शीतल है. रसायन, हृदय और मस्तिष्क को बल देने वाला और चिंता-तनाव नाशक गुणों से भरपूर होता है. 

याकूती रसायन के फ़ायदे 

  • हृदय की दुर्बलता, हृदय का अनियमित स्पन्द, थोड़ा सा भी चलने पर दम फूलना, घबराहट, पसीना आना जैसे हार्ट की कमज़ोरी से  होने वाले सभी लक्षणों में इसके सेवन से लाभ होता है. 
  • वातज और पित्तज सन्निपात में वैद्यगण इसका प्रयोग करते हैं. 
  • अत्यधिक मानसिक कार्य करने से दिमाग कमज़ोर होना, भूलने की बीमारी, आलस्य, क्रोध, शक्की होना, पाचन ख़राब हो जाने में इसके सेवन से लाभ होता है. 
  • डिप्रेशन, नींद नहीं आना, जीवन से निराश होना इत्यादि मानसिक विकारों में भी लाभकारी है. 
  • अधीक वीर्य-स्राव और शुक्रक्षय से उत्पन्न पुरुष रोगों में भी इसके सेवन से लाभ होता है.
  • हार्ट, ब्रेन और नर्वस सिस्टम पर इसका अच्छा प्रभाव होता है, तो इसी को ध्यान में रखकर इसका उपयोग करना चाहिए. इसे वैद्य जी की सलाह से ही सेवन करें. 

तो यह थी आज की जानकारी याकूती रसायन के बारे में. इसके बारे में कोई सवाल हो तो कमेंट कर पूछिये 



10 December 2021

Pipalyasava Benefits | पिपल्यासव के फ़ायदे

 

pipalyasavam

इसका नाम आपने शायेद ही सुना होगा, क्यूंकि यह अधीक प्रसिद्ध औषधि नहीं है. इसे साउथ इंडिया में पिपल्यासवम के नाम से जाना जाता है, तो आईये पिपल्यासव के घटक, निर्माण विधि और गुण-उपयोग के बारे में सबकुछ विस्तार से जानते हैं. 

पिपल्यासव 

जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है कि आसव या लिक्विड फॉर्म वाली औषधि है जिसका जिसका मुख्य घटक पिप्पली है. 

पिपल्यासव के गुण 

यह कफ़ और वात नाशक और पित्त वर्द्धक है. यह अग्निवर्द्धक और पाचक है, मतलब पाचन शक्ति तेज़ करने वाला और भूख बढ़ाने वाला है. 

पिपल्यासव के फ़ायदे 

मूल ग्रन्थ के अनुसार इसके सेवन से उदर रोग ग्रहणी, संग्रहणी, गुल्म, पांडू, अर्श, क्षय इत्यादि नष्ट होते हैं. 

जीर्ण ज्वर, मन्दाग्नि और कास-श्वास से इसके सेवन से लाभ होता है. 

खाँसी, ब्रोंकाइटिस, IBS, बवासीर, खून  की कमी, गैस, खाने में रूचि नहीं होना, भूख नहीं लगना, फैटी लिवर, लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना और TB, Phthisis जैसे रोगों में सहायक औषधि के रूप में इसका सेवन कर सकते हैं. 

पिपल्यासव की मात्रा और सेवन विधि 

15 से 30 ML तक बराबर मात्रा में पानी मिलाकर सेवन करना चाहिए. यह ऑलमोस्ट सुरक्षित औषधि है, पित्तज प्रकृति वालों और जिनका पित्त दोष बढ़ा हो उनको इसका सेवन नहीं करना चाहिय

पिपल्यासव के घटक और निर्माण विधि 

भैषज्य रत्नावली का यह योग है, आपकी जानकारी के लिए इसके घटक और निर्माण विधि बता दे रहा हूँ- 

इसे बनाने के लिए चाहिए होता है - पीपल, काली मिर्च, हल्दी, चव्य, चित्रकमूल, नागरमोथा, विडंग, सुपारी, जलजमनी, आँवला, एलुआ, खस, सफ़ेद चन्दन, कूठ, लौंग, इलायची, दालचीनी, तेजपात, तगर, जटामांसी, प्रियंगु और नागकेशर प्रत्येक 20-20 ग्राम, धाय के फुल आधा किलो, मुनक्का 3 किलो, गुड़ 15 किलो और पानी 25 लीटर 

निर्माण विधि यह है कि सभी जड़ी-बूटियों को जौकूट कर पानी में गुड़ घोलकर मिला दें, धाय के फुल को नहीं कुटना चाहिए. इसके बाद चीनी मिट्टी के बर्तन में डालकर इसका मुंह बंद कर एक महिना के लिए संधान के लिए रख दिया जाता है. एक महीने के बाद इसे छानकर बोतलों में भर लिया जाता है. यही पिपल्यासव या पिपल्यासवम है. 

यह बना हुआ मार्केट में उपलब्ध है जिसका लिंक दिया गया है. 

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05 December 2021

Hiranyagarbh Pottli Ras | हिरण्यगर्भ पोट्टली रस

 

Hiranyagarbh Pottli Ras

यह एक शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है जिसका वर्णन 'भैषज्य रत्नावली' नामक आयुर्वेदिक ग्रन्थ में मिलता है. यह स्वर्णयुक्त रसायन औषधि है, तो आईये इसके गुण-धर्म, घटक, निर्माण विधि और उपयोग के बारे सबकुछ विस्तार से जानते हैं - 

हिरण्यगर्भ पोट्टली रस 

इसके घटक या इनग्रीडेंट की बात करें तो इसके निर्माण के लिए चाहिए होता है शुद्ध पारा 10 ग्राम, स्वर्ण भस्म 20 ग्राम, शुद्ध गंधक और कपर्दक भस्म प्रत्येक 30 ग्राम, मोती भस्म 40 ग्राम, शँख भस्म 40 ग्राम और टंकण भस्म 2.5 ग्राम 

हिरण्यगर्भ पोट्टली रस निर्माण विधि 

आपकी जानकारी के लिए निर्माण विधि बता रहा हूँ, सबके लिए इसका निर्माण करना संभव नहीं-

सबसे पहले शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक को खरलकर कज्जली बनाकर दुसरे भस्मों को मिक्स कर निम्बू के रस में घुटाई किया जाता है. इसके बाद इसकी टिकिया बनाकर सुखाकर सम्पुट में कपड़मिट्टी कर 'गजपुट' की अग्नि दी जाती है. बाद में इसे खरलकर रख लिया जाता है. यही हिरण्यगर्भ पोट्टली रस रस कहलाता है. 

हिरण्यगर्भ पोट्टली रस की मात्रा और सेवन विधि 

125 मिलीग्राम से 250 मिलीग्राम तक काली मिर्च और विषम मात्रा में घी और शहद के साथ. या वैद्य जी की सलाह से रोगानुसार उचित अनुपान के साथ ही इसका सेवन करना चाहिए.

हिरण्यगर्भ पोट्टली रस के गुण 

यह विशेष रूप से वात-कफ़ नाशक है. उचित अनुपान से सभी रोगों में इसका प्रयोग कर सकते हैं. मूल ग्रन्थ के अनुसार यह रसायन अग्निमान्ध, संग्रहणी, श्वास, कास, अर्श, पीनस, अतिसार, पांडू, शोथ, उदररोग, विषम ज्वर, यकृत-प्लीहा रोग नाशक है. सन्निपातिक रोगों में अमृत के सामान गुणकारी कहा गया  है. 

हिरण्यगर्भ पोट्टली रस के फ़ायदे 

शरीर में वात और कफ़ की वृद्धि होने या विकृति होने पर इसका सफल प्रयोग कर सकते हैं. 

जैसे कफ़ की वृद्धि होने पर भूख न लगना, पाचन की कमजोरी, आलस्य, कब्ज़, उल्टी जैसा लगना, खाने में रूचि नहीं होना जैसे लक्षण होने पर इसके सेवन से लाभ होता है. 

अतिसार या दस्त और संग्रहणी में इसके सेवन से विशेष लाभ होता है. आँतों पर इसका अच्छा प्रभाव होता है, आँतों को मज़बूत बनाता है. 

टी. बी., शारीरिक शक्ति की कमज़ोरी में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं. 

चूँकि यह स्वर्णयुक्त रसायन औषधि है तो यह शरीर के रोगों को दूर करने में समर्थ है, बस रोग और रोगी की दशा के अनुसार उचित अनुपान और औषधियों के साथ वैद्यगण इसका प्रयोग कराते हैं. 

इसे स्थानीय वैद्य जी की सलाह से और उनकी देख-रेख में ही सेवन करें. 



02 December 2021

Bilwasava | बिल्वासव के फ़ायदे

 

bilwasava benefits

जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है बिल्व यानी बेल से बनी हुयी आसव-अरिष्ट केटेगरी वाली तरल रूप वाली औषधि. इसका नाम ही बताता है कि बेल इसका मुख्य घटक या मेन इन्ग्रीडेंट है. 

बिल्वासव के घटक या कम्पोजीशन 

इसके कम्पोजीशन की बात करें तो यह कुछ इस तरह से है - कच्चे बेल का गूदा 10 किलो, गुड़ 7.5 किलो, धाय के फुल 1 किलो, नागकेशर 400 ग्राम, काली मिर्च 200 ग्राम, लौंग 200 ग्राम और कपूर 50 ग्राम, क्वाथ बनाने के लिए पानी 80 लीटर 

बिल्वासव निर्माण विधि 

इसे बनाकर यूज़ करना सबके लिए संभव नहीं, बस आपकी जानकारी के लिए बता दे रहा हूँ. बेल के गूदे को पानी में डालकर 20 लीटर पानी बचने तक उबालें. इसके बाद ठण्डा होने पर छानकर दूसरी सभी चीजें मिक्स कर चीनी मिट्टी के घड़े में डालकर अच्छी तरह से सील कर रख दिया जाता है. एक महिना के बाद संधान होने पर कपड़े से छानकर काँच की बोतलों में भरकर रख लिया जाता है. यही बिल्वासव

है. 

बिल्वासव की मात्रा और सेवन विधि 

15 से 30 ml तक रोज़ दो से तीन बार तक भोजन के बाद. या फिर स्थानीय वैद्य जी की सलाह के अनुसार ही सेवन करना चाहिए 

बिल्वासव के गुण 

पाचक, संग्राही, अग्निवर्द्धक और आमपाचक जैसे गुणों से भरपूर होता है

बिल्वासव के फ़ायदे 

अपच, अतिसार, संग्रहणी में ही इसका प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है.

बार-बार दस्त होना, लूज़ मोशन होना और आँतों की कमज़ोरी में इसका प्रयोग किया जाता है.

आँव आना, संग्रहणी, IBS में इसके सेवन से लाभ होता है

पाचन शक्ति को ठीक करता है, भूख बढ़ाता है

IBS में इसे दूसरी औषधियों के साथ सहायक औषधि के रूप में ले सकते हैं. जिनको आसव-अरिष्ट वाली औषधि सूट नहीं करती है उनको इसकी जगह पर 'बिल्वादि चूर्ण' या 'कुटज बिल्वादिघन वटी' जैसी औषधि लेनी चाहिए. 

बिल्वासव ऑलमोस्ट सुरक्षित औषधि है, इसके सेवन से किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होता है. 

बिल्वासव आप घर बैठे प्राप्त कर सकते हैं, ऑनलाइन ख़रीदने का लिंक  दिया गया है.  

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28 November 2021

Navayas Mandur | नवायस मण्डूर के गुण उपयोग और निर्माण विधि

 

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आयुर्वेद की यह प्रसिद्ध औषधि है जिसे नवायस मण्डूर और नवायस लौह के नाम से भी जाना जाता है. इन दोनों में बस कम्पोजीशन का थोड़ा फ़र्क होता है, तो आईये इसके बारे में सबकुछ जानते हैं - 

नवायस मण्डूर के घटक या कम्पोजीशन 

सोंठ, पीपल, काली मिर्च, हर्रे, बहेड़ा, आँवला, नागरमोथा, वायविडंग और चित्रकमूल छाल यह सभी नौ जड़ी-बूटियाँ समान भाग लेकर बारीक कपड़छन चूर्ण बना लिया जाता है. इसके बाद इस चूर्ण के कुल वज़न के बराबर उत्तम क्वालिटी का मण्डूर भस्म मिक्स कर तीन दिनों तक खरल करने से औषधि तैयार हो जाती है. 

नवायस मण्डूर की मात्रा और सेवन विधि 

एक-एक ग्राम सुबह-शाम घी, शहद, छाछ या फिर रोगानुसार उचित अनुपान के साथ 

नवायस मण्डूर के गुण 

आयुर्वेदानुसार यह पाचक, दीपक, शोथनाशक, रसायन और रक्तवर्द्धक जैसे गुणों से भरपूर होता है. 

नवायस मण्डूर के फ़ायदे 

  • एनीमिया या खून की कमी, जौंडिस, लिवर-स्प्लीन का बढ़ जाना, लिवर-स्प्लीन की ख़राबी से होने वाले बुखार में इसके सेवन से अच्छा लाभ होता है. 
  • पाचन शक्ति को ठीक करता है, लिवर की कमजोरी दूर कर भूख बढ़ाता है. 
  • खून की कमी से होने वाली सुजन को दूर करता है. 
  • बच्चों के स्प्लीन बढ़ने से होने वाले, बुखार, कमज़ोरी, पेट बाहर निकल जाना और शरीर सूखने जैसे लक्षण में इसके सेवन से लाभ होता है. 
  • मूल ग्रन्थ के अनुसार पांडू रोग, शोथ, उदररोग, क्रीमी, हृदय रोग, अर्श,भगन्दर इत्यादि में भी इसके सेवन से लाभ होता है. 
  • खून की कमी और सुजन दूर करने के लिए वैद्यगण इसका प्रमुखता से प्रयोग करते हैं. 

नवायस मण्डूर और नवायस लौह में क्या अंतर है?

दोनों के घटक और निर्माण विधि सब एक ही हैं, अंतर बस यह है कि नवायस लौह में 

मण्डूर भस्म की जगह लौह भस्म मिलाकर बनाया जाता है. 

नवायस मण्डूर और नवायस लौह में कौन बेस्ट है?

नवायस मण्डूर बेस्ट है क्यूंकि मण्डूर भस्म ज्यादा सौम्य होता है, और सभी को सूट करता है. इसे अधीक मात्रा में भी प्रयोग कर सकते हैं. 

इसके बारे में यदि आपके मन में कोई सवाल हो तो कमेंट कर पूछिये

ऑनलाइन ख़रीदने का लिंक निचे दिया गया है. 



20 November 2021

Neelkanth Ras | नीलकण्ठ रस- क्या हैं इसके उपयोग?

 

neelkanth ras

इस आयुर्वेदिक औषधि को आज का वैद्य समाज भूल गया है तो आईये नीलकण्ठ रस के गुण उपयोग और निर्माण विधि के बारे में सबकुछ जानते हैं- 

आज के समय में नीलकण्ठ रस शायेद की किसी फार्मेसी के बना हुआ मिले, पहले वैद्यगण इसका निर्माण कर अपने क्लिनिक में इसकी एक शीशी अवश्य रखते थे. सिद्धहस्त वैद्यगण इसका निर्माण कर परिक्षण कर सकते हैं. 

नीलकण्ठ रस के घटक और निर्माण विधि 

शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, शंख भस्म और शुद्ध नीला थोथा सभी समान भाग लेकर सबसे पहले पारा-गंधक को खरलकर कज्जली बना लें, इसके बाद दूसरी सभी चीज़ मिलाकर देवदाली के रस की 21 भावना देकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रख लें. यही नीलकण्ठ रस है. 

नीलकण्ठ रस की मात्रा और सेवन विधि 

एक-एक गोली अर्क पुदीना के साथ आवश्यकतानुसार 

नीलकण्ठ रस के फ़ायदे 

इसकी एक गोली खाते ही हर तरह की उल्टी रुक  जाती है, बिल्कुल अंग्रेज़ी दवा की तरह तेज़ी से असर करने वाली औषधि है. 

वमन या उल्टी रोकने के लिए बेहद प्रभावशाली है.

कफ़-पित्त दूषित होने के कारन उत्पन्न वमन या उलटी में आशु लाभकारी औषधि है, वैद्यगण इसका निर्माण कर परीक्षा करें.